34 साल पुराने विस्फोट मामले में बड़ा फैसला, साक्ष्य के अभाव में तीनों आरोपित बरी; अदालत ने दिया संदेह का लाभ
पटना। करीब 34 वर्ष पुराने बहुचर्चित विस्फोट मामले में अदालत ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए तीनों आरोपितों को सभी आरोपों से बरी कर दिया। लंबी न्यायिक प्रक्रिया के बाद अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे सिद्ध करने में सफल नहीं हो सका। उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर दोष सिद्ध नहीं होने के कारण अदालत ने आरोपितों को संदेह का लाभ देते हुए बरी करने का आदेश पारित किया।
यह मामला वर्ष 1991 में हुए एक विस्फोट से जुड़ा था, जिसकी सुनवाई कई वर्षों तक विभिन्न चरणों में चलती रही। आखिरकार एडीजे-2 सह एमपी/एमएलए स्पेशल जज ब्रजेश कुमार सिंह की अदालत ने विस्तृत सुनवाई के बाद अपना फैसला सुनाया।
1991 में दर्ज हुई थी प्राथमिकी
मामले की शुरुआत 2 नवंबर 1991 को हुई थी। शिकायतकर्ता राम लखन सिंह ने स्वयं इस संबंध में प्राथमिकी दर्ज कराई थी। प्राथमिकी में कहा गया था कि सुबह करीब 11 बजे उनके आवासीय परिसर स्थित गोहाल (पशुशाला) में अचानक जोरदार विस्फोट हुआ।
विस्फोट इतना शक्तिशाली था कि गोहाल की खपरैल की छत उड़ गई और घटना में एक व्यक्ति घायल हो गया। इस घटना के बाद इलाके में दहशत फैल गई थी और पुलिस ने मामले की जांच शुरू की थी।
जांच के दौरान बदला केस का रुख
प्राथमिकी दर्ज होने के बाद पुलिस ने मामले की विस्तृत जांच शुरू की। जांच के दौरान पुलिस ने घटनास्थल का निरीक्षण किया, गवाहों के बयान दर्ज किए और उपलब्ध साक्ष्यों को एकत्र किया।
हालांकि, जांच के दौरान पुलिस ने शिकायतकर्ता के प्रारंभिक आरोपों को स्वीकार नहीं किया। जांच एजेंसी ने अपनी रिपोर्ट में राम लखन सिंह, सूरजभान सिंह और ललन सिंह को ही इस मामले में आरोपित बना दिया। इसके बाद तीनों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई आगे बढ़ाई गई।
वर्षों तक चली कानूनी प्रक्रिया
मामले की जांच पूरी होने के बाद अदालत में आरोपपत्र दाखिल किया गया। इसके बाद मुकदमे की सुनवाई वर्षों तक विभिन्न चरणों में चलती रही।
लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद 21 अप्रैल 2018 को अदालत ने तीनों आरोपितों के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 307 (हत्या का प्रयास), 324 (खतरनाक हथियार से चोट पहुंचाना), 427 (संपत्ति को नुकसान पहुंचाना), 120बी (आपराधिक षड्यंत्र) तथा विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की संबंधित धाराओं के तहत आरोप तय किए।
आरोप तय होने के बाद नियमित रूप से गवाहों की गवाही और साक्ष्यों की जांच का सिलसिला जारी रहा।
अभियोजन पक्ष आरोप साबित नहीं कर सका
सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने पुलिस अधिकारियों सहित विभिन्न गवाहों को अदालत में प्रस्तुत किया। साथ ही उपलब्ध दस्तावेजी और अन्य साक्ष्यों के आधार पर आरोपों को सिद्ध करने का प्रयास किया गया।
लेकिन अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष प्रस्तुत किए गए साक्ष्यों और गवाहों के माध्यम से आरोपों को संदेह से परे साबित करने में सफल नहीं हो सका। कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध नहीं थे, जिससे आरोपों की पुष्टि नहीं हो सकी।
अदालत ने दिया संदेह का लाभ
सभी पक्षों की दलीलें सुनने और उपलब्ध रिकॉर्ड का विस्तृत परीक्षण करने के बाद एडीजे-2 सह एमपी/एमएलए स्पेशल जज ब्रजेश कुमार सिंह ने अपना फैसला सुनाया।
अदालत ने कहा कि आपराधिक मामलों में दोष सिद्ध करने की जिम्मेदारी अभियोजन पक्ष की होती है। यदि उपलब्ध साक्ष्य आरोपों को पूरी तरह प्रमाणित नहीं करते हैं, तो आरोपित को संदेह का लाभ दिया जाना चाहिए।
इसी सिद्धांत के आधार पर अदालत ने तीनों आरोपितों को सभी आरोपों से बरी कर दिया।
न्यायिक प्रक्रिया का अहम उदाहरण
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला भारतीय न्याय प्रणाली के उस मूल सिद्धांत को दर्शाता है, जिसके अनुसार किसी भी व्यक्ति को तब तक दोषी नहीं माना जा सकता जब तक उसके खिलाफ आरोप संदेह से परे सिद्ध न हो जाएं।
अदालत ने भी अपने निर्णय में इसी सिद्धांत का पालन करते हुए केवल उपलब्ध साक्ष्यों और कानूनी तथ्यों के आधार पर फैसला सुनाया।
लंबित मामलों पर भी उठे सवाल
करीब 34 वर्षों तक चले इस मुकदमे ने न्यायिक प्रक्रिया की लंबी अवधि पर भी चर्चा छेड़ दी है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इतने लंबे समय तक मुकदमा चलने से गवाहों, साक्ष्यों और दस्तावेजों पर भी प्रभाव पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि गंभीर आपराधिक मामलों का समयबद्ध निस्तारण न्याय व्यवस्था को और अधिक प्रभावी बना सकता है।
फैसले के बाद कानूनी स्थिति
अदालत के फैसले के बाद तीनों आरोपितों को इस मामले में राहत मिल गई है। हालांकि, यदि अभियोजन पक्ष निर्णय को चुनौती देना चाहे, तो वह उच्च न्यायालय में अपील करने के लिए स्वतंत्र है। अंतिम कानूनी स्थिति आगे की न्यायिक प्रक्रिया पर निर्भर करेगी।
करीब तीन दशक से अधिक समय तक चले इस विस्फोट मामले का अंत अदालत के फैसले के साथ हुआ, जिसमें साक्ष्यों के अभाव और आरोप सिद्ध नहीं होने के कारण तीनों आरोपितों को बरी कर दिया गया। यह निर्णय एक बार फिर इस सिद्धांत को रेखांकित करता है कि आपराधिक मामलों में केवल आरोप पर्याप्त नहीं होते, बल्कि दोष सिद्ध करने के लिए ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य आवश्यक होते हैं। अदालत ने उपलब्ध तथ्यों और कानून के आधार पर संदेह का लाभ देते हुए तीनों आरोपितों को दोषमुक्त घोषित कर दिया।