सम्राट चौधरी सरकार की नई पहल, लापरवाही या प्रताड़ना से कैदी की मौत पर आश्रितों को मिलेंगे 5 लाख रुपये तक
पटना: बिहार की सम्राट चौधरी सरकार ने जेल प्रशासन और मानवाधिकार संरक्षण को लेकर एक महत्वपूर्ण कदम उठाने की तैयारी की है। नई व्यवस्था के तहत यदि किसी जेल में बंद कैदी की लापरवाही, प्रताड़ना या हिरासत के दौरान हुई यातना के कारण मृत्यु होती है, तो मृतक के आश्रितों को अधिकतम पांच लाख रुपये तक का मुआवजा दिया जाएगा। सरकार का उद्देश्य जेलों में जवाबदेही बढ़ाना, मानवाधिकारों की रक्षा करना और पीड़ित परिवारों को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराना है।
यह प्रस्ताव राज्य की जेल व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और उत्तरदायी बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है। इसके लागू होने के बाद हिरासत में होने वाली संदिग्ध मौतों की जांच और जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया भी अधिक प्रभावी होने की उम्मीद है।
मानवाधिकार संरक्षण की दिशा में बड़ा कदम
सरकार का मानना है कि जेल में बंद प्रत्येक व्यक्ति, चाहे वह विचाराधीन कैदी हो या सजायाफ्ता, उसके जीवन और सम्मान की रक्षा करना राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी है। यदि किसी कैदी की मृत्यु प्रशासनिक लापरवाही, प्रताड़ना या अन्य गंभीर कारणों से होती है, तो केवल जांच कराना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि प्रभावित परिवार को आर्थिक सहायता भी मिलनी चाहिए।
इसी सोच के तहत सरकार ने मुआवजा देने की व्यवस्था तैयार करने की दिशा में कदम बढ़ाया है।
किन परिस्थितियों में मिलेगा मुआवजा?
प्रस्तावित व्यवस्था के अनुसार, यदि जांच में यह प्रमाणित होता है कि कैदी की मृत्यु निम्न कारणों से हुई है, तो आश्रितों को मुआवजा दिया जा सकेगा—
- जेल प्रशासन की लापरवाही।
- हिरासत के दौरान प्रताड़ना या यातना।
- सुरक्षा व्यवस्था में गंभीर चूक।
- चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने में लापरवाही।
- अन्य प्रशासनिक चूक, जिसके कारण कैदी की मृत्यु हुई।
हालांकि, प्रत्येक मामले में मुआवजा देने से पहले सक्षम जांच एजेंसी की रिपोर्ट और संबंधित अधिकारियों की जांच को आधार बनाया जाएगा।
अधिकतम पांच लाख रुपये तक सहायता
सरकार के प्रस्ताव के अनुसार, पात्र मामलों में मृतक के आश्रितों को अधिकतम पांच लाख रुपये तक का मुआवजा दिया जाएगा। मुआवजे की राशि मामले की परिस्थितियों, जांच रिपोर्ट और जिम्मेदारी तय होने के आधार पर निर्धारित की जा सकती है।
इस आर्थिक सहायता का उद्देश्य मृतक के परिवार को तत्काल राहत प्रदान करना है, न कि दोषियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई का विकल्प बनना। यदि किसी अधिकारी या कर्मचारी की लापरवाही साबित होती है, तो उसके खिलाफ विभागीय और कानूनी कार्रवाई अलग से की जाएगी।
जेल प्रशासन की जवाबदेही बढ़ेगी
विशेषज्ञों का मानना है कि नई व्यवस्था लागू होने के बाद जेल प्रशासन की जवाबदेही और बढ़ेगी। जेल अधिकारियों और कर्मचारियों को कैदियों की सुरक्षा, स्वास्थ्य और मानवाधिकारों को लेकर अधिक सतर्क रहना होगा।
विशेष रूप से बीमार कैदियों के इलाज, नियमित स्वास्थ्य जांच, सुरक्षा व्यवस्था और आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता होगी।
संदिग्ध मौतों की होगी निष्पक्ष जांच
सरकार हिरासत में होने वाली प्रत्येक संदिग्ध मृत्यु की निष्पक्ष और समयबद्ध जांच सुनिश्चित करने पर भी जोर दे रही है। ऐसे मामलों में पोस्टमार्टम, मजिस्ट्रेट जांच, मेडिकल रिपोर्ट और अन्य साक्ष्यों के आधार पर वास्तविक कारणों का पता लगाया जाएगा।
यदि जांच में प्रताड़ना, लापरवाही या प्रशासनिक चूक सामने आती है, तो दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी।
मानवाधिकार संगठनों ने किया स्वागत
मानवाधिकार से जुड़े कई विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों ने इस पहल का स्वागत किया है। उनका कहना है कि जेल में बंद व्यक्ति भी संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों का हकदार होता है।
उनके अनुसार, यदि किसी सरकारी लापरवाही के कारण किसी कैदी की जान जाती है, तो उसके परिवार को न्याय और आर्थिक सहायता मिलना आवश्यक है। साथ ही दोषी अधिकारियों के खिलाफ भी प्रभावी कार्रवाई होनी चाहिए।
विपक्ष ने उठाए कुछ सवाल
हालांकि विपक्षी दलों का कहना है कि केवल मुआवजा देने से समस्या का समाधान नहीं होगा। उनका मानना है कि सरकार को जेलों में सुरक्षा व्यवस्था, स्वास्थ्य सेवाओं और निगरानी प्रणाली को भी मजबूत करना चाहिए ताकि ऐसी घटनाओं को रोका जा सके।
विपक्ष ने यह भी मांग की कि सभी जेलों में आधुनिक सीसीटीवी निगरानी, नियमित मेडिकल जांच और स्वतंत्र निरीक्षण व्यवस्था को और प्रभावी बनाया जाए।
जेल सुधारों पर सरकार का फोकस
बिहार सरकार पिछले कुछ समय से जेल सुधारों पर विशेष ध्यान दे रही है। कई जेलों में डिजिटल निगरानी, सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने, स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को आधुनिक बनाने की दिशा में कार्य किया जा रहा है।
नई मुआवजा नीति को भी इन्हीं सुधारों की श्रृंखला का हिस्सा माना जा रहा है। सरकार का उद्देश्य जेलों में पारदर्शिता, जवाबदेही और मानवाधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करना है।
कानूनी प्रक्रिया रहेगी जारी
सरकार ने स्पष्ट किया है कि मुआवजा दिए जाने का अर्थ यह नहीं होगा कि दोषियों के खिलाफ कार्रवाई समाप्त हो जाएगी। यदि किसी अधिकारी, कर्मचारी या अन्य व्यक्ति की भूमिका संदिग्ध पाई जाती है, तो उसके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) और अन्य संबंधित कानूनों के तहत आवश्यक कार्रवाई की जाएगी।
मुआवजा केवल पीड़ित परिवार को राहत देने का माध्यम होगा, जबकि दोषियों को कानून के अनुसार जवाबदेह ठहराया जाएगा।
परिवारों को मिलेगी आर्थिक सहायता
कई मामलों में हिरासत में मृत्यु के बाद मृतक का परिवार आर्थिक संकट में आ जाता है। ऐसे में सरकार की यह पहल प्रभावित परिवारों को तत्काल आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने में मददगार साबित हो सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस व्यवस्था से जेल प्रशासन में जिम्मेदारी की भावना बढ़ेगी और कैदियों के अधिकारों की रक्षा के प्रति संवेदनशीलता भी मजबूत होगी।
यदि यह व्यवस्था प्रभावी ढंग से लागू होती है, तो बिहार में जेल प्रशासन और मानवाधिकार संरक्षण के क्षेत्र में यह एक महत्वपूर्ण सुधार माना जाएगा। हिरासत में लापरवाही या प्रताड़ना के कारण होने वाली मौतों पर आश्रितों को पांच लाख रुपये तक का मुआवजा देने की व्यवस्था न केवल पीड़ित परिवारों को राहत देगी, बल्कि जेल प्रशासन को भी अधिक जवाबदेह बनाएगी।
हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि मुआवजा तभी सार्थक होगा जब इसके साथ निष्पक्ष जांच, दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई और जेल सुधारों को भी समान प्राथमिकता दी जाए। सरकार की इस पहल पर अब सभी की नजरें हैं कि इसे किस रूप में लागू किया जाता है और इससे राज्य की जेल व्यवस्था में कितना सकारात्मक बदलाव आता है।