अभावों से जूझते हुए किसान के बेटे शमी अहमद ने सेल्फ-स्टडी से नीट (NEET) में मारी बाजी
पीरपैंती (भागलपुर): सफलता जब दृढ़ संकल्प और कड़ी मेहनत के साथ मिलती है, तो वह न केवल एक व्यक्ति की किस्मत बदलती है, बल्कि पूरे समाज के लिए प्रेरणा बन जाती है। भागलपुर जिले के पीरपैंती प्रखंड के कूचबन्ना गांव के एक साधारण किसान के बेटे शमी अहमद ने कुछ ऐसा ही कर दिखाया है। आर्थिक तंगी और संसाधनों के अभाव को मात देते हुए, बिना किसी महंगी कोचिंग के केवल सेल्फ-स्टडी (स्वयं अध्ययन) के दम पर शमी ने देश की प्रतिष्ठित मेडिकल प्रवेश परीक्षा 'नीट' (NEET) में शानदार सफलता हासिल की है।
संघर्षों के बीच बुने गए डॉक्टर बनने के सपने
शमी अहमद का परिवार अत्यंत साधारण है। उनके पिता औरंगजेब एक किसान हैं, जो खेती-बाड़ी कर परिवार का पेट पालते हैं। घर की आर्थिक स्थिति इतनी मजबूत नहीं थी कि शमी को बड़े शहरों में भेजकर किसी महंगी कोचिंग में दाखिला दिलाया जा सके। लेकिन शमी की आंखों में डॉक्टर बनने का सपना पलता रहा। उन्होंने अपने पिता के पसीने की कमाई की कीमत को समझा और अपनी पढ़ाई को ही अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया।
दूसरा प्रयास, और मिली कामयाबी
शमी की यह सफलता रातों-रात नहीं मिली है। यह उनके दूसरे प्रयास का परिणाम है। पहले प्रयास में मिली असफलता ने उन्हें टूटने नहीं दिया, बल्कि अपनी कमियों को पहचानकर दोगुनी ऊर्जा के साथ तैयारी करने का हौसला दिया। उन्होंने बताया कि असफलता से डरने के बजाय, उन्होंने अपनी रणनीति बदली और एनसीईआरटी (NCERT) की किताबों को ही अपना आधार बनाया। घंटों इंटरनेट पर मुफ्त उपलब्ध शैक्षणिक सामग्री और ऑनलाइन लेक्चर्स की मदद से उन्होंने अपनी नींव को मजबूत किया।
बिना कोचिंग के 'सेल्फ-स्टडी' का मंत्र
आज के दौर में जब नीट जैसी परीक्षाओं के लिए लाखों रुपये की फीस वाली कोचिंग संस्थानों का बोलबाला है, शमी अहमद का यह उदाहरण उन हज़ारों छात्रों के लिए एक मिसाल है जो संसाधन के अभाव में अपने सपने छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं।
शमी के अनुसार:
अनुशासन ही कुंजी है: उन्होंने एक निश्चित समय सारणी (Time Table) बनाई थी, जिसका वे कठोरता से पालन करते थे।
एनसीईआरटी पर पकड़: उन्होंने माना कि नीट की परीक्षा पास करने के लिए एनसीईआरटी की किताबें सबसे महत्वपूर्ण हैं।
मॉक टेस्ट का अभ्यास: उन्होंने इंटरनेट की मदद से पिछले वर्षों के प्रश्नपत्रों को हल किया, जिसने उनकी गति और सटीकता (Accuracy) को बढ़ाया।
पिता का संघर्ष और बेटे का समर्पण
पिता औरंगजेब के लिए यह क्षण किसी बड़े गर्व से कम नहीं है। उन्होंने कहा, "मैंने कभी बेटे को पढ़ाई में पीछे नहीं रहने दिया। भले ही हमारे पास साधन कम थे, लेकिन उसकी लगन देखकर मेरा हौसला हमेशा बढ़ा रहता था।" बेटे की सफलता पर पूरे कूचबन्ना गांव में जश्न का माहौल है। शमी के डॉक्टर बनने की खबर सुनते ही उनके घर पर बधाई देने वालों का तांता लग गया।
गांव और क्षेत्र के लिए प्रेरणा
शमी की इस उपलब्धि ने साबित कर दिया है कि सफलता किसी आलीशान भवन या कोचिंग संस्थान की मोहताज नहीं होती। पीरपैंती जैसे सुदूर ग्रामीण इलाके के छात्र ने यह दिखा दिया है कि यदि जुनून सच्चा हो, तो अभावों का अंधकार भी सपनों की रोशनी को नहीं बुझा सकता।
क्षेत्र के बुद्धिजीवियों और शिक्षकों ने भी शमी की सराहना करते हुए कहा कि उनकी कहानी उन ग्रामीण छात्रों के लिए एक दिशा-निर्देश है, जो खुद पर भरोसा करने के बजाय कोचिंग के भरोसे रहते हैं। शमी अब आने वाले समय में एक कुशल डॉक्टर बनकर न केवल अपने परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारना चाहते हैं, बल्कि अपने क्षेत्र के गरीब और जरूरतमंद मरीजों की सेवा करना चाहते हैं।
भविष्य की राह
शमी अहमद का यह सफर अभी शुरू हुआ है। मेडिकल कॉलेज में दाखिला लेने के बाद उनका लक्ष्य अपनी पढ़ाई को पूरी ईमानदारी से जारी रखना है। उनकी सफलता ने यह संदेश दिया है कि किसान का बेटा हो या मजदूर का, यदि प्रतिभा और कठिन परिश्रम का मेल हो, तो आकाश की बुलंदियां बहुत दूर नहीं होतीं।
शमी की यह कहानी आज हर उस छात्र के लिए एक प्रेरणा है, जो आर्थिक तंगी से जूझ रहा है। यह नीट की तैयारी करने वाले उन सभी युवाओं को याद दिलाती है कि 'कोचिंग' सफलता का एक माध्यम हो सकती है, लेकिन सफलता का असली रास्ता आपकी अपनी 'मेहनत और लगन' से ही होकर गुजरता है।