सामान्य बम 4 से 5 दिन में पूरी करते हैं यात्रा, तो वहीं 'डाक बम' सिर्फ 24 घंटे में तय करते हैं 105 किलोमीटर का सफर

सुल्तानगंज/देवघर (संवाद सूत्र): देवाधिदेव महादेव के पवित्र पावन श्रावण मास (सावन) के दौरान बिहार के सुल्तानगंज से झारखंड के देवघर तक सजने वाला कांवरिया पथ इन दिनों पूरी तरह 'बोल बम' के जयकारों से गूंज रहा है। उत्तरवाहिनी गंगा तट से जल उठाकर बाबा बैद्यनाथ धाम तक जाने वाली इस लगभग 105 किलोमीटर लंबी पदयात्रा का अपना एक अलग और अनूठा आध्यात्मिक महत्व है। इस यात्रा में शामिल होने वाले शिवभक्त अपनी शारीरिक क्षमता और अटूट आस्था के आधार पर अलग-अलग तरीकों से यात्रा पूरी करते हैं। इसमें मुख्य रूप से सामान्य कांवरिया (सामान्य बम) और डाक कांवरिया (डाक बम) की यात्रा शैली सबसे ज्यादा चर्चा का विषय रहती है। जहां एक ओर सामान्य बम अपनी गति से 4 से 5 दिनों में यह सफर तय करते हैं, वहीं दूसरी ओर कठिन अनुशासन और द्रुत गति वाले 'डाक बम' मात्र 24 घंटे के भीतर इस कठिन चुनौती को पार कर इतिहास रचते हैं।

सामान्य बम: भक्ति, विश्राम और सहजता का मेल

सुल्तानगंज से देवघर की यात्रा करने वाले अधिकांश श्रद्धालु 'सामान्य बम' या सामान्य कांवरिया कहलाते हैं। इनकी यात्रा की अपनी एक विशेष शैली और परंपरा है:

यात्रा की अवधि (4 से 5 दिन): सामान्य बम सुल्तानगंज से गंगाजल उठाने के बाद पैदल ही देवघर के लिए रवाना होते हैं। वे रास्ते में आने वाले विभिन्न पड़ावों—जैसे अबरखा, इनारावरण, कटोरिया, लक्खीडिह, और सुईया पहाड़—पर विश्राम करते हुए आगे बढ़ते हैं। सामान्यतः वे इस 105 किलोमीटर की दूरी को तय करने में 4 से 5 दिनों का समय लेते हैं।

नियम और खान-पान: ये यात्री अपनी सुविधा, मौसम और स्वास्थ्य के अनुसार रात में विश्राम शिविरों (धर्मशालाओं या तंबुओं) में रुकते हैं। संध्या के समय भजन-कीर्तन करते हैं, भोजन ग्रहण करते हैं और अगली सुबह पुनः अपनी यात्रा शुरू करते हैं।

सामूहिक आनंद: इस यात्रा में परिवार, दोस्तों और मित्रों के समूह शामिल होते हैं, जो रास्तेभर भगवान शिव के भजनों पर झूमते हुए और एक-दूसरे का उत्साह बढ़ाते हुए आगे बढ़ते हैं। इसमें शारीरिक थकावट को कम करने के लिए पर्याप्त समय मिल जाता है।

डाक बम: आस्था, गति और कठिन तपस्या की पराकाष्ठा

इसके विपरीत, 'डाक बम' या 'डाक कांवरिया' की यात्रा बेहद कठिन, रोमांचक और अनुशासन की कड़ी परीक्षा मानी जाती है:

महज 24 घंटे का सफर: डाक बम कांवरियों का सबसे बड़ा नियम यह है कि वे सुल्तानगंज से गंगाजल उठाने के बाद लगातार दौड़ते या तेज गति से चलते हुए 24 घंटे के भीतर देवघर पहुंचकर बाबा बैद्यनाथ को जल अर्पित करते हैं। उनके लिए समय सीमा बेहद अहम होती है।

रुकने की पाबंदी: इस यात्रा का सबसे कड़ा नियम यह है कि डाक बम रास्ते में कहीं भी विश्राम या ठहरते नहीं हैं। यदि वे कहीं एक जगह खड़े भी हो जाएं, तो भी उनके पैर लगातार चलते या थिरकते रहने चाहिए। वे न तो रात में सोते हैं और न ही भोजन के लिए लंबा समय गंवाते हैं।

विशेष पहचान और वस्त्र: डाक बम अमूनन सफेद वस्त्र धारण करते हैं, उनके हाथ में विशेष कांवर होती है और उनके साथ एक सहयोगी या जत्था होता है जो उनकी जरूरतों का ध्यान रखता है। प्रशासन द्वारा इन्हें विशेष पहचान पत्र (पास या कार्ड) दिए जाते हैं, ताकि वे समय पर अपनी यात्रा पूरी कर सकें।

प्रशासनिक व्यवस्था और विशेष सुविधाएं

श्रावण मास में लाखों की संख्या में पहुंचने वाले सामान्य और डाक बमों की सुरक्षा व सुविधाओं के लिए प्रशासन पूरी तरह मुस्तैद रहता है:

डाक बमों के लिए विशेष पास और रूट चेकिंग: सुल्तानगंज से जल उठाने के बाद डाक बमों का निबंधन किया जाता है। रास्ते में बांका जिले के विभिन्न पड़ावों पर उनके दस्तावेजों की जांच के लिए विशेष काउंटर बनाए जाते हैं, जहां उन्हें आगे की यात्रा के लिए अनुमति कार्ड (पीला या गुलाबी कार्ड) दिए जाते हैं।

गर्भ गृह में प्राथमिकता: चूंकि डाक बम अत्यंत कठिन साधना और निर्धारित 24 घंटे की समयसीमा के भीतर अपनी यात्रा पूरी करते हैं, इसलिए देवघर पहुंचने पर उन्हें मंदिर प्रशासन द्वारा विशेष सुविधा और सुगमता के साथ जलाभिषेक कराया जाता है।

सुल्तानगंज से देवघर तक की कांवर यात्रा शारीरिक और मानसिक सहनशक्ति की एक अनोखी परीक्षा है। जहां 'सामान्य बम' अपनी सुविधानुसार 4 से 5 दिनों में प्रकृति और आस्था का आनंद लेते हुए सफर पूरा करते हैं, वहीं 'डाक बम' अपनी अदम्य इच्छाशक्ति और अटूट विश्वास के बल पर मात्र 24 घंटे में इस चुनौती को फतेह करते हैं। दोनों ही शैलियों का अपना अलग आध्यात्मिक आनंद है, लेकिन उद्देश्य केवल एक ही होता है—भोलेनाथ के चरणों में अपनी हाजिरी लगाना और मोक्ष की प्राप्ति करना।