विकास का वादा या छलावा: पतरघट में अधूरी सड़क परियोजना को लेकर ग्रामीणों का फूटा गुस्सा, प्रदर्शन कर जताई नाराजगी
पतरघट: सहरसा जिले के पतरघट प्रखंड के अंतर्गत लक्ष्मीपुर से तिलाठी तक जाने वाली मुख्य सड़क, जो कभी क्षेत्र की जीवनरेखा मानी जाती थी, आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रही है। सड़क की जर्जर स्थिति और मुख्य मार्ग पर स्थित पुल के धंस जाने के कारण आवागमन पूरी तरह से बाधित हो गया है। इस लापरवाही के खिलाफ शनिवार को आक्रोशित ग्रामीणों ने सड़कों पर उतरकर जोरदार प्रदर्शन किया और प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी की।
368.67 लाख की योजना: कागजों में दौड़ती है, सड़क पर नहीं
ग्रामीणों के अनुसार, लक्ष्मीपुर से तिलाठी तक की इस महत्वपूर्ण सड़क के नवनिर्माण के लिए सरकार द्वारा करीब 368.67 लाख रुपये की बड़ी राशि स्वीकृत की गई थी। इस परियोजना का उद्देश्य क्षेत्र की कनेक्टिविटी को बेहतर बनाना था। ठेका एजेंसी और विभागीय अधिकारियों के बीच हुए अनुबंध के तहत, इस सड़क का कार्य 18 मई 2026 तक हर हाल में पूर्ण हो जाना था।
आज जब समय सीमा समाप्त हुए भी कई दिन बीत चुके हैं, सड़क का एक बड़ा हिस्सा अभी भी अधूरा पड़ा है। कहीं गड्ढे तो कहीं धूल के गुबार, और सबसे खतरनाक—बीच सड़क पर धंसा हुआ पुल, जो किसी बड़ी दुर्घटना को आमंत्रण दे रहा है।
प्रदर्शन का दृश्य: "सड़क नहीं तो वोट नहीं"
शनिवार सुबह से ही लक्ष्मीपुर और तिलाठी के दर्जनों ग्रामीण हाथों में बैनर-पोस्टर लेकर मुख्य मार्ग पर एकत्रित हो गए। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि निर्माण कार्य में न केवल देरी की जा रही है, बल्कि उपयोग की जा रही निर्माण सामग्री की गुणवत्ता भी अत्यंत घटिया है।
प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि:
घटिया सामग्री: सड़क निर्माण में मानक के विपरीत गिट्टी और बालू का उपयोग किया जा रहा है, जिससे बनी-बनाई सड़क भी कुछ ही दिनों में उखड़ गई है।
बिचौलिया संस्कृति: विभाग और ठेकेदार की मिलीभगत के कारण काम अधूरा छोड़ दिया गया है।
प्रशासन की चुप्पी: ग्रामीणों ने कई बार स्थानीय जनप्रतिनिधियों और विभागीय कनीय अभियंता (JE) से गुहार लगाई, लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन ही मिला।
पुल का धंसना: मौत के साये में सफर
इस मार्ग पर एक पुराना पुल है जो निर्माण कार्य के दौरान ही धंस गया है। ग्रामीणों का कहना है कि यह पुल पिछले कुछ महीनों से जर्जर स्थिति में है, लेकिन इसकी मरम्मत की सुध किसी ने नहीं ली। रात के अंधेरे में वाहन चालकों को इस धंसे हुए पुल का पता नहीं चल पाता, जिससे अक्सर छोटे-मोटे हादसे होते रहते हैं। यदि समय रहते इसकी मरम्मत नहीं की गई, तो यह किसी बड़ी अनहोनी का कारण बन सकता है।
प्रशासन और ठेकेदार की लापरवाही
निर्माण कार्य में देरी का कारण पूछे जाने पर कोई भी जिम्मेदार अधिकारी संतोषजनक जवाब देने को तैयार नहीं है। पतरघट के आम नागरिकों का कहना है कि 3.68 करोड़ रुपये से अधिक की इस परियोजना के समय पर पूरा न होने से उनका व्यापार प्रभावित हो रहा है। स्कूली बच्चों, मरीजों और दैनिक यात्रियों के लिए 5 किलोमीटर की दूरी तय करना भी आज एक पहाड़ चढ़ने जैसा कठिन हो गया है।
ग्रामीणों की मांगें
प्रदर्शन के दौरान ग्रामीणों ने प्रशासन के समक्ष अपनी मांगें पुरजोर तरीके से रखी हैं:
कार्य की तत्काल समीक्षा: जिला प्रशासन अविलंब इस सड़क परियोजना की जांच करे और अधूरे कार्य को तुरंत शुरू कराए।
ठेकेदार पर कार्रवाई: समय सीमा बीतने के बाद भी कार्य पूरा न करने वाली निर्माण एजेंसी को ब्लैकलिस्ट किया जाए और उन पर जुर्माना लगाया जाए।
पुल की मरम्मत: धंसे हुए पुल की अविलंब मरम्मत की जाए ताकि जनहानि न हो।
गुणवत्ता जांच: सड़क निर्माण में प्रयुक्त सामग्री की निष्पक्ष जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी से कराई जाए।
भविष्य की राह: आंदोलन और चेतावनी
प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि अगले 15 दिनों के भीतर सड़क निर्माण का कार्य गति नहीं पकड़ता और धंसे हुए पुल की मरम्मत नहीं होती, तो वे पतरघट प्रखंड कार्यालय पर अनिश्चितकालीन धरना शुरू करेंगे। उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि अब झूठे वादों से उनका पेट नहीं भरने वाला, उन्हें धरातल पर विकास चाहिए।
पतरघट की यह सड़क परियोजना केवल कंक्रीट और तारकोल का मामला नहीं है, बल्कि यह जनता के विश्वास की परीक्षा भी है। समय सीमा के भीतर काम पूरा न होना सरकारी तंत्र की विफलता को दर्शाता है। विकास की राह में जो बाधाएं आज सड़क की स्थिति के रूप में खड़ी हैं, उन्हें हटाना प्रशासन की जिम्मेदारी है।
अब देखना यह है कि प्रशासन कब नींद से जागता है और कब पतरघट के लोगों को यह सड़क सुलभ हो पाती है। फिलहाल, क्षेत्र के लोगों में भारी गुस्सा है और स्थानीय प्रशासन पर उचित कार्रवाई का दबाव बढ़ गया है।