कोलकाता से आए 15 शिवभक्तों का जत्था बना आकर्षण का केंद्र; 80 किलो वजनी मां तारा की प्रतिमा को कांवर में लेकर बाबा वैद्यनाथ धाम के लिए पैदल रवाना
सुल्तानगंज (संवाद सूत्र): देवाधिदेव महादेव की आराधना और पावन श्रावणी मेला के इस पवित्र अवसर पर बिहार के सुल्तानगंज स्थित उत्तरवाहिनी गंगा तट से एक ऐसा दृश्य देखने को मिला, जिसने देश भर से आने वाले श्रद्धालुओं का मन मोह लिया है। पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता से पहुंचे 15 शिवभक्तों का एक विशेष जत्था इन दिनों सुल्तानगंज के कांवरिया पथ पर आकर्षण का मुख्य केंद्र बना हुआ है। यह जत्था कोई आम यात्रा पर नहीं निकला है, बल्कि इन भक्तों की आस्था का स्तर ऐसा है कि वे लगभग 80 किलो वजनी मां तारा की भव्य प्रतिमा को अपने कांवर पर सुशोभित कर बाबा बैद्यनाथ धाम (देवघर) की कठिन पैदल यात्रा पर निकले हैं। चार कांवरिये मिलकर इस भारी-भरकम और पवित्र प्रतिमा के भार को संभालते हुए आगे बढ़ रहे हैं, जिन्हें देखने के लिए सड़क के दोनों किनारों पर भक्तों का तांता लगा हुआ है।
कोलकाता से सुल्तानगंज तक की अनूठी यात्रा
सनातन संस्कृति में कांवर यात्रा को सबसे कठिन और पवित्र तपस्या माना जाता है, लेकिन कोलकाता के इन शिवभक्तों ने इस यात्रा को अपनी अनूठी निष्ठा से एक अलग ही आयाम दे दिया है:
कोलकाता से लाए प्रतिमा: कोलकाता के तांत्रिक और धार्मिक अनुष्ठानों में गहरी आस्था रखने वाले इन 15 भक्तों ने विशेष रूप से मां तारा की इस आकर्षक और प्राण-प्रतिष्ठित प्रतिमा का निर्माण कराया था। इसके बाद वे इस प्रतिमा को सुरक्षित रूप से वाहन के जरिए सुल्तानगंज लेकर पहुंचे।
गंगा जल भरकर किया संकल्प: सुल्तानगंज के ऐतिहासिक उत्तरवाहिनी गंगा तट पर इन शिवभक्तों ने विधि-विधान से मां गंगा का पूजन किया और पवित्र गंगा जल भरा। इसके पश्चात 80 किलो वजनी मां तारा की प्रतिमा को पारंपरिक कांवर के रूप में सुसज्जित कर बाबा बैद्यनाथ के जयकारों के साथ अपनी पदयात्रा का शुभारंभ किया।
चार कांवरियों का समन्वय और अद्भुत शक्ति
इतनी भारी प्रतिमा को कांवर पर रखकर मीलों का सफर तय करना किसी साधारण मनुष्य के बस की बात नहीं है:
सहयोग और समर्पण की मिसाल: इस 80 किलो वजनी कांवर को उठाने के लिए चार मजबूत कांवड़ियों ने मिलकर जिम्मेदारी संभाली है। जब वे थकते हैं, तो जत्थे के अन्य सदस्य बारी-बारी से इस पवित्र भार को अपने कंधों पर लेते हैं।
अनुशासन और भक्तिभाव: कोलकाता के इस जत्थे का हर एक सदस्य अनुशासन के साथ आगे बढ़ रहा है। उनके चेहरों पर लंबी पदयात्रा की थकान का कोई असर नहीं दिखाई दे रहा है, बल्कि मां तारा और बाबा भोलेनाथ की भक्ति की ऊर्जा साफ झलक रही है। रास्ते भर उनके मुंह से निकल रहे "जय बाबा भोलेनाथ" और "जय मां तारा" के जयकारों से पूरा कांवरिया पथ गूंज उठा है।
कांवरिया पथ पर बने मुख्य आकर्षण का केंद्र
सुल्तानगंज से देवघर तक जाने वाले लगभग 105 किलोमीटर लंबे इस कांवरिया पथ पर जब से इस जत्थे ने कदम रखा है, तब से यह हर किसी के लिए कौतूहल और श्रद्धा का विषय बन गया है:
श्रद्धालुओं की उमड़ती भीड़: सड़क मार्ग से गुजरने वाले अन्य कांवरिये और स्थानीय लोग इस अद्भुत कांवर को देखने के लिए रुक जा रहे हैं। कई लोग इस दुर्लभ क्षण को अपने मोबाइल कैमरों में कैद करते नजर आए।
माता टेकने की होड़: रास्ते में पड़ने वाले विश्राम स्थलों पर जब यह जत्था रुकता है, तो मां तारा की इस कांवर रूपी प्रतिमा के दर्शन करने और माथा टेकने के लिए भक्तों की लंबी कतारें लग जाती हैं। लोगों का मानना है कि इतनी भारी प्रतिमा को कांवर में उठाकर चलना अपने आप में एक जीवित चमत्कार और अटूट तपस्या का प्रमाण है।
कोलकाता के भक्तों की जुबानी: आस्था के आगे वजन कुछ नहीं
मीडिया और स्थानीय लोगों से बातचीत करते हुए जत्थे के सदस्यों ने बताया कि उन्हें मां तारा और बाबा बैद्यनाथ पर असीम भरोसा है:
मनोकामना पूर्ण होने का विश्वास: भक्तों ने कहा कि उनके मन में यह संकल्प था कि वे मां तारा को अपने कंधों पर बैठाकर बाबा बैद्यनाथ के दरबार तक ले जाएंगे और वहां दोनों शक्तियों का आशीर्वाद प्राप्त करेंगे।
कठिन मार्ग बना आसान: उन्होंने बताया कि 80 किलो वजन भले ही शारीरिक रूप से भारी लगता हो, लेकिन जब कंधे पर मां का स्वरूप और दिल में भोलेनाथ का नाम हो, तो यह वजन तिनके के समान हल्का प्रतीत होता है। रास्ते की तमाम बाधाएं और पैर के छाले उनकी इस भक्ति के आगे बेमानी हो चुके हैं।
स्थानीय प्रशासन और सुरक्षा व्यवस्था
इस विशेष जत्थे के आकर्षण और भारी भीड़ को देखते हुए स्थानीय प्रशासन और पुलिस भी पूरी तरह मुस्तैद है:
सुरक्षित आवागमन सुनिश्चित करना: सुल्तानगंज से लेकर सीमावर्ती इलाकों तक तैनात सुरक्षा बल इस बात का विशेष ध्यान रख रहे हैं कि कांवरिया पथ पर उमड़ने वाली भीड़ के बीच इस जत्थे को किसी प्रकार की असुविधा न हो।
चिकित्सा और पेयजल सहायता: प्रशासन और सामाजिक संगठनों द्वारा जगह-जगह लगाए गए शिविरों में इन कांवरियों का विशेष स्वागत किया जा रहा है और उन्हें चिकित्सकीय सहायता व फल-जल उपलब्ध कराए जा रहे हैं।
सुल्तानगंज के कांवरिया पथ पर कोलकाता से आए इन 15 शिवभक्तों द्वारा 80 किलो वजनी मां तारा की प्रतिमा को कांवर के रूप में लेकर चलना भारतीय सनातन संस्कृति की उस अटूट और अगाध आस्था का प्रतीक है, जहां भौतिक कठिनाइयां भक्ति की शक्ति के सामने टिक नहीं पाती हैं। चार कांवरियों द्वारा साझा किए गए इस भारी बोझ ने यह साबित कर दिया है कि सच्ची श्रद्धा और समर्पण से कोई भी कठिन लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है। यह यात्रा न केवल सुल्तानगंज से देवघर जाने वाले मार्ग पर इतिहास रच रही है, बल्कि लाखों अन्य शिवभक्तों के लिए भी प्रेरणा का स्त्रोत बन चुकी है।