पूर्णिया में भारतीय शिक्षण मंडल द्वारा भव्य गुरु पूर्णिमा महोत्सव सह व्यास पूजन का आयोजन: शिक्षा, अनुशासन और गुरु-शिष्य परंपरा पर विशेष चर्चा — विस्तृत रिपोर्ट
बिहार के पूर्णिया जिले में भारतीय शिक्षण मंडल के तत्वावधान में गुरु पूर्णिमा महोत्सव सह व्यास पूजन का एक अत्यंत भव्य और गरिमामयी आयोजन किया गया। इस आध्यात्मिक और शैक्षणिक कार्यक्रम में बड़ी संख्या में विद्यार्थियों, शिक्षकों और शिक्षाविदों ने पूरे उत्साह के साथ हिस्सा लिया। कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण महर्षि व्यास के पूजन के साथ-साथ भारतीय संस्कृति में गुरु-शिष्य परंपरा के महत्व पर गहन चर्चा रही। इस अवसर पर मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित प्रो. शिव मुनि यादव ने अपने ओजस्वी संबोधन में गुरु के सर्वोपरि महत्व को रेखांकित करते हुए छात्रों को जीवन में अनुशासन (Discipline) और नैतिक मूल्यों का पालन करने का संदेश दिया।
गुरु पूर्णिमा और व्यास पूजन का आध्यात्मिक व सांस्कृतिक महत्व (Spiritual and Cultural Significance of Guru Purnima and Vyas Pujan)
भारतीय सनातन संस्कृति में गुरु पूर्णिमा का पर्व केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि उस महान परंपरा का प्रतीक है जो अज्ञानता के अंधकार को मिटाकर ज्ञान का प्रकाश फैलाती है।
महर्षि व्यास को नमन: कार्यक्रम की शुरुआत पारंपरिक रूप से वैदिक मंत्रोच्चार और प्रथम गुरु महर्षि वेद व्यास के चित्र पर दीप प्रज्वलन तथा व्यास पूजन के साथ हुई। उपस्थित सभी गुरुजनों और विद्यार्थियों ने व्यास पीठ को नमन कर आशीर्वाद प्राप्त किया।
गुरु-शिष्य परंपरा की महत्ता: आयोजकों ने बताया कि गुरु वह धुरी है जिसके इर्द-गिर्द एक सभ्य और संस्कारी समाज का निर्माण होता है। आधुनिक युग में इस प्राचीन परंपरा को सहेजे रखना और नई पीढ़ी तक इसके संस्कारों को पहुँचाना बेहद आवश्यक है।
मुख्य वक्ता प्रो. शिव मुनि यादव का संबोधन: अनुशासन और शिक्षा (Keynote Address by Prof. Shiv Muni Yadav: Discipline and Education)
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता प्रो. शिव मुनि यादव ने अपने संबोधन में शिक्षा, छात्र जीवन और गुरु की भूमिका पर बहुत ही गहराई से प्रकाश डाला।
जीवन में अनुशासन का महत्व: प्रो. यादव ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि किताबी ज्ञान के साथ-साथ जीवन में अनुशासन और नैतिक चरित्र का होना सबसे बड़ी पूंजी है। जिस छात्र के जीवन में अनुशासन नहीं होता, वह कभी भी वास्तविक रूप से सफल नहीं हो सकता।
गुरु का स्थान सर्वोपरि: उन्होंने कहा कि माता-पिता हमें जन्म देते हैं और दुनिया का परिचय कराते हैं, लेकिन एक सच्चा गुरु हमारे भीतर छिपी हुई अंतरात्मा को जगाकर हमें सही और गलत का भेद समझाता है। गुरु का स्थान इस संसार में ईश्वर से भी बढ़कर माना गया है क्योंकि गुरु ही हमें ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग दिखाता है।
विद्यार्थियों और शिक्षकों की सहभागिता (Participation of Students and Teachers)
इस महोत्सव में पूर्णिया क्षेत्र के विभिन्न शिक्षण संस्थानों से आए विद्यार्थियों और शिक्षकों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।
छात्रों में दिखा उत्साह: विद्यार्थियों ने अपने गुरुओं का चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लिया और संकल्प किया कि वे अपने शिक्षकों द्वारा बताए गए मार्ग पर चलकर देश और समाज के विकास में योगदान देंगे।
शिक्षकों का दायित्व: उपस्थित शिक्षकों ने भी इस बात पर जोर दिया कि आज के दौर में शिक्षण केवल नौकरी नहीं, बल्कि एक पवित्र दायित्व है। बच्चों को अच्छी शिक्षा के साथ-साथ अच्छे संस्कार देना ही शिक्षक का परम कर्तव्य है।
महत्वपूर्ण अवलोकन: "शिक्षा केवल जीविकोपार्जन का साधन नहीं है, बल्कि यह मनुष्य को पूर्ण और संस्कारी बनाने की एक सतत प्रक्रिया है।"
भारतीय शिक्षण मंडल के उद्देश्यों पर प्रकाश (Highlighting the Objectives of Bharatiya Shikshan Mandal)
भारतीय शिक्षण मंडल के कार्यकर्ताओं ने कार्यक्रम के दौरान संगठन की वैचारिक पृष्ठभूमि और उद्देश्यों पर भी चर्चा की।
राष्ट्रवादी और मूल्यपरक शिक्षा: वक्ताओं ने कहा कि भारतीय शिक्षण मंडल का मुख्य उद्देश्य देश की शिक्षा प्रणाली में भारतीय संस्कृति, मूल्यों और राष्ट्रवाद का समावेश करना है, ताकि युवा पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ी रहे और वैश्विक स्तर पर देश का नाम रोशन कर सके।
पूर्णिया में भारतीय शिक्षण मंडल द्वारा आयोजित यह गुरु पूर्णिमा महोत्सव सह व्यास पूजन समारोह केवल एक औपचारिक कार्यक्रम बनकर नहीं रह गया, बल्कि इसने सभी के दिलों में गुरु के प्रति आदर और कर्तव्यनिष्ठा के भाव को और अधिक प्रगाढ़ कर दिया। इस प्रकार के आयोजन नई पीढ़ी को उनके सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़ने में एक मील का पत्थर साबित होते हैं।