114 एएनएम (ANM) को पिछले तीन महीनों से नहीं मिला कोई काम; स्वास्थ्य उपकेंद्र चिह्नित न होने से अधर में लटका करियर, प्रशासनिक हलकों में मचा हड़कंप

बिहार के स्वास्थ्य महकमे में कुव्यवस्था और प्रशासनिक सुस्ती का एक और हैरान करने वाला मामला प्रकाश में आया है। सूबे के प्रमुख जिलों में शुमार मुजफ्फरपुर से एक ऐसी खबर सामने आई है, जो स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवालिया निशान खड़े करती है। मुजफ्फरपुर जिले में स्वास्थ्य विभाग के अंतर्गत चयनित और नियुक्त की गईं 114 एएनएम (Auxiliary Nurse Midwife) को पिछले तीन महीनों से कोई काम नहीं मिल रहा है

हाल ही में स्वास्थ्य विभाग द्वारा की गई एक उच्च-स्तरीय समीक्षा (Review Meeting) के दौरान यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया कि इन महिला स्वास्थ्यकर्मियों की तैनाती जिले के विभिन्न स्वास्थ्य उपकेंद्रों (Health Sub-Centres) में की जानी थी, लेकिन संबंधित उपकेंद्रों के ठीक से चिह्नित (Identify) न होने के कारण इन्हें कार्यस्थल पर पदस्थापित नहीं किया जा सका। नतीजतन, ये सभी एएनएम बिना किसी काम के घर बैठने या दफ्तरों के चक्कर काटने को विवश हैं, जबकि सरकार द्वारा इन्हें वेतन या मानदेय का भुगतान भी करना पड़ रहा है। आइए मुजफ्फरपुर के इस प्रशासनिक और स्वास्थ्यगत संकट, इसके कारणों और इससे जुड़े विभिन्न पहलुओं का विस्तार से विश्लेषण करते हैं।

पृष्ठभूमि: क्या है पूरा मामला और कैसे खुला राज?

स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ करने और ग्रामीण इलाकों तक चिकित्सा सुविधाएं पहुंचाने के लिए सरकार लगातार नियुक्तियां करती है। इसी प्रक्रिया के तहत मुजफ्फरपुर जिले में भी बड़ी संख्या में एएनएम का चयन किया गया था, ताकि जमीनी स्तर पर टीकाकरण, प्रसव पूर्व देखभाल और अन्य स्वास्थ्य कार्यक्रमों को गति मिल सके।

तीन महीने से खाली बैठी हैं 114 एएनएम: नियुक्त होने और कागजी प्रक्रिया पूरी होने के बावजूद इन 114 एएनएम को पिछले 90 दिनों से अधिक समय से कोई आधिकारिक कार्य आबंटित नहीं किया गया है। वे रोजाना कागजी खानापूर्ति के लिए कार्यालयों का रुख करती हैं, लेकिन उन्हें कोई जिम्मेदारी नहीं मिलती।

समीक्षा बैठक में हुआ खुलासा: हाल ही में जब जिला स्वास्थ्य समिति और सिविल सर्जन कार्यालय द्वारा जिले के स्वास्थ्य कार्यों और कर्मियों की तैनाती की समीक्षा की गई, तब यह गंभीर मामला खुलकर सामने आया कि इतनी बड़ी संख्या में प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी बिना किसी काम के बेकार बैठे हैं।

काम न मिलने का मुख्य कारण: उपकेंद्रों का चिह्नित न होना

समीक्षा रिपोर्ट में जो सबसे बड़ा प्रशासनिक लूपहोल सामने आया है, वह है जमीनी स्तर पर बुनियादी तैयारी की कमी।

तैनाती की अधूरी योजना: विभाग द्वारा एएनएम की बहाली तो कर ली गई, लेकिन उनकी पोस्टिंग के लिए जिन स्वास्थ्य उपकेंद्रों को तैयार किया जाना था या जिन्हें चिह्नित किया जाना था, उनका निर्धारण समय पर पूरा नहीं किया जा सका।

समन्वय की कमी: जिला स्वास्थ्य विभाग और स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों के बीच आपसी समन्वय की कमी के कारण यह फाइलें दफ्तरों में ही धूल फांकती रहीं। उपकेंद्रों के भवन निर्माण या वहां आवश्यक इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार न होने के कारण इन एएनएम को वहां भेजा नहीं जा सका।

इस लापरवाही के गंभीर दुष्परिणाम

एक तरफ जहां बिहार के ग्रामीण और दूर-दराज के इलाकों में डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों की भारी कमी की बात कही जाती है, वहीं दूसरी ओर मुजफ्फरपुर में 114 ट्रेंड एएनएम का तीन महीने तक बेरोजगार बैठना कई गंभीर समस्याएं पैदा करता है:

राजस्व और जनता के पैसों की बर्बादी: सरकार इन स्वास्थ्यकर्मियों पर बजट से वेतन या मानदेय खर्च कर रही है, लेकिन जनता को उनकी सेवाओं का कोई लाभ नहीं मिल पा रहा है। यह सीधे तौर पर जनधन की बर्बादी है।

कर्मचारियों में मानसिक पीड़ा और निराशा: जो युवा पेशेवर अपनी पढ़ाई पूरी कर सेवा देने के लिए उत्साहित होकर आते हैं, उन्हें यदि महीनों तक कोई काम न मिले, तो उनके भीतर निराशा और मानसिक तनाव पैदा होना स्वाभाविक है।

स्वास्थ्य सेवाओं पर असर: अगर ये 114 एएनएम अपने कार्यक्षेत्र में होतीं, तो मुजफ्फरपुर के ग्रामीण अंचलों में मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाओं में और अधिक सुधार देखा जा सकता था।

प्रशासनिक प्रतिक्रिया और सुधार के प्रयास

जब यह मामला मीडिया और उच्चाधिकारियों के संज्ञान में आया, तो स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों में हड़कंप मच गया।

त्वरित कार्रवाई के निर्देश: सिविल सर्जन और अन्य जिम्मेदार अधिकारियों ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए जल्द से जल्द सभी स्वास्थ्य उपकेंद्रों को चिह्नित करने और युद्धस्तर पर उन जगहों की सूची तैयार करने के निर्देश दिए हैं जहाँ इन एएनएम की तैनाती की जा सकती है।

जल्द पद-स्थापना का भरोसा: विभाग की ओर से यह आश्वासन दिया गया है कि आगामी कुछ ही दिनों के भीतर इन सभी 114 एएनएम को उनके निर्धारित कार्यस्थलों पर भेज दिया जाएगा, ताकि वे अपनी सेवाएं शुरू कर सकें।

मुजफ्फरपुर में 114 एएनएम को तीन महीनों से काम न मिलने की यह घटना प्रशासनिक लापरवाही का एक जीता-जागता और शर्मनाक उदाहरण है। यह इस बात को रेखांकित करती है कि किस प्रकार कागजी योजनाओं और धरातलीय क्रियान्वयन के बीच भारी खाइयां मौजूद हैं। स्वास्थ्य उपकेंद्रों के चिह्नित न होने जैसी बुनियादी प्रशासनिक चूक के कारण न केवल प्रशिक्षित कर्मियों की ऊर्जा बर्बाद हुई, बल्कि स्वास्थ्य सेवाएं भी प्रभावित हुईं। अब जरूरत इस बात की है कि विभाग न केवल तुरंत इनकी तैनाती सुनिश्चित करे, बल्कि इस पूरी देरी के लिए जिम्मेदार लापरवाह अधिकारियों की जवाबदेही भी तय करे, ताकि भविष्य में इस तरह की अक्लमंदी से भरी प्रशासनिक भूलों की पुनरावृत्ति न हो सके।