कारी कोसी नदी पर चचरी पुल डूबने से नाव ही एकमात्र सहारा, ग्रामीणों की दुर्दशा पर प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की चुप्पी पर उठ रहे गंभीर सवाल
बिहार के पूर्णिया जिले के रूपौली प्रखंड के अंतर्गत आने वाली कांप पंचायत से एक ऐसी दर्दनाक और विचलित करने वाली तस्वीर सामने आई है, जो हमारे देश के ग्रामीण विकास के दावों और प्रशासनिक लचर व्यवस्था पर करारा तंज कसती है। रूपौली प्रखंड के कांप पंचायत में कारी कोसी नदी पर आज तक एक स्थायी पुल का निर्माण नहीं कराया जा सका है, जिसके कारण स्थानीय निवासियों, स्कूली बच्चों, किसानों और बुजुर्गों को रोजमर्रा की जिंदगी में भारी नरकीय यंत्रणाओं का सामना करना पड़ रहा है। हाल ही में हुई बारिश और नदी के जलस्तर में वृद्धि के कारण ग्रामीणों द्वारा आपसी सहयोग से बनाया गया चचरी पुल पानी में डूब गया है, जिससे इस क्षेत्र का संपर्क पूरी तरह से कट गया है। अब मजबूरी में ग्रामीणों को अपनी जान जोखिम में डालकर नाव के सहारे आर-पार यात्रा करनी पड़ रही है।
क्या है पूरा मामला? क्यों भुगत रहे हैं कांप पंचायत के ग्रामीण?
प्राप्त विस्तृत विवरण के अनुसार, रूपौली प्रखंड की कांप पंचायत के विभिन्न गांवों के बीच से कारी कोसी नदी गुजरती है। नदी के उस पार अपने खेतों, बाजारों, स्कूलों और अस्पतालों तक पहुँचने के लिए स्थानीय ग्रामीणों के पास आवागमन का कोई सुगम साधन नहीं है। पूर्व के वर्षों में जब सरकार या प्रशासन की ओर से कोई पक्का पुल नहीं बनाया गया, तो ग्रामीणों ने अपनी गाढ़ी कमाई और श्रमदान से नदी के ऊपर एक 'चचरी पुल' (बांस-बल्लियों का अस्थायी पुल) का निर्माण किया था।
लेकिन मानसून की शुरुआत और नदी में पानी बढ़ने के साथ ही वह चचरी पुल भी जलमग्न होकर पूरी तरह डूब गया। पुल के डूबने के बाद अब ग्रामीणों के सामने आवागमन का एकमात्र विकल्प नाव बचा है। इस स्थिति ने एक बार फिर स्थानीय जनप्रतिनिधियों और जिला प्रशासन की उदासीनता को उजागर कर दिया है, जिससे आम जनता में भारी आक्रोश व्याप्त है।
ग्रामीणों की रोजमर्रा की जिंदगी बनी जंग: नाव ही एकमात्र सहारा
कारी कोसी नदी पर स्थायी पुल के अभाव में कांप पंचायत के लोगों का जीवन बुरी तरह अस्त-व्यस्त हो चुका है। स्थिति की गंभीरता को निम्नलिखित रूपों में समझा जा सकता है:
छात्रों की शिक्षा पर ग्रहण: नदी के इस पार से उस पार स्कूल और कॉलेज जाने वाले विद्यार्थियों की पढ़ाई बुरी तरह प्रभावित हो रही है। माता-पिता अपने बच्चों को नाव से स्कूल भेजने में सहमे रहते हैं, क्योंकि थोड़ी सी भी असावधानी किसी बड़े हादसे का कारण बन सकती है।
स्वास्थ्य सेवाओं का संकट: यदि रात-विरात या आपातकाल (Emergency) की स्थिति में कोई व्यक्ति गंभीर रूप से बीमार हो जाए या गर्भवती महिला को अस्पताल ले जाना पड़े, तो नाव के सहारे नदी पार करना मौत को दावत देने जैसा साबित होता है। एम्बुलेंस समय पर गांव तक नहीं पहुँच पाती है।
किसानों और व्यापारियों की मुसीबतें: इस पंचायत के अधिकांश लोग कृषि कार्य से जुड़े हैं। किसानों को अपनी फसल बाजार तक बेचने ले जाने में भारी परिवहन लागत और जोखिम उठाना पड़ता है, जिससे उनकी आर्थिक कमर टूट रही है।
वर्षों से की जा रही है स्थायी पुल की मांग, आश्वासन के सिवाय कुछ नहीं मिला
स्थानीय निवासियों का कहना है कि उन्होंने क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों, विधायकों, सांसदों और जिला प्रशासन के अधिकारियों को कई बार लिखित और मौखिक रूप से कारी कोसी नदी पर एक पक्के (आरसीसी) पुल के निर्माण के लिए आवेदन सौंपा है। हर चुनाव के दौरान राजनेताओं द्वारा बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं कि चुनाव जीतने के बाद सबसे पहले पुल का निर्माण कराया जाएगा, लेकिन चुनाव खत्म होते ही जनता की सुधि लेने वाला कोई नहीं बचता।
ग्रामीणों ने दर्द बयां करते हुए कहा कि वे हर साल बाढ़ और जलजले के इस मौसम में अपनी जान जोखिम में डालकर नदी पार करने को विवश हैं। क्या सरकार किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रही है, तब जाकर यहाँ पुल का निर्माण कराया जाएगा?
प्रशासनिक अमले और सरकार से जनता की पुरजोर मांग
कांप पंचायत के आक्रोशित ग्रामीणों, युवाओं और बुद्धिजीवियों ने एक स्वर में जिला प्रशासन और राज्य सरकार से निम्नलिखित सख्त और त्वरित मांगें की हैं:
तत्काल वैकल्पिक व्यवस्था: कारी कोसी नदी पर वर्तमान में नावों के संचालन को सुरक्षित बनाया जाए और लाइफ जैकेट की व्यवस्था हो, ताकि कोई दुर्घटना न घटे।
पक्के पुल का निर्माण (आरसीसी ब्रिज): कांप पंचायत के पास कारी कोसी नदी पर तत्काल प्रभाव से एक स्थायी उच्चस्तरीय आरसीसी पुल के निर्माण की प्रशासनिक स्वीकृति दी जाए।
जवाबदेही तय हो: ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं (सड़क और पुल) के अभाव के लिए जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय की जाए।
रूपौली के कांप पंचायत की यह विडंबना यह साबित करती है कि जब तक जमीनी स्तर पर विकास योजनाओं का क्रियान्वयन ईमानदारी से नहीं होगा, तब तक आम जनता इसी तरह बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष करती रहेगी।