बिहार में इको-टूरिज्म को मिलेगा बड़ा विस्तार, अगले पांच वर्षों में 60 से 70 पर्यटन स्थल विकसित करने का लक्ष्य; कैमूर बनेगा दूसरा टाइगर रिजर्व
पटना। बिहार सरकार राज्य के पर्यटन क्षेत्र को नई पहचान देने और प्राकृतिक धरोहरों को वैश्विक स्तर पर स्थापित करने की दिशा में तेजी से काम कर रही है। सरकार ने इको-टूरिज्म (Eco-Tourism) को अपनी पर्यटन नीति की प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल किया है। इसका उद्देश्य केवल पर्यटन को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण, जैव विविधता के संवर्धन, स्थानीय रोजगार सृजन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करना भी है।
पर्यटन विभाग के अनुसार वर्तमान में बिहार में 10 से 15 सक्रिय इको-टूरिज्म स्थल पर्यटकों के लिए विकसित हैं, जबकि 24 से अधिक प्रमुख प्राकृतिक स्थलों का तेजी से विकास किया जा रहा है। इसके अलावा सरकार ने 50 से अधिक नए संभावित इको-टूरिज्म स्थलों की पहचान भी कर ली है। लक्ष्य है कि अगले पांच वर्षों में राज्य में 60 से 70 इको-टूरिज्म स्थलों का विकास कर बिहार को देश के प्रमुख प्रकृति पर्यटन राज्यों की श्रेणी में शामिल किया जाए।
इको-टूरिज्म पर सरकार का विशेष फोकस
राज्य सरकार का मानना है कि बिहार केवल ऐतिहासिक और धार्मिक पर्यटन तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां प्राकृतिक सौंदर्य, वन्यजीव, झीलें, पहाड़ियां, जलप्रपात और जैव विविधता भी बड़ी संख्या में पर्यटकों को आकर्षित करने की क्षमता रखते हैं।
इसी सोच के तहत पर्यटन विभाग और वन एवं पर्यावरण विभाग मिलकर ऐसे स्थलों का विकास कर रहे हैं जहां पर्यटक प्रकृति के बीच समय बिताने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी प्राप्त कर सकें।
अगले पांच वर्षों में बड़ा विस्तार
पर्यटन विभाग ने राज्य में इको-टूरिज्म के विस्तार के लिए महत्वाकांक्षी योजना तैयार की है।
वर्तमान में जहां 10 से 15 प्रमुख स्थल सक्रिय हैं, वहीं 24 से अधिक स्थानों पर आधारभूत पर्यटन सुविधाओं का विकास जारी है। इसके अलावा 50 से अधिक संभावित स्थलों की पहचान कर भविष्य की योजनाओं में शामिल किया गया है।
यदि योजना सफलतापूर्वक लागू होती है तो अगले पांच वर्षों में बिहार में इको-टूरिज्म स्थलों की संख्या बढ़कर 60 से 70 तक पहुंच जाएगी।
वाल्मीकि टाइगर रिजर्व सबसे बड़ा आकर्षण
पर्यटन विभाग के अनुसार पश्चिम चंपारण स्थित वाल्मीकि टाइगर रिजर्व बिहार का सबसे महत्वपूर्ण इको-टूरिज्म केंद्र है।
यह राज्य का एकमात्र अधिसूचित टाइगर रिजर्व है और अपनी घनी तराई के जंगलों, समृद्ध जैव विविधता, बाघों, हाथियों, तेंदुओं, हिरणों और अनेक दुर्लभ वन्यजीवों के लिए प्रसिद्ध है।
नेपाल की सीमा से सटा होने के कारण यह क्षेत्र अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों को भी आकर्षित करता है। यहां जंगल सफारी, बर्ड वॉचिंग और प्राकृतिक वातावरण का अनूठा अनुभव मिलता है।
कैमूर को बनाया जा रहा दूसरा टाइगर रिजर्व
राज्य सरकार कैमूर वन्यजीव अभयारण्य को दूसरे टाइगर रिजर्व के रूप में विकसित करने की दिशा में कार्य कर रही है।
कैमूर अपनी ऊंची पहाड़ियों, घने जंगलों, प्राकृतिक झरनों और ट्रैकिंग मार्गों के लिए प्रसिद्ध है। यहां जैव विविधता भी अत्यंत समृद्ध है।
सरकार का मानना है कि टाइगर रिजर्व का दर्जा मिलने के बाद यह क्षेत्र राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रमुख पर्यटन केंद्र बन सकता है, जिससे स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे।
भीमबांध और गौतम बुद्ध अभयारण्य भी होंगे विकसित
राज्य के प्रमुख इको-टूरिज्म स्थलों में भीमबांध वन्यजीव अभयारण्य और गौतम बुद्ध वन्यजीव अभयारण्य भी शामिल हैं।
इन क्षेत्रों में प्राकृतिक जंगल, वन्यजीव, जैव विविधता और शांत वातावरण पर्यटकों को प्रकृति के करीब आने का अवसर प्रदान करते हैं।
पर्यटन विभाग यहां बेहतर सड़क, सूचना केंद्र, पर्यटक सुविधाएं और पर्यावरण-अनुकूल पर्यटन गतिविधियों के विकास पर भी काम कर रहा है।
विक्रमशिला डॉल्फिन अभयारण्य का अनूठा अनुभव
विक्रमशिला गंगा डॉल्फिन अभयारण्य बिहार के सबसे आकर्षक इको-टूरिज्म स्थलों में से एक माना जाता है।
यहां पर्यटक नाव की सैर के दौरान गंगा नदी में तैरती दुर्लभ गंगा डॉल्फिन को प्राकृतिक वातावरण में देख सकते हैं।
यह अनुभव देश के चुनिंदा पर्यटन स्थलों में ही उपलब्ध है और हर वर्ष बड़ी संख्या में प्रकृति प्रेमियों तथा शोधकर्ताओं को आकर्षित करता है।
कावर झील बनेगी बर्ड वॉचिंग का बड़ा केंद्र
कावर झील पक्षी अभयारण्य भी राज्य की प्रमुख प्राकृतिक धरोहरों में शामिल है।
यह एशिया की सबसे बड़ी मीठे पानी की झीलों में गिनी जाती है। सर्दियों के मौसम में यहां साइबेरिया और दुनिया के अन्य हिस्सों से हजारों प्रवासी पक्षी आते हैं।
सरकार यहां बर्ड वॉचिंग, प्रकृति भ्रमण और पर्यावरण शिक्षा को बढ़ावा देने की दिशा में विशेष योजनाएं तैयार कर रही है।
राजगीर, ककोलत और घोड़ा कटोरा भी होंगे आकर्षण
इको-टूरिज्म विस्तार योजना में राजगीर का पहाड़ी क्षेत्र, ककोलत जलप्रपात, घोड़ा कटोरा, बराबर-गुरुपा पहाड़ियां तथा सूरजपुर वेटलैंड जैसे स्थलों को भी प्रमुखता दी गई है।
इन क्षेत्रों में प्राकृतिक सौंदर्य, हरियाली, पहाड़ियां, झीलें और जलप्रपात पर्यटकों को आकर्षित करते हैं।
इन स्थानों पर पर्यटक सुविधाओं के विस्तार, सड़क संपर्क, स्वच्छता, सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
स्थानीय रोजगार और अर्थव्यवस्था को मिलेगा बढ़ावा
विशेषज्ञों का मानना है कि इको-टूरिज्म का विस्तार केवल पर्यटन तक सीमित नहीं रहेगा।
इससे स्थानीय युवाओं के लिए गाइड, होटल, होम-स्टे, परिवहन, हस्तशिल्प, स्थानीय उत्पादों की बिक्री और अन्य सेवा क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी इससे सीधा लाभ मिलने की संभावना है।
पर्यावरण संरक्षण पर रहेगा विशेष जोर
सरकार ने स्पष्ट किया है कि सभी इको-टूरिज्म परियोजनाओं का विकास पर्यावरण संरक्षण के सिद्धांतों के अनुरूप किया जाएगा।
वनों, वन्यजीवों, जल स्रोतों और जैव विविधता को नुकसान पहुंचाए बिना पर्यटन गतिविधियों का विस्तार किया जाएगा। इसके लिए स्थानीय समुदायों की भागीदारी भी सुनिश्चित की जाएगी।
बिहार की नई पर्यटन पहचान
पर्यटन विभाग का मानना है कि यदि निर्धारित योजनाएं समय पर पूरी हो जाती हैं तो बिहार की पहचान केवल धार्मिक और ऐतिहासिक पर्यटन तक सीमित नहीं रहेगी।
राज्य प्रकृति पर्यटन, वन्यजीव पर्यटन, एडवेंचर पर्यटन और ग्रामीण पर्यटन के क्षेत्र में भी राष्ट्रीय स्तर पर अपनी अलग पहचान बना सकेगा।
बिहार सरकार द्वारा इको-टूरिज्म के व्यापक विस्तार की योजना राज्य के पर्यटन क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण पहल साबित हो सकती है। वाल्मीकि टाइगर रिजर्व, प्रस्तावित कैमूर टाइगर रिजर्व, विक्रमशिला गंगा डॉल्फिन अभयारण्य, कावर झील, भीमबांध, राजगीर, ककोलत और अन्य प्राकृतिक स्थलों के विकास से राज्य में पर्यटन को नई गति मिलने की उम्मीद है।
अगले पांच वर्षों में 60 से 70 इको-टूरिज्म स्थलों के विकास का लक्ष्य केवल पर्यटकों को आकर्षित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे पर्यावरण संरक्षण, स्थानीय रोजगार, ग्रामीण विकास और बिहार की आर्थिक प्रगति को भी नई दिशा मिलने की संभावना है।