पूर्णिया में धूमधाम से मनाई गई कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद की 146वीं जयंती: कला भवन में आयोजित मासिक संगोष्ठी की विस्तृत रिपोर्ट
बिहार के पूर्णिया जिले स्थित कला भवन के साहित्य विभाग की मासिक संगोष्ठी के अंतर्गत रविवार को हिंदी साहित्य के अमर कथाकार, ‘कथा सम्राट’ मुंशी प्रेमचंद की 146वीं जयंती अत्यंत धूमधाम और श्रद्धा के साथ मनाई गई। इस अवसर पर जिले के कई जाने-माने साहित्यकार, लेखक, और कलाप्रेमी उपस्थित रहे। कार्यक्रम के दौरान मुंशी प्रेमचंद के जीवन, उनके उपन्यासों, कहानियों और उनके द्वारा भारतीय समाज में लाई गई वैचारिक क्रांति पर विस्तार से चर्चा की गई। वक्ताओं ने उनके साहित्य को आज के दौर में भी उतना ही प्रासंगिक बताया।
कार्यक्रम की पृष्ठभूमि और आयोजन (Background and Organization)
कला भवन साहित्य विभाग द्वारा हर महीने इस प्रकार की साहित्यिक संगोष्ठियों का आयोजन किया जाता है, जिसका उद्देश्य स्थानीय लेखकों को मंच प्रदान करना और महान साहित्यिक विभूतियों को याद करना है।
जयंती का विशेष आयोजन: मुंशी प्रेमचंद भारतीय साहित्य के ऐसे स्तंभ हैं, जिनकी रचनाओं ने समाज के हर वर्ग को छुआ है। उनकी 146वीं जयंती के अवसर पर पूर्णिया के साहित्य प्रेमियों ने उन्हें अनूठे अंदाज में श्रद्धांजलि अर्पित की।
सभागार का माहौल: कार्यक्रम स्थल पर प्रेमचंद के जीवन और उनकी प्रमुख कृतियों (जैसे गोदान, गबन, निर्मला, सेवासदन आदि) से जुड़े पोस्टर्स लगाए गए थे, जिससे पूरा माहौल साहित्यिक रंग में रंग गया था।
दीप प्रज्वलन और माल्यार्पण (Inauguration and Tributes)
कार्यक्रम की शुरुआत मुख्य अतिथियों द्वारा दीप प्रज्वलन और मुंशी प्रेमचंद के तैलচিত্র पर माल्यार्पण के साथ हुई।
श्रद्धांजलि अर्पित करना: उपस्थित सभी साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों ने दो मिनट का मौन रखकर और फूल अर्पित कर महान कथाकार को नमन किया।
अतिथियों का स्वागत: विभाग के समन्वयकों ने आए हुए सभी वक्ताओं और मेहमानों का स्वागत पुस्तकों और अंग वस्त्र से सम्मानित कर किया।
मुंशी प्रेमचंद के साहित्य और जीवन पर विचार (Discussions on Literature and Life)
संगोष्ठी के मुख्य सत्र में वक्ताओं ने प्रेमचंद की रचनाधर्मिता पर अपने विचार रखे:
यथार्थवादी लेखन: वक्ताओं ने कहा कि प्रेमचंद ने अपनी कहानियों और उपन्यासों में कल्पना की दुनिया से बाहर आकर समाज की जमीनी हकीकत, किसानों के दर्द, शोषित वर्ग की पीड़ा और महिलाओं की स्थिति का जो सजीव चित्रण किया है, वह अद्वितीय है।
गोदान और ग्रामीण भारत: चर्चा के दौरान विशेष रूप से 'गोदान' उपन्यास का जिक्र किया गया, जिसमें भारतीय किसान की त्रासदी और उसकी व्यवस्था को बहुत ही मार्मिक ढंग से दर्शाया गया है।
आधुनिक समाज में प्रासंगिकता: आज के दौर में भी भ्रष्टाचार, गरीबी, और सामाजिक असमानता जैसी समस्याएं जस की तस हैं, इसलिए प्रेमचंद के साहित्य का अध्ययन आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना उनके समय में था।
स्थानीय कवियों और लेखकों की प्रस्तुतियां (Presentations by Local Poets and Writers)
इस संगोष्ठी में पूर्णिया के स्थानीय रचनाकारों ने भी अपनी प्रस्तुतियां दीं:
काव्य पाठ और आलेख: कई युवा और वरिष्ठ लेखकों ने प्रेमचंद के जीवन दर्शन पर आधारित अपनी कविताएं और लघु आलेख पाठ किए।
संस्मरण: कुछ वक्ताओं ने प्रेमचंद के जीवन से जुड़े अनछुए पहलुओं को साझा किया कि कैसे उन्होंने भारी संघर्षों के बावजूद लिखना नहीं छोड़ा और साहित्य को ही अपना जीवन मान लिया।
कला भवन में आयोजित यह 146वीं जयंती समारोह यह साबित करता है कि पूर्णिया के लोग अपनी साहित्यिक धरोहर और संस्कृति से गहराई से जुड़े हुए हैं। इस आयोजन ने विशेष रूप से नई पीढ़ी के युवाओं को मुंशी प्रेमचंद की रचनाओं को पढ़ने और उनसे प्रेरणा लेने के लिए प्रोत्साहित किया है। कार्यक्रम का समापन धन्यवाद ज्ञापन और राष्ट्रगीत के साथ हुआ।