सहरसा में पावन श्रावण मास की भव्य शुरुआत: 30 जुलाई से गूंजेगा 'हर-हर महादेव' का उद्घोष; पहली सोमवारी पर मधुश्रावणी पूजा और मौना पंचमी के दुर्लभ संयोग से शिव भक्तों में भारी उत्साह

 

भक्ति, आराधना और प्रकृति के श्रृंगार का प्रतीक पवित्र श्रावण मास (सावन) इस वर्ष सहरसा समेत पूरे कोसींचल में बेहद खास और आध्यात्मिक ऊर्जा से भरपूर रहने वाला है। सनातन धर्म में शिव भक्तों के लिए सबसे प्रिय माने जाने वाले इस माह की शुरुआत इस बार 30 जुलाई से होने जा रही है। सावन के पहले दिन से ही शिवालयों में जलाभिषेक और बेलपत्र अर्पण का सिलसिला शुरू हो जाएगा। खास बात यह है कि इस वर्ष सावन के पहले ही सप्ताह में भक्तों को अद्भुत और दुर्लभ संयोग देखने को मिलेंगे, जिससे इस मास का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व कई गुना बढ़ गया है। पंचांग के अनुसार, इस वर्ष सावन मास की पहली सोमवारी 3 अगस्त को पड़ेगी। इस पावन दिन भगवान शिव की आराधना के साथ-साथ मिथिलांचल के प्रसिद्ध लोकपर्व मधुश्रावणी पूजा और नाग देवता की उपासना से जुड़े मौना पंचमी का एक अत्यंत दुर्लभ एवं शुभ संयोग एक साथ बन रहा है। इस विशेष अवसर को लेकर सहरसा के मंदिरों, बाजारों और घरों में अभी से ही तैयारियां और उत्साह का माहौल देखा जा रहा है।

क्या है श्रावण मास का आध्यात्मिक और धार्मिक महत्व?

सनातन परंपरा में श्रावण मास को चातुर्मास का सबसे प्रमुख और पवित्र महीना माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सावन के पूरे महीने में भगवान शिव माता पार्वती के साथ पृथ्वी पर विचरण करते हैं और अपने भक्तों की हर मनोकामना को पूर्ण करते हैं।

रुद्राभिषेक और जलाभिषेक की महिमा: सावन के महीने में भगवान शिव का जलाभिषेक, दुग्धाभिषेक और रुद्राभिषेक करने से समस्त पापों का नाश होता है और जीवन में सुख-शांति व समृद्धि का वास होता है।

कांवड़ यात्रा और बोलबम का गूंजता नाद: सहरसा जिले के विभिन्न घाटों और शिव मंदिरों में भी सावन के दौरान कांवरियों का तांता लगा रहता है। बोलबम के जयकारों से पूरा वातावरण शिवमय हो जाता है। सुप्रसिद्ध बाबा बटेश्वरनाथ मंदिर हो या शहर के अन्य प्राचीन शिवालय, हर जगह विशेष पूजा-अर्चना की तैयारियां पूरी कर ली गई हैं।

अगस्त को पहली सोमवारी: मधुश्रावणी पूजा और मौना पंचमी का महासंयोग

इस वर्ष सावन की पहली सोमवारी (3 अगस्त) कई मायनों में बेहद खास रहने वाली है। इस दिन ज्योतिषीय दृष्टिकोण से एक ऐसा अद्भुत संयोग बन रहा है जो पूजा-पाठ और व्रत के लिहाज से अत्यंत फलदायी माना गया है:

मधुश्रावणी पूजा का विशेष महत्व: मिथिलांचल की संस्कृति और परंपरा में नवविवाहिताओं के लिए मधुश्रावणी का पर्व सबसे बड़ा और पवित्र अनुष्ठान माना जाता है। यह पर्व सावन मास के कृष्ण पक्ष की पंचमी तिथि से शुरू होकर शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि तक चलता है। नवविवाहिताएं अपने अखंड सौभाग्य, पति की लंबी आयु और पारिवारिक सुख-समृद्धि के लिए नाग देवता, महादेव और माता पार्वती की विधिवत पूजा करती हैं। पहली सोमवारी के दिन मधुश्रावणी पूजा का होना इस पर्व के उल्लास को और अधिक बढ़ा रहा है।

मौना पंचमी का शुभ संयोग: इसी दिन नाग उपासना का पावन पर्व मौना पंचमी भी मनाया जाएगा। इस दिन लोग उपवास रखकर नाग देवता की पूजा करते हैं और प्रकृति व जीवों की रक्षा का संकल्प लेते हैं। सोमवार के दिन पंचमी तिथि का पड़ना शिव और नागराज दोनों की एक साथ आराधना का दुर्लभ अवसर प्रदान करता है, क्योंकि भगवान शिव अपने गले में नाग को आभूषण के रूप में धारण करते हैं।

सहरसा में शिव मंदिरों और बाजारों में उमंग का माहौल

श्रावण मास की आहट मात्र से ही सहरसा का पूरा बाजार और सामाजिक परिवेश पूरी तरह बदल गया है। मंदिरों की साफ-सफाई, रंग-रोगन और फूलों से सजावट का कार्य अंतिम चरण में है।

बाजारों में रौनक: सावन के महीने में हरे रंग के वस्त्र, चूड़ियां, पूजन सामग्री, रुद्राक्ष, बेलपत्र और मिट्टी के शिवलिंग की खरीदारी के लिए बाजारों में महिलाओं और श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ने लगी है। दुकानदारों ने भी सावन को लेकर विशेष तैयारियां की हैं।

मिठाइयों और पारंपरिक व्यंजनों की मांग: मधुश्रावणी पर्व और सावन के विशेष पकवानों के लिए स्थानीय बाजारों में पारंपरिक मिठाइयों की मांग काफी बढ़ गई है। नवविवाहिताओं के मायके से आने वाले 'भार' (उपहार और मिठाइयां) की परंपरा को निभाने के लिए लोग अभी से खरीदारी में जुट गए हैं।

सुरक्षा, शांति और प्रशासनिक व्यवस्थाएं

श्रावण मास के दौरान सहरसा के प्रमुख मंदिरों में उमड़ने वाली भारी भीड़ को देखते हुए जिला प्रशासन और मंदिर समितियों ने भी पुख्ता इंतजाम करने शुरू कर दिए हैं। सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम, बैरिकेडिंग, पेयजल की व्यवस्था और चिकित्सा शिविरों की स्थापना की रूपरेखा तैयार की जा रही है ताकि श्रद्धालुओं को किसी भी प्रकार की असुविधा का सामना न करना पड़े।