श्रावणी मेले में अटूट आस्था का सैलाब; कांवर कंधे पर रखते ही भीतर से जाग उठती है असीम ऊर्जा और प्रसन्नता, शिवभक्तों ने बयां किए अपने अनुभव
भागलपुर/सुल्तानगंज, कार्यालय संवाददाता: सावन मास के पवित्र महीने में देवभूमि कही जाने वाली उत्तरवाहिनी गंगा के पावन तट सुल्तानगंज से जब हजारों शिवभक्त केसरिया वस्त्र धारण कर अपनी यात्रा का आरंभ करते हैं, तो पूरा वातावरण 'बोल बम' और 'हर-हर महादेव' के जयकारों से गूंज उठता है। दुनिया की सबसे अनोखी और कठिन मानी जाने वाली इस पैदल कांवर यात्रा को लेकर श्रद्धालुओं में जो उत्साह देखने को मिलता है, वह शब्दों में बयां करना कठिन है। इन सबके बीच कांवरियों के दिलों-दिमाग पर जो आध्यात्मिक प्रभाव पड़ता है, उसे लेकर शिवभक्तों का साफ कहना है कि "जैसे ही पवित्र गंगाजल से भरा कांवर कंधे पर रखा जाता है, शरीर की सारी थकान गायब हो जाती है और भीतर से एक अलौकिक प्रसन्नता तथा अपार ऊर्जा का संचार होने लगता है।" यह अनुभव केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि हर उस कांवरिया का है जो इस महाकुंभ में अपनी आस्था की डोर थामे आगे बढ़ रहा है।
कांवर उठाते ही बदल जाती है शारीरिक और मानसिक स्थिति
सुल्तानगंज के अजगैबीनाथ घाट से जल भरकर जब कांवरिए अपने कंधों पर कांवड़ टिकाते हैं, तो उनके जीवन का एक नया और आध्यात्मिक अध्याय शुरू होता है:
कंधे पर बोझ नहीं, भगवान का आशीर्वाद: आम दिनों में वजन उठाना थका देने वाला हो सकता है, लेकिन कांवर यात्रा में कंधे पर रखा गया कांवड़ भक्तों के लिए कोई बोझ नहीं, बल्कि देवाधिदेव महादेव का आशीर्वाद होता है। झारखंड के देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम तक की लगभग 105 किलोमीटर लंबी इस कठिन पैदल यात्रा में कांवरियों के कदम भले ही छाले पड़ने से लड़खड़ा जाएं, लेकिन उनका आंतरिक उत्साह कभी कम नहीं होता।
अलौकिक ऊर्जा का अहसास: कई अनुभवी कांवरियों ने बातचीत के दौरान बताया कि जब तक वे कांवर नहीं उठाते, तब तक भले ही उनके मन में लंबी यात्रा को लेकर थोड़ा संशय या शारीरिक कमजोरी महसूस होती हो, लेकिन जैसे ही कांवर कंधे पर सजती है, उनके भीतर एक ऐसी अज्ञानी सी शक्ति और ऊर्जा जागृत हो जाती है जो उन्हें बिना रुके लगातार आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।
शिवभक्तों की जुबानी: क्या कहते हैं यात्रा करने वाले कांवरिया?
बिहार के विभिन्न जिलों के अलावा उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, झारखंड, मध्य प्रदेश और देश के अन्य कोनों से आए कांवरियों ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि इस यात्रा का हर एक पल उनके लिए अद्वितीय होता है:
बिहार के रोहतास से पहुंचे युवा कांवरिया राहुल कुमार ने बताया, "यह मेरी तीसरी कांवर यात्रा है। जब मैंने इस बार सुल्तानगंज घाट से जल उठाकर कांवड़ अपने कंधे पर रखी, तो मुझे ऐसा महसूस हुआ मानो मेरे अंदर कोई नई आत्मा या ऊर्जा आ गई हो। रास्ते भर पैर दुखते हैं, रास्ते की मुश्किलें आती हैं, लेकिन कंधे पर रखा कांवर और मुंह से निकलता 'बोल बम' का नारा सारी ऊर्जा वापस ले आता है।"
झारखंड के दुमका से आए एक बुजुर्ग शिवभक्त अनंत झा ने भावुक होकर कहा, "बढ़ती उम्र के कारण मुझे लग रहा था कि मैं शायद इस बार इतनी लंबी पदयात्रा पूरी नहीं कर पाऊंगा। लेकिन जब मैंने गंगाजल भरकर कांवड़ अपने कंधे पर धारण किया, तो बाबा भोलेनाथ की ऐसी कृपा हुई कि शरीर में एक गजब की फुर्ती आ गई। अंदर से जो आनंद और प्रसन्नता मिल रही है, उसे शब्दों में नहीं बांधा जा सकता।"
कठिन मार्ग और आसान बनती राहें: आस्था का चमत्कार
सुल्तानगंज से देवघर तक का सफर तय करने में कांवरियों को कई प्रकार की भौगोलिक चुनौतियों और मौसम की मार का सामना करना पड़ता है:
धूप, छांव और बारिश का संघर्ष: सावन के महीने में कभी चिलचिलाती धूप तो कभी मूसलाधार बारिश कांवरियों के मार्ग को कठिन बना देती है। कच्चा रास्ता, कंकर-पत्थर और पैरों के छाले किसी की भी हिम्मत तोड़ सकते हैं।
आस्था की शक्ति से दूर होती बाधाएं: इन तमाम दुश्वारियों के बावजूद कांवरियों के चेहरे पर उदासी के बजाय एक अलग ही तेज और संतोष दिखाई देता है। उनका मानना है कि यह केवल उनकी शारीरिक क्षमता नहीं है, बल्कि कंधे पर रखे गए पवित्र कांवर और उसमें मौजूद गंगाजल की पवित्रता है जो उन्हें हर कठिनाई से लड़ने की शक्ति प्रदान करती है।
मानसिक शांति और आंतरिक आनंद का मार्ग
मनोवैज्ञानिकों और आध्यात्मिक गुरुओं का भी मानना है कि इस प्रकार की सामूहिक और निष्ठावान धार्मिक यात्राएं व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव डालती हैं:
तनाव से मुक्ति: आधुनिक भागदौड़ भरी जिंदगी और मानसिक तनाव से दूर, जब व्यक्ति पूरी तरह से भगवान शिव की भक्ति में लीन हो जाता है, तो उसका मन शांत हो जाता है।
सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह: जब कोई कांवरिया अनुशासित होकर 'बोल बम' के संकल्प के साथ आगे बढ़ता है, तो उसके भीतर की नकारात्मकता समाप्त हो जाती है और एक नई सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, जिससे उसे अंदर से गहरी प्रसन्नता की अनुभूति होती है।
कांवर कंधे पर रखते ही अंदर से उत्पन्न होने वाली असीम प्रसन्नता और ऊर्जा इस बात का जीवंत प्रमाण है कि मानव आस्था में वह ताकत है जो असंभव को भी संभव बना देती है। सुल्तानगंज से शुरू होकर देवघर तक की यह यात्रा केवल एक धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि मनुष्य की जिजीविषा, भक्ति और आंतरिक दृढ़संकल्प का एक पावन पर्व है। कंधे पर रखा गया वह कांवर भक्तों के लिए केवल जल का पात्र नहीं, बल्कि उनके जीवन को ऊर्जावान और आनंदित बनाने का एक सबसे बड़ा माध्यम बन जाता है, जो हर कांवरिया को जीवन भर के लिए संबल प्रदान करता है।