नीट पेपर लीक और छात्रों पर दमन के विरोध में भाकपा (माले) का उग्र प्रदर्शन; केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर गूंजा आसमान, राज्यभर में बढ़ता राजनीतिक पारा
भागलपुर, कार्यालय संवाददाता: देश भर में बहुचर्चित नीट (NEET) परीक्षा के पेपर लीक प्रकरण और इसके खिलाफ लोकतांत्रिक तरीके से आवाज उठा रहे छात्र-युवाओं पर पुलिसिया कार्रवाई को लेकर राजनीतिक सरगर्मी चरम पर पहुंच गई है। इसी राष्ट्रीय और राज्यव्यापी घटनाक्रम के तहत भागलपुर सहित बिहार के विभिन्न जिलों में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) यानी भाकपा (माले) के नेतृत्व में जोरदार विरोध-प्रदर्शन और आक्रोश मार्च निकाले गए। माले नेताओं ने केंद्र सरकार और राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के तत्काल इस्तीफे की मांग की है। पार्टी ने साफ कर दिया है कि देश के लाखों मेधावी छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वाले भ्रष्ट तंत्र को किसी भी सूरत में बख्शा नहीं जाएगा और युवाओं के हक की यह लड़ाई सड़क से लेकर सदन तक पूरी मजबूती के साथ लड़ी जाएगी।
क्या है पूरा मामला और क्यों सुलग रहा है बिहार?
हाल ही में आयोजित हुई देश की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा 'नीट' (NEET-UG) के दौरान प्रश्नपत्र लीक होने और व्यापक स्तर पर धांधली होने के सनसनीखेज खुलासे ने पूरे देश के छात्र जगत को झकझोर कर रख दिया है। इसके विरोध में राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर से लेकर संसद मार्ग तक और बिहार के विभिन्न विश्वविद्यालयों व जिला मुख्यालयों में छात्रों का आक्रोश फूट पड़ा है।
अभ्यर्थियों और विभिन्न छात्र संगठनों का आरोप है कि कड़ी मेहनत कर डॉक्टर बनने का सपना देखने वाले लाखों गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के बच्चों के सपनों पर भ्रष्टाचारियों ने पानी फेर दिया है।
इस पूरे घोटाले की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए केंद्रीय शिक्षा मंत्री को अपने पद से इस्तीफा देना चाहिए, क्योंकि देश की इतनी बड़ी परीक्षा प्रणाली को सुरक्षित रखने में मंत्रालय पूरी तरह विफल साबित हुआ है।
भाकपा (माले) का कड़ा रुख और राज्यव्यापी आंदोलन की रूपरेखा
नीट पेपर लीक और इसके खिलाफ दिल्ली व पटना समेत अन्य जगहों पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर हुए लाठीचार्ज तथा दमनकारी नीतियों के विरोध में भाकपा (माले) आक्रामक तेवर अपनाए हुए है। पार्टी नेताओं का कहना है कि सरकार छात्रों की आवाज सुनने के बजाय उन पर पुलिसिया बल का प्रयोग कर रही है, जो पूरी तरह अलोकतांत्रिक और निंदनीय है।
भाकपा (माले) और उससे जुड़े छात्र संगठनों (जैसे आइसा) ने इस मुद्दे पर सरकार को घेरते हुए विभिन्न जिलों में नुक्कड़ सभाएं, प्रतिवाद मार्च और पुतला दहन कार्यक्रम आयोजित किए हैं।
पार्टी ने देश और राज्य के युवाओं से आह्वान किया है कि वे शिक्षा माफियाओं और भ्रष्ट प्रशासनिक व्यवस्था के खिलाफ एकजुट होकर एक बड़ा जन-आंदोलन खड़ा करें।
भागलपुर में दिखा आक्रोश, पुलिस-प्रशासन पूरी तरह अलर्ट
राज्य के अन्य हिस्सों की तरह भागलपुर में भी नीट पेपर लीक और छात्र आंदोलन को लेकर सरगर्मी तेज बनी हुई है। विपक्षी दलों और वामपंथी संगठनों के तेवर को देखते हुए जिला प्रशासन और पुलिस महकमा पूरी तरह से सतर्क मोड में नजर आ रहा है।
भागलपुर के प्रमुख चौराहों, संवेदनशील स्थानों और सरकारी कार्यालयों के आस-पास सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं।
स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा लगातार यह नजर रखी जा रही है कि विधि-व्यवस्था बनी रहे, हालांकि विपक्षी दलों के कार्यकर्ता लगातार केंद्रीय तानाशाही और शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं।
माले नेताओं के तीखे तेवर: "छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं"
भागलपुर और आसपास के क्षेत्रों में प्रदर्शनों के दौरान माले व अन्य वामपंथी नेताओं ने केंद्र सरकार पर जमकर निशाना साधा। नेताओं ने दोटूक शब्दों में कहा कि एक तरफ सरकार 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' और युवाओं को आगे बढ़ाने के बड़े-बड़े दावे करती है, वहीं दूसरी तरफ पेपर लीक कराने वाले सिंडिकेट को संरक्षण दिया जा रहा है।
सीबीआई जांच और पारदर्शिता की मांग: पार्टी ने मांग की है कि पेपर लीक के इस पूरे नेटवर्क की उच्चस्तरीय और निष्पक्ष न्यायिक जांच कराई जाए ताकि इसमें शामिल बड़े से बड़े सफेदपोश चेहरों को बेनकाब किया जा सके।
लाठीचार्ज और मुकदमों की वापसी: प्रदर्शन के दौरान छात्रों पर दर्ज किए गए झूठे मुकदमों को तत्काल प्रभाव से वापस लिया जाए और घायल छात्रों को समुचित मुआवजा दिया जाए।
शिक्षा मंत्री का इस्तीफा: जब तक केंद्रीय शिक्षा मंत्री अपने पद से इस्तीफा नहीं देते, तब तक देश भर के छात्र और नौजवान सड़क पर उतरकर विरोध प्रदर्शन जारी रखेंगे।
भागलपुर सहित पूरे बिहार में नीट पेपर लीक के विरोध में भाकपा (माले) का मुखर होना और राष्ट्रव्यापी आक्रोश जताना इस बात का प्रमाण है कि यह मुद्दा अब केवल परीक्षा की गड़बड़ी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह देश के करोड़ों युवाओं के भविष्य और रोजगार के अधिकारों की एक बड़ी राजनीतिक लड़ाई बन चुका है। प्रशासनिक बंदिशों और गिरफ्तारियों के बावजूद छात्रों और वामदलों का यह तेवर आने वाले दिनों में सरकार के लिए और अधिक मुश्किलें खड़ी कर सकता है।