मखाना की खेती को लेकर विशेषज्ञों की दो टूक: राजीव रंजन प्रसाद और डॉ. मनोज कुमार ने ऑनलाइन प्रशिक्षण में दिए महत्वपूर्ण सुझाव; सीमित जल संसाधनों वाले क्षेत्रों में ही मखाना विस्तार पर जोर, भूजल दोहन से बढ़ रहे पेयजल संकट पर जताई गहरी चिंता
दरभंगा: बिहार के कृषि और बागवानी परिदृश्य में मखाना (Makhana) आज एक 'ब्लैक गोल्ड' (Black Gold) के रूप में अपनी पहचान बना चुका है। राज्य के मिथिलांचल क्षेत्र में बड़े पैमाने पर इसकी खेती की जाती है, जिससे किसानों की आर्थिक स्थिति में अभूतपूर्व सुधार आया है। हालांकि, इस आर्थिक समृद्धि के बीच जल संसाधनों के अंधाधुंध दोहन को लेकर पर्यावरणविदों और कृषि विशेषज्ञों की चिंताएं भी लगातार बढ़ती जा रही हैं। हाल ही में आयोजित एक ऑनलाइन प्रशिक्षण कार्यक्रम (Online Training Programme) के दौरान मखाना विशेषज्ञ राजीव रंजन प्रसाद और प्रख्यात कृषि वैज्ञानिक डॉ. मनोज कुमार ने इस विषय पर बेहद महत्वपूर्ण और सचेत करने वाले विचार रखे। विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि मखाना की खेती निसंदेह रूप से अत्यधिक लाभकारी और आय बढ़ाने वाली नकदी फसल है, लेकिन इसके विस्तार को लेकर हमें अत्यधिक सावधानी बरतने की आवश्यकता है। इसे केवल उन्हीं क्षेत्रों में फैलाना चाहिए जहां पर्याप्त जल संसाधन उपलब्ध हों, अन्यथा भूजल स्तर के अत्यधिक नीचे जाने से भविष्य में एक विकराल पेयजल संकट उत्पन्न हो सकता है।
ऑनलाइन प्रशिक्षण सत्र का मुख्य उद्देश्य और मखाना खेती का महत्व
कृषि विज्ञान केंद्रों और विभिन्न कृषि विश्वविद्यालयों द्वारा आयोजित इस विशेष ऑनलाइन प्रशिक्षण सत्र में राज्यभर के प्रगतिशील किसानों, शोधकर्ताओं और छात्र-छात्राओं ने हिस्सा लिया। सत्र का मुख्य उद्देश्य किसानों को मखाना उत्पादन की आधुनिक तकनीकों से अवगत कराना और इसके वैज्ञानिक प्रबंधन की जानकारी देना था।
किसानों के लिए वरदान मखाना: वक्ताओं ने स्वीकार किया कि जीआई टैग (GI Tag) मिलने के बाद मिथिला मखाना की मांग राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में तेजी से बढ़ी है। सरकार की प्रोत्साहन योजनाओं के चलते आज किसान पारंपरिक खेती से हटकर मखाना उत्पादन की ओर आकर्षित हो रहे हैं, जिससे उनकी आमदनी में कई गुना इजाफा हुआ है।
बढ़ती लोकप्रियता के साथ बढ़ती चिंताएं: जहां एक तरफ मखाना उत्पादन का दायरा तेजी से बढ़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ इसके लिए आवश्यक पानी की भारी मात्रा को लेकर पर्यावरण वैज्ञानिक चेतावनी भी दे रहे हैं। मखाना मुख्य रूप से जलमग्न क्षेत्रों, तालाबों, पोखरों और जलभराव वाले खेतों में उगाया जाता है।
राजीव रंजन प्रसाद के विचार: सीमित जल संसाधनों वाले क्षेत्रों में ही हो खेती का विस्तार
मखाना विशेषज्ञ राजीव रंजन प्रसाद ने अपने संबोधन में व्यावहारिक पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि किसानों को आर्थिक लाभ के चक्कर में पर्यावरण और प्राकृतिक संतुलन को ताक पर नहीं रखना चाहिए।
विवेकानुसार विस्तार की सलाह: उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि राजीव रंजन प्रसाद, दरभंगा के अनुसार मखाना की खेती अत्यंत लाभकारी है, लेकिन इसे सीमित जल संसाधनों वाले क्षेत्रों या गैर-उपयुक्त इलाकों में अंधाधुंध तरीके से नहीं फैलाना चाहिए। यदि पानी की कमी वाले क्षेत्रों में भी ट्यूबवेल या पंपसेट चलाकर कृत्रिम तरीके से जलभराव कर मखाना उगाया जाएगा, तो यह पर्यावरण के लिए एक बड़ी आपदा को न्योता देना होगा।
क्षेत्र-विशेष की पहचान: श्री प्रसाद ने जोर दिया कि पारंपरिक जल स्रोतों वाले इलाकों में ही मखाना की खेती को बढ़ावा दिया जाना चाहिए ताकि भूजल स्तर पर अनावश्यक दबाव न पड़े।
विशेषज्ञ डॉ. मनोज कुमार की चेतावनी: भूजल के अत्यधिक दोहन से बढ़ रहा पेयजल संकट
ऑनलाइन प्रशिक्षण सत्र में जुड़े दूसरे प्रमुख विशेषज्ञ डॉ. मनोज कुमार ने वैज्ञानिक आंकड़ों और पर्यावरणीय प्रभावों का हवाला देते हुए भूजल स्तर में आ रही भारी गिरावट पर गहरी चिंता व्यक्त की।
भूजल का अंधाधुंध दोहन: डॉ. मनोज कुमार ने कहा कि वर्तमान समय में कई क्षेत्रों में किसान बोरवेल और डीप बोरिंग के जरिए भूजल निकालकर खेतों को भर रहे हैं और मखाना की खेती कर रहे हैं। इससे भूजल का स्तर तेजी से नीचे खिसक रहा है।
पेयजल का आसन्न संकट: उन्होंने चेतावनी दी कि यदि जल दोहन का यह सिलसिला इसी प्रकार अनियंत्रित रूप से जारी रहा, तो आने वाले दिनों में ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में गहरा पेयजल संकट खड़ा हो जाएगा। इंसानों और मवेशियों के पीने के लिए पानी की बूंद-बूंद को तरसने की स्थिति पैदा हो सकती है। इसलिए यह आवश्यक है कि वैज्ञानिक तरीकों से जल प्रबंधन किया जाए और वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting) को अनिवार्य बनाया जाए।
प्रशिक्षण में दिए गए प्रमुख सुझाव और समाधान
इस उच्चस्तरीय ऑनलाइन प्रशिक्षण के दौरान विशेषज्ञों ने किसानों और नीति निर्माताओं के सामने कुछ व्यावहारिक समाधान भी रखे:
वैज्ञानिक जल प्रबंधन: मखाना की खेती में पानी के कम से कम उपयोग और वाटर-यूज एफिशिएंसी (Water-Use Efficiency) बढ़ाने वाली तकनीकों का विकास किया जाए।
वैकल्पिक जल स्रोतों का उपयोग: भूजल के बजाय सतही जल (Surface Water), प्राकृतिक पोखर, और बारिश के पानी के संचयन पर आधारित प्रणालियों का इस्तेमाल किया जाए।
कृषि विविधीकरण: किसानों को जागरूक किया जाए कि वे हर जगह केवल मखाना ही न उगाएं, बल्कि मिट्टी की सेहत और जल उपलब्धता को ध्यान में रखते हुए फसल चक्र (Crop Rotation) का पालन करें।
राजीव रंजन प्रसाद और डॉ. मनोज कुमार जैसे विशेषज्ञों द्वारा ऑनलाइन प्रशिक्षण में कही गई ये बातें आज के समय में अत्यधिक प्रासंगिक हैं। मखाना की खेती बिहार के आर्थिक विकास के लिए एक मील का पत्थर है, लेकिन यह सफलता पर्यावरण की कीमत पर नहीं मिलनी चाहिए। यदि समय रहते सीमित जल संसाधनों वाले क्षेत्रों में मखाना के अनियंत्रित विस्तार को नहीं रोका गया, तो अल्पकालिक आर्थिक लाभ के चक्कर में हमें दीर्घकालिक और गंभीर पेयजल संकट का सामना करना पड़ सकता है। आवश्यकता इस बात की है कि विकास और पर्यावरण के बीच एक बेहतरीन संतुलन कायम किया जाए।