लोकभवन की 'नि:शुल्क इंटर्नशिप' के नाम पर छात्रों से लिए जा रहे थे 500 रुपये, उजागर हुआ फर्जीवाड़ा

भागलपुर: शिक्षा के मंदिरों में जब भ्रष्टाचार की घुसपैठ होती है, तो उसका सबसे बड़ा खामियाजा युवाओं को भुगतना पड़ता है। भागलपुर में 'लोकभवन' नाम की एक संस्था द्वारा संचालित इंटर्नशिप कार्यक्रम को लेकर एक बड़ा विवाद सामने आया है। दावा किया गया था कि यह इंटर्नशिप पूर्णतः 'नि:शुल्क' (Free) है, लेकिन हकीकत में हर विद्यार्थी से पंजीकरण और अन्य शुल्कों के नाम पर 500 रुपये की अवैध वसूली की जा रही थी। इस खुलासे के बाद से स्थानीय छात्र संगठनों और अभिभावकों में भारी आक्रोश है।

क्या है पूरा मामला?

लोकभवन ने हाल ही में क्षेत्र के स्नातक और स्नातकोत्तर छात्रों के लिए एक इंटर्नशिप कार्यक्रम की घोषणा की थी। विज्ञापनों और सोशल मीडिया पोस्ट के माध्यम से छात्रों को यह आश्वासन दिया गया था कि यह एक 'स्किल डेवलपमेंट' पहल है और इसके लिए कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा। छात्रों को उम्मीद थी कि इस इंटर्नशिप से उन्हें व्यावहारिक ज्ञान और अनुभव मिलेगा।

लेकिन, जब छात्र पंजीकरण कराने पहुंचे, तो उन्हें बताया गया कि तकनीकी प्रक्रियाओं, आईडी कार्ड और अन्य प्रशासनिक कार्यों के लिए 'नाममात्र शुल्क' के रूप में 500 रुपये का भुगतान करना अनिवार्य है। आर्थिक रूप से कमजोर कई छात्रों ने मेहनत-मजदूरी करके यह राशि जुटाई, लेकिन बाद में उन्हें न तो कोई आधिकारिक रसीद मिली और न ही इंटर्नशिप का कोई स्पष्ट शेड्यूल।

छात्रों का फूटा गुस्सा

इस फर्जीवाड़े की जानकारी मिलते ही पीड़ित छात्रों ने आवाज उठानी शुरू की। मंगलवार को दर्जनों छात्र लोकभवन कार्यालय के बाहर एकत्र हुए और प्रबंधन से स्पष्टीकरण मांगा। छात्रों का आरोप है कि उन्हें इंटर्नशिप के नाम पर बरगलाया गया है।

एक पीड़ित छात्रा ने अपना दर्द बयां करते हुए कहा, "हमें बताया गया था कि यह सरकार समर्थित या नि:शुल्क पहल है। 500 रुपये एक गरीब छात्र के लिए बड़ी रकम होती है। हम यहां कौशल सीखने आए थे, न कि ठगी का शिकार होने।"

प्रशासन की चुप्पी और सवालिया निशान

संस्था के प्रबंधन से जब इस बारे में सवाल किए गए, तो उन्होंने इसे 'पंजीकरण शुल्क' (Registration Fee) का नाम देकर पल्ला झाड़ने की कोशिश की। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि यदि इंटर्नशिप नि:शुल्क थी, तो फिर यह शुल्क क्यों? क्या संस्था के पास इस वसूली का कोई कानूनी आधार है?

स्थानीय प्रशासन और शिक्षा विभाग अभी तक इस मामले पर पूरी तरह चुप्पी साधे हुए है। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि शहर में चल रहे निजी प्रशिक्षण केंद्रों पर निगरानी न होने का फायदा ऐसी संस्थाएं उठा रही हैं।

'नि:शुल्क' के जाल में फंसाने की रणनीति

जानकारों के अनुसार, यह एक सुनियोजित जालसाजी (Scam) का हिस्सा हो सकता है। युवाओं की बेरोजगारी और कौशल विकास के प्रति उनकी ललक को देखते हुए ऐसी संस्थाएं 'नि:शुल्क' का लालच देकर बड़ी संख्या में छात्रों को आकर्षित करती हैं। यदि एक बैच में 200 छात्र भी होते हैं, तो 500 रुपये प्रति छात्र के हिसाब से एक बार में 1 लाख रुपये की अवैध कमाई आसानी से हो जाती है।

आगे की राह: क्या करेंगे छात्र?

छात्र संगठनों ने अब इस मामले को जिलाधिकारी (DM) के पास ले जाने का निर्णय लिया है। उन्होंने मांग की है कि:

लोकभवन द्वारा छात्रों से ली गई अवैध राशि तुरंत वापस की जाए।

इस पूरे प्रकरण की जांच हो कि क्या संस्था के पास इंटर्नशिप कराने का कोई वैध लाइसेंस या मान्यता है।

जिले के अन्य निजी शिक्षण संस्थानों की भी जांच की जाए ताकि भविष्य में किसी और छात्र के साथ ऐसा न हो।

यह घटना एक बार फिर छात्रों को सचेत करती है कि किसी भी इंटर्नशिप या कोर्स में शामिल होने से पहले संस्था की साख और उसके नियमों की पूरी तरह जांच-पड़ताल कर लेनी चाहिए। यदि कोई संस्था 'नि:शुल्क' के दावे के साथ पैसे की मांग करती है, तो वहां सावधानी बरतनी जरूरी है।

 शिक्षा और कौशल के नाम पर छात्रों से अवैध वसूली करना न केवल अनैतिक है, बल्कि कानूनन अपराध भी है। लोकभवन का यह मामला प्रशासन के लिए एक चेतावनी है कि वे शिक्षण केंद्रों पर अपनी पकड़ मजबूत करें। छात्रों की मेहनत और उनके सपनों का इस तरह से दोहन बंद होना चाहिए।