वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय में जेआरएफ के 89 शोधार्थियों में 13 बने सहायक प्राध्यापक, अब चुनना होगा नौकरी या शोधवृत्ति

आरा,  वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय से जुड़े जेआरएफ शोधार्थियों के लिए एक महत्वपूर्ण स्थिति सामने आई है। विश्वविद्यालय में जूनियर रिसर्च फेलोशिप (जेआरएफ) के लिए पंजीकृत 89 अभ्यर्थियों में से 13 शोधार्थियों का चयन सहायक प्राध्यापक के पद पर हुआ है। सहायक प्राध्यापक के पद पर नियुक्ति और योगदान के बाद इन शोधार्थियों को फुलटाइम पीएचडी जारी रखने के बजाय नौकरी को प्राथमिकता देनी होगी। इसका सीधा प्रभाव उन्हें मिल रही यूजीसी की जेआरएफ शोधवृत्ति पर भी पड़ेगा।

विश्वविद्यालय प्रशासन के स्तर पर इस स्थिति को लेकर प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। जानकारी के अनुसार, सहायक प्राध्यापक के पद पर चयनित शोधार्थियों को अब जेआरएफ के तहत मिलने वाली शोधवृत्ति छोड़नी होगी। नियमों के अनुसार एक ही समय में सहायक प्राध्यापक के रूप में वेतन और फुलटाइम जेआरएफ शोधवृत्ति का लाभ एक साथ नहीं लिया जा सकता। ऐसे में चयनित शोधार्थियों को दोनों में से किसी एक विकल्प का चयन करना होगा।

इस बीच महत्वपूर्ण बात यह है कि अभी तक विश्वविद्यालय में पंजीकृत किसी भी जेआरएफ शोधार्थी ने सहायक प्राध्यापक पद पर चयन और योगदान के संबंध में विश्वविद्यालय प्रशासन को औपचारिक रूप से सूचना नहीं दी है। जेआरएफ के नोडल पदाधिकारी डॉ. आनंद भूषण पांडेय ने भी इसकी पुष्टि करते हुए कहा है कि अब तक किसी चयनित अभ्यर्थी ने इस संबंध में विश्वविद्यालय को जानकारी नहीं दी है।

89 जेआरएफ शोधार्थियों में 13 का चयन

वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय में वर्तमान समय में जेआरएफ के लिए कुल 89 शोधार्थी पंजीकृत बताए जा रहे हैं। इनमें से 13 शोधार्थियों ने सहायक प्राध्यापक पद की नियुक्ति प्रक्रिया में सफलता हासिल की है। इन शोधार्थियों के लिए यह उपलब्धि महत्वपूर्ण है, क्योंकि एक ओर उन्हें विश्वविद्यालय और महाविद्यालयों में शिक्षण का अवसर मिलेगा, वहीं दूसरी ओर उनका शोध कार्य भी प्रभावित होगा।

सहायक प्राध्यापक के रूप में नियुक्ति मिलने के बाद शोधार्थियों को संबंधित कॉलेजों में योगदान करना होगा। 10 अगस्त को चयनित अभ्यर्थियों को संबंधित कॉलेजों में योगदान करने की तिथि निर्धारित है। इसी कारण विश्वविद्यालय स्तर पर जेआरएफ शोधवृत्ति की आगे की प्रक्रिया को लेकर भी सावधानी बरती जा रही है।

नियुक्ति के बाद शोधार्थियों की प्राथमिक जिम्मेदारी सहायक प्राध्यापक के रूप में शिक्षण कार्य और संस्थान से जुड़ी जिम्मेदारियों का निर्वहन करना होगा। ऐसे में फुलटाइम पीएचडी के लिए निर्धारित समय और शोधवृत्ति की पात्रता पर प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है।

एक साथ नहीं मिल सकता वेतन और जेआरएफ

जेआरएफ के तहत शोधार्थियों को यूजीसी की ओर से प्रतिमाह शोधवृत्ति प्रदान की जाती है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, शोधार्थियों को हर महीने करीब 42 हजार से 50 हजार रुपये तक की शोधवृत्ति मिलती है। शोध कार्य के दौरान यह राशि शोधार्थियों के लिए आर्थिक सहायता का महत्वपूर्ण माध्यम होती है।

लेकिन सहायक प्राध्यापक के पद पर चयन होने के बाद स्थिति बदल जाएगी। नौकरी से वेतन प्राप्त करने वाले शोधार्थी को जेआरएफ शोधवृत्ति का लाभ जारी रखने की अनुमति नहीं होगी। यानी चयनित अभ्यर्थी को दोनों में से किसी एक का विकल्प चुनना होगा।

इस व्यवस्था का उद्देश्य एक ही व्यक्ति को एक साथ दो अलग-अलग स्रोतों से नियमित आर्थिक लाभ मिलने की स्थिति को रोकना है। इसलिए सहायक प्राध्यापक के पद पर नियुक्ति और योगदान के बाद जेआरएफ शोधवृत्ति की पात्रता समाप्त होने की स्थिति बनती है।

फुलटाइम पीएचडी पर भी पड़ेगा असर

सहायक प्राध्यापक के पद पर नियुक्ति का असर केवल शोधवृत्ति तक सीमित नहीं रहेगा। नियुक्ति के बाद चयनित शोधार्थियों को फुलटाइम पीएचडी भी छोड़नी होगी। इसका अर्थ है कि वे पहले की तरह पूर्णकालिक शोधार्थी के रूप में अपनी पीएचडी जारी नहीं रख सकेंगे।

शोधार्थियों के लिए यह एक महत्वपूर्ण निर्णय होगा। फुलटाइम पीएचडी के दौरान उन्हें शोध कार्य, डेटा संग्रह, अध्ययन, शोधपत्र लेखन और विश्वविद्यालय से संबंधित शोध गतिविधियों में समय देना होता है। वहीं सहायक प्राध्यापक के रूप में नियुक्ति के बाद शिक्षण कार्य, कक्षाओं की जिम्मेदारी, विद्यार्थियों के शैक्षणिक मार्गदर्शन और कॉलेज की अन्य जिम्मेदारियां निभानी होंगी।

इस कारण दोनों जिम्मेदारियों को एक साथ पूर्णकालिक रूप से निभाना संभव नहीं माना जाता है।

अगस्त की शोधवृत्ति की अग्रिम स्वीकृति स्थगित

सहायक प्राध्यापक के पद पर चयनित 13 शोधार्थियों के मामले के कारण अगस्त महीने की शोधवृत्ति की अग्रिम स्वीकृति भी स्थगित कर दी गई है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने यह कदम इसलिए उठाया है, क्योंकि 10 अगस्त को सभी चयनित अभ्यर्थियों को संबंधित कॉलेजों में योगदान करना है।

यदि शोधार्थी सहायक प्राध्यापक के पद पर योगदान करते हैं तो उनकी जेआरएफ पात्रता की स्थिति बदल जाएगी। ऐसे में बिना स्थिति स्पष्ट किए अगस्त महीने की शोधवृत्ति की अग्रिम स्वीकृति देने से बाद में भुगतान या पात्रता से संबंधित समस्या उत्पन्न हो सकती है।

इसी कारण विश्वविद्यालय स्तर पर फिलहाल शोधवृत्ति की प्रक्रिया को रोककर स्थिति स्पष्ट होने का इंतजार किया जा रहा है।

विश्वविद्यालय को सूचना देना जरूरी

जेआरएफ के नोडल पदाधिकारी डॉ. आनंद भूषण पांडेय के अनुसार, अभी तक किसी भी चयनित अभ्यर्थी ने सहायक प्राध्यापक पद पर चयन और योगदान के संबंध में विश्वविद्यालय को सूचना नहीं दी है।

विश्वविद्यालय प्रशासन के लिए यह सूचना इसलिए महत्वपूर्ण है, ताकि यह तय किया जा सके कि संबंधित शोधार्थी अब जेआरएफ के लिए पात्र हैं या नहीं। नौकरी में योगदान के बाद उनकी शोधवृत्ति को जारी रखना नियमों के अनुरूप होगा या नहीं, इसका निर्धारण भी इसी आधार पर किया जाएगा।

चयनित शोधार्थियों की ओर से औपचारिक सूचना मिलने के बाद विश्वविद्यालय संबंधित रिकॉर्ड को अपडेट कर सकता है और शोधवृत्ति से जुड़ी प्रक्रिया को आगे बढ़ा सकता है।

शोधार्थियों के सामने बड़ा फैसला

सहायक प्राध्यापक पद पर चयनित 13 शोधार्थियों के सामने अब करियर से जुड़ा महत्वपूर्ण फैसला है। एक ओर उन्हें नियमित शिक्षण सेवा में प्रवेश का अवसर मिला है, जबकि दूसरी ओर जेआरएफ के माध्यम से शोध कार्य को जारी रखने का विकल्प है।

सहायक प्राध्यापक की नौकरी लंबे समय के करियर के लिहाज से महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जाती है। दूसरी ओर जेआरएफ शोधवृत्ति शोधार्थियों को पीएचडी और उच्च स्तरीय शोध के लिए आर्थिक सहायता देती है।

ऐसे में चयनित अभ्यर्थियों को अपनी प्राथमिकता के अनुसार फैसला करना होगा। यदि वे सहायक प्राध्यापक पद पर योगदान करते हैं तो उन्हें जेआरएफ शोधवृत्ति छोड़नी होगी। वहीं यदि वे फुलटाइम जेआरएफ शोध जारी रखना चाहते हैं तो नौकरी को लेकर अलग निर्णय लेना पड़ सकता है।

शोध कार्य और शिक्षण दोनों की अपनी अहमियत

उच्च शिक्षा व्यवस्था में शोध और शिक्षण दोनों की महत्वपूर्ण भूमिका है। जेआरएफ के माध्यम से विश्वविद्यालयों में गुणवत्तापूर्ण शोध को बढ़ावा मिलता है। वहीं सहायक प्राध्यापकों की नियुक्ति से कॉलेजों में शिक्षण व्यवस्था मजबूत होती है।

13 जेआरएफ शोधार्थियों का सहायक प्राध्यापक के रूप में चयन इस लिहाज से भी महत्वपूर्ण है कि शोध के क्षेत्र में आगे बढ़ रहे अभ्यर्थियों को अब उच्च शिक्षा संस्थानों में शिक्षक के रूप में काम करने का अवसर मिलेगा।

भविष्य में ये शोधार्थी अपने शोध अनुभव और अकादमिक ज्ञान का उपयोग विद्यार्थियों के शिक्षण में कर सकते हैं। हालांकि नियुक्ति के बाद फुलटाइम पीएचडी और जेआरएफ शोधवृत्ति से अलग होना उनके तत्काल शोध कार्य को प्रभावित कर सकता है।

10 अगस्त के बाद स्थिति होगी स्पष्ट

चयनित अभ्यर्थियों को 10 अगस्त को संबंधित कॉलेजों में योगदान करना है। इसके बाद यह स्थिति और स्पष्ट होगी कि कितने शोधार्थी नौकरी में योगदान करते हैं और कितने जेआरएफ जारी रखने का विकल्प चुनते हैं।

विश्वविद्यालय प्रशासन को भी चयनित अभ्यर्थियों की ओर से औपचारिक सूचना मिलने की उम्मीद है। सूचना मिलने के बाद शोधवृत्ति और पंजीकरण से संबंधित रिकॉर्ड में आवश्यक बदलाव किए जा सकते हैं।

अगस्त महीने की शोधवृत्ति की अग्रिम स्वीकृति भी इसी कारण फिलहाल स्थगित रखी गई है।

शोधार्थियों के लिए नियमों की जानकारी जरूरी

ऐसी स्थिति में शोधार्थियों के लिए जेआरएफ और नियुक्ति से जुड़े नियमों की जानकारी होना बेहद जरूरी है। किसी भी प्रकार की गलत जानकारी या दोहरी आर्थिक सुविधा लेने की स्थिति में बाद में भुगतान की वसूली या प्रशासनिक कार्रवाई जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।

इसलिए चयनित अभ्यर्थियों को विश्वविद्यालय प्रशासन और संबंधित नियामक संस्थाओं के नियमों के अनुसार अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होगी। नौकरी में योगदान से पहले या उसके तुरंत बाद विश्वविद्यालय को सूचना देना भी महत्वपूर्ण होगा।

विश्वविद्यालय प्रशासन की नजर चयनित अभ्यर्थियों पर

फिलहाल विश्वविद्यालय प्रशासन की नजर 13 चयनित जेआरएफ शोधार्थियों पर है। इन शोधार्थियों के योगदान और उनके द्वारा दी जाने वाली जानकारी के आधार पर आगे की प्रक्रिया तय होगी।

जेआरएफ नोडल पदाधिकारी द्वारा यह स्पष्ट किया गया है कि अभी तक किसी चयनित अभ्यर्थी ने इस संबंध में विश्वविद्यालय को सूचना नहीं दी है। ऐसे में आने वाले दिनों में चयनित अभ्यर्थियों की ओर से मिलने वाली जानकारी महत्वपूर्ण होगी।