मुंगेर के राजमार्गों पर 'मौत का जाल' — खराब इंजीनियरिंग और लचर ट्रैफिक प्रबंधन ने छीनी कई जानें

मुंगेर जिले से गुजरने वाले राष्ट्रीय राजमार्गों का जाल विकास का प्रतीक माना जाता था, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यही राजमार्ग 'मौत के जाल' में तब्दील हो गए हैं। हाल के दिनों में हुई भयावह सड़क दुर्घटनाओं ने न केवल आम जनता को झकझोर कर रख दिया है, बल्कि प्रशासन की कार्यप्रणाली और राजमार्गों के निर्माण में अपनाई गई इंजीनियरिंग पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। एक विस्तृत जांच में यह स्पष्ट हुआ है कि अधिकांश दुर्घटनाएं महज 'चालक की लापरवाही' का परिणाम नहीं हैं, बल्कि ये खराब सड़क इंजीनियरिंग और त्रुटिपूर्ण ट्रैफिक प्रबंधन का सीधा परिणाम हैं।

जांच का मुख्य बिंदु: क्या है इंजीनियरिंग की विफलता?

हमारी पड़ताल और स्थानीय लोगों की शिकायतों से राजमार्गों की मुख्य तकनीकी खामियां उभरकर सामने आई हैं:

एक्सीलरेशन और डिक्सेलिरेशन लेन का अभाव

राजमार्ग इंजीनियरिंग का सबसे बुनियादी नियम यह है कि स्थानीय सड़कों से राजमार्ग पर जुड़ने वाले वाहनों के लिए एक अलग 'एक्सीलरेशन लेन' होनी चाहिए, ताकि वे हाईवे की मुख्य गति के साथ तालमेल बिठा सकें। मुंगेर के एनएच पर ऐसी लेन का लगभग अभाव है। स्थानीय वाहनों का अचानक हाईवे पर प्रवेश करना पीछे से तेज गति में आ रहे वाहनों के लिए काल बन जाता है।

 गलत स्थानों पर अवैध कट (Unauthorized Cuts)

राजमार्गों पर मनमाने तरीके से काटे गए कट दुर्घटनाओं का सबसे बड़ा केंद्र हैं। ग्रामीण आबादी को अपने घरों तक पहुंचने के लिए राजमार्ग के बीच डिवाइडर को तोड़कर जो कट बनाए गए हैं, वहां अक्सर वाहनों की आमने-सामने टक्कर होती है। इन स्थानों पर न तो कोई चेतावनी बोर्ड है और न ही गति को नियंत्रित करने के लिए रम्बल स्ट्रिप्स।

 ब्लैक स्पॉट्स की अनदेखी

जिले में ऐसे दर्जनों 'ब्लैक स्पॉट्स' (दुर्घटना संभावित क्षेत्र) हैं, जहां लगातार दुर्घटनाएं होती रही हैं, लेकिन सुधार के नाम पर केवल खानापूर्ति हुई है। वैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार, इन स्थानों पर सड़क का ढलान, मोड़ की बनावट और दृश्यता (Visibility) में खामियां हैं।

लचर ट्रैफिक प्रबंधन: एक और बड़ी चुनौती

इंजीनियरिंग की खामियों के साथ-साथ ट्रैफिक प्रबंधन की कमी ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है:

ट्रैफिक पुलिस की नाममात्र मौजूदगी: राजमार्गों के उन हिस्सों पर, जहां दुर्घटनाएं सबसे अधिक होती हैं, वहां ट्रैफिक पुलिस की गश्त न के बराबर है।

साइनबोर्ड और संकेतकों की कमी: रात के समय में राजमार्गों पर रिफ्लेक्टिव बोर्ड या उचित लाइटिंग न होने से चालकों को मोड़ का पता नहीं चल पाता।

अतिक्रमण (Encroachment): राजमार्गों के किनारे बसी छोटी-छोटी दुकानें और अवैध पार्किंग ने सड़क की चौड़ाई को कम कर दिया है, जिससे अचानक ब्रेक लगाने पर गाड़ियां अनियंत्रित हो जाती हैं।

स्थानीय नागरिकों का आक्रोश

स्थानीय निवासी और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि उन्होंने कई बार एनएचएआई (NHAI) और जिला प्रशासन को इन समस्याओं से अवगत कराया है, लेकिन 'फाइलें आगे बढ़ाने' के अलावा कुछ नहीं हुआ।

एक स्थानीय प्रबुद्ध नागरिक का कहना है, "हमें एक्सीलरेशन लेन चाहिए, हमें हाईवे के बीच में बने अवैध कट बंद चाहिए। हम अपनी जान दांव पर लगाकर घर नहीं जा सकते। क्या किसी अधिकारी का परिवार जब इस सड़क से गुजरेगा, तभी उन्हें ये खामियां दिखाई देंगी?"

तत्काल कार्रवाई की आवश्यकता और समाधान

मुंगेर के राजमार्गों को सुरक्षित बनाने के लिए प्रशासन को निम्नलिखित कदम तत्काल प्रभाव से उठाने होंगे:

ऑडिट और सुधार: एक स्वतंत्र तकनीकी टीम द्वारा पूरे जिले के राष्ट्रीय राजमार्ग का 'रोड सेफ्टी ऑडिट' करवाया जाए और चिन्हित कमियों को 30 दिनों के भीतर दूर किया जाए।

एक्सीलरेशन लेन का निर्माण: राजमार्ग से जुड़ने वाले सभी प्रमुख प्रवेश बिंदुओं पर एक्सीलरेशन लेन का अनिवार्य निर्माण हो।

अवैध कट का स्थायी समाधान: हाईवे पर स्थित सभी अनधिकृत कटों को स्थायी रूप से बंद किया जाए और ग्रामीणों के लिए अंडरपास या सर्विस रोड की व्यवस्था की जाए।

स्मार्ट ट्रैफिक मैनेजमेंट: हाई-डेफिनिशन सीसीटीवी कैमरे, स्पीड रडार गन और चेतावनी युक्त सेंसर आधारित लाइटें लगाई जाएं ताकि चालकों को आगे के खतरों के प्रति सचेत किया जा सके।

प्रशासन की जवाबदेही

दुर्घटनाओं के बाद मुआवजा देना या एफआईआर दर्ज करना समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। सरकार को इन राजमार्गों के ठेकेदारों और डिजाइनरों की जवाबदेही तय करनी चाहिए। यदि सड़क का डिजाइन ही असुरक्षित है, तो इसके लिए जिम्मेदार लोगों पर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि राजमार्गों का निर्माण जनता की सुविधा के लिए हो, न कि उनकी मृत्यु के कारण बनने के लिए।

मुंगेर की सड़कों पर बहता खून यह चीख-चीख कर कह रहा है कि कहीं न कहीं तंत्र में बड़ी भूल हुई है। अब समय आ गया है कि दिखावे की मरम्मत की जगह 'इंजीनियरिंग आधारित सुधार' किए जाएं। यदि प्रशासन ने इस मामले में तत्काल और प्रभावी कदम नहीं उठाए, तो भविष्य में और भी दुखद घटनाओं के लिए जिला तैयार रहे। राजमार्ग किसी के लिए अंतिम यात्रा का मार्ग न बनें, इसके लिए सुधार की गति तेज करनी होगी।