मायागंज अस्पताल में स्वास्थ्य व्यवस्थाओं की खुली पोल; पिछले चार महीने से बंद पड़ी है एमआरआई जांच, जेएलएनएमसीएच प्रशासन ने निजी जांच एजेंसी को दी अंतिम 10 दिनों की मोहलत

भागलपुर, मुख्य संवाददाता: बिहार के सबसे बड़े चिकित्सा संस्थानों में शुमार भागलपुर के जवाहरलाल नेहरू चिकित्सा महाविद्यालय अस्पताल (JLNMCH), जिसे स्थानीय रूप से मायागंज अस्पताल के नाम से जाना जाता है, एक बार फिर गंभीर प्रशासनिक लापरवाही और स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली को लेकर चर्चा में है। अस्पताल परिसर में पीपीपी मोड (Public-Private Partnership) पर संचालित होने वाली महत्वपूर्ण एमआरआई (MRI) जांच सेवा पिछले चार महीनों से पूरी तरह ठप पड़ी है। इस गंभीर समस्या के बावजूद अब तक ठोस कार्रवाई करने के बजाय अस्पताल प्रशासन ने एक बार फिर संबंधित निजी जांच एजेंसी को सिर्फ 10 दिनों की मोहलत दी है। इस ढुलमुल रवैये के कारण गरीब मरीजों की मुसीबतें बढ़ती जा रही हैं और उन्हें भारी आर्थिक नुकसान उठाने के साथ-साथ गंभीर स्वास्थ्य जोखिमों का सामना करना पड़ रहा है।

चार महीने से बंद है एमआरआई मशीन, हीलियम गैस खत्म होने का दिया जा रहा हवाला

मायागंज अस्पताल जैसे बड़े संस्थान में एमआरआई जैसी आधुनिक और अति-आवश्यक जांच का चार महीने तक बंद रहना अपने आप में स्वास्थ्य विभाग की लचर कार्यशैली को बयां करता है। अस्पताल सूत्रों के अनुसार, निजी एजेंसी द्वारा संचालित इस मशीन में तकनीकी खराबी और 'हीलियम गैस' (Helium Gas) खत्म होने का हवाला देकर पिछले लंबे समय से जांच कार्य रोक दिया गया है।

हैरानी की बात यह है कि मशीन बंद हुए महीनों बीत चुके हैं, लेकिन एजेंसी द्वारा इसे दुरुस्त कराने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। अस्पताल प्रशासन की ओर से पूर्व में भी केवल मौखिक निर्देश और चेतावनियां दी जाती रहीं, जिसका एजेंसी पर कोई असर नहीं हुआ। परिणामस्वरूप, रोजाना मायागंज अस्पताल आने वाले दर्जनों गंभीर मरीजों को बिना जांच के ही बैरंग लौटना पड़ रहा है या फिर अत्यधिक महंगे दामों पर बाहर निजी लैब का सहारा लेना पड़ रहा है।

किन मरीजों को हो रही है सबसे अधिक परेशानी?

एमआरआई जांच किसी भी अस्पताल के न्यूरोलॉजी, ऑर्थोपेडिक्स और इमरजेंसी विभागों के लिए रीढ़ की हड्डी मानी जाती है। मायागंज में यह सेवा बंद होने से निम्नलिखित समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है:

सड़क दुर्घटना और सिर की चोट के मरीज: एक्सीडेंट के मामलों में जब सिर पर गंभीर चोट (Head Injury) लगती है, तो आंतरिक रक्तस्राव या मस्तिष्क की स्थिति जानने के लिए एमआरआई बेहद जरूरी होती है। जांच न होने से सही समय पर इलाज शुरू करने में बाधा आ रही है।

हड्डियों और आंतरिक अंगों के रोग: रीढ़ की हड्डी टूटने, जोइंट्स की गंभीर समस्याओं और अंदरूनी अंगों में सूजन या ट्यूमर जैसी जटिल बीमारियों से जूझ रहे मरीजों को सटीक डायग्नोसिस (Diagnosis) नहीं मिल पा रहा है।

आर्थिक शोषण: मायागंज अस्पताल में एमआरआई बंद होने के कारण मरीजों को मजबूरन शहर के निजी डायग्नोस्टिक सेंटरों में जाना पड़ रहा है। निजी लैब वाले मनमाने तरीके से सरकारी दरों से दो से तीन गुना तक राशि वसूल रहे हैं, जिससे गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों की कमर टूट रही है। कई मरीजों को तो इलाज के लिए कर्ज तक लेना पड़ रहा है।

अस्पताल अधीक्षक की चेतावनी: 10 दिन में सेवा बहाल नहीं हुई तो होगी कड़ी कार्रवाई

बढ़ते जनआरोपों और मीडिया में खबरें आने के बाद मायागंज अस्पताल के अधीक्षक डॉ. एचपी दुबे ने मामले का संज्ञान लिया है। अस्पताल प्रशासन ने संबंधित निजी जांच एजेंसी को एक बार फिर अल्टीमेटम देते हुए स्पष्ट किया है कि उन्हें 10 दिनों की मोहलत दी जाती है।

अस्पताल अधीक्षक ने दो टूक शब्दों में कहा है कि यदि निर्धारित 10 दिनों के भीतर मायागंज अस्पताल में एमआरआई जांच सेवा को पूरी तरह चालू नहीं किया जाता है, तो इसके बाद अनुबंध की शर्तों के तहत एजेंसी के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी। इस संबंध में स्वास्थ्य विभाग (Health Department, Bihar) को भी आधिकारिक पत्र भेजकर अनुबंध रद्द करने और काली सूची (Blacklist) में डालने की प्रक्रिया शुरू करने की संस्तुति की जाएगी।

प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर उठ रहे गंभीर सवाल

स्थानीय नागरिकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और मरीजों के परिजनों का सवाल है कि जब कोई निजी एजेंसी अनुबंध के नियमों और शर्तों के अनुसार सेवाएं देने में विफल रहती है, तो प्रशासन चार महीने तक क्यों खामोश बैठा रहता है? केवल 10 दिनों की मोहलत देना कहीं न कहीं मिलीभगत या सुस्ती का परिचायक है। यदि समय रहते एमआरआई मशीन को सुचारू नहीं किया गया, तो अस्पताल के बाहर उग्र आंदोलन भी किया जा सकता है।

भागलपुर के जेएलएनएमसीएच (मायागंज अस्पताल) में चार महीने से बंद पड़ी एमआरआई जांच और प्रशासन द्वारा केवल मोहलत देने की यह प्रक्रिया व्यवस्था की बानगी है। स्वास्थ्य सेवाओं को पटरी पर लाने के लिए केवल कागजी अल्टीमेटम से काम नहीं चलेगा, बल्कि धरातल पर सख्त प्रशासनिक कार्रवाई की जरूरत है, ताकि दूर-दराज से इलाज की उम्मीद लेकर आने वाले गरीब मरीजों को उनका संवैधानिक अधिकार और सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं मिल सकें।