जलालगढ़ में जलप्रलय और बदहाल सड़क की मार: रेलवे गुमटी से सोठा जाने वाली 6-7 किमी लंबी सड़क तब्दील हुई कीचड़ के तालाब में; पिछले 10 सालों से बदहाली का दंश झेल रहे ग्रामीण, शासन-प्रशासन से गुहार

जलालगढ़ (पूर्णिया): बिहार के पूर्णिया जिले के जलालगढ़ प्रखंड क्षेत्र में मानसूनी बारिश ने जहाँ एक तरफ लोगों को गर्मी से राहत दी है, वहीं दूसरी तरफ बुनियादी और बदहाल व्यवस्था की पोल भी खोलकर रख दी है। क्षेत्र में लगातार हो रही मूसलाधार बारिश के कारण जलालगढ़ की लाइफलाइन कही जाने वाली महत्वपूर्ण सड़कों की स्थिति बेहद नारकीय हो गई है। खास तौर पर जलालगढ़ रेलवे गुमटी से सोठा गांव की ओर जाने वाली सड़क की हालत इतनी दयनीय हो चुकी है कि यहाँ पैदल चलना भी जान जोखिम में डालने के बराबर है। लगभग 6 से 7 किलोमीटर लंबी यह सड़क आज जलजमाव, गहरे गड्ढों और भारी कीचड़ के कारण नरक का रूप ले चुकी है। सबसे विडंबना यह है कि स्थानीय ग्रामीण पिछले पूरे 10 वर्षों से इस सड़क के पुनर्निर्माण और मरम्मत की आस लगाए बैठे हैं, लेकिन प्रशासनिक उपेक्षा के चलते आज तक इनकी सुध नहीं ली गई है।

सड़क या कीचड़ का दलदल: बदतर होती आवागमन की स्थिति

लगातार हो रही बारिश के चलते इस पूरी सड़क पर पानी इस तरह भर गया है कि सड़क और गड्ढों के बीच का अंतर पूरी तरह समाप्त हो चुका है। वाहन चालकों और राहगीरों के लिए इस मार्ग से गुजरना किसी खतरनाक चुनौती से कम नहीं है।

गहरे गड्ढों में तब्दील हुई सड़क: जलालगढ़ रेलवे गुमटी से सोठा तक जाने वाले इस 6-7 किमी लंबे मार्ग पर डामर और गिट्टी का नामोनिशान तक मिट चुका है। यहाँ हर कदम पर जानलेवा और बड़े-बड़े गड्ढे बने हुए हैं, जिनमें बारिश का गंदा पानी लबालब भरा रहता है।

वाहन चालकों का दुर्घटनाग्रस्त होना आम बात: इस मार्ग से गुजरने वाले दोपहिया वाहन चालक (मोटरसाइकिल और साइकिल सवार) आए दिन इन छिपे हुए गड्ढों और कीचड़ के कारण दुर्घटना का शिकार होकर चोटिल हो रहे हैं। स्कूल जाने वाले छोटे-छोटे बच्चों और महिलाओं के लिए इस रास्ते से गुजरना असंभव सा हो गया है।

एक दशक से बदहाली का शिकार: जनप्रतिनिधियों और प्रशासन की उदासीनता

क्षेत्र के स्थानीय लोगों और बुजुर्गों का कहना है कि यह सड़क पिछले कम से कम 10 वर्षों से उपेक्षा का शिकार है। इस बीच कई चुनाव आए और चले गए, तमाम नेताओं ने विकास के बड़े-बड़े वादे किए, लेकिन धरातल पर स्थिति जस की तस बनी हुई है।

दस वर्षों का लंबा इंतजार: ग्रामीणों का दर्द है कि उन्होंने पिछले एक दशक से इस सड़क को सुधरवाने के लिए स्थानीय जनप्रतिनिधियों, विधायकों और जिला प्रशासन के अधिकारियों तक गुहार लगाई, लेकिन हर बार उन्हें केवल झूठे आश्वासन ही मिले। किसी भी स्तर पर इस सड़क के पक्कीकरण या मरम्मत के लिए ठोस पहल नहीं की गई।

आर्थिक और सामाजिक विकास में बाधा: एक अच्छी सड़क किसी भी क्षेत्र के विकास की रीढ़ होती है। सड़क के खराब होने के कारण सोठा और आसपास के इलाकों के किसानों को अपनी कृषि उपज को बाजार तक पहुँचाने में भारी आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ता है। आपातकालीन स्थिति में एम्बुलेंस या स्वास्थ्य सेवाएं समय पर गांव तक नहीं पहुँच पाती हैं, जिससे मरीजों की जान पर हमेशा खतरा मंडराता रहता है।

ग्रामीणों का फूटा गुस्सा, सरकार और प्रशासन से अल्टीमेटम

लगातार हो रही बारिश और प्रशासनिक चुप्पी से आजिज आ चुके जलालगढ़ और सोठा क्षेत्र के ग्रामीणों का गुस्सा अब फूट पड़ा है। लोगों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द से जल्द इस सड़क का निर्माण कार्य शुरू नहीं किया गया, तो वे बड़े पैमाने पर उग्र आंदोलन और चक्का जाम करने को बाध्य होंगे।

शीघ्र कार्यवाही की मांग: ग्रामीणों ने राज्य सरकार और जिला प्रशासन से पुरजोर मांग की है कि मानसून के इस मौसम को देखते हुए कम से कम तात्कालिक तौर पर सड़क पर गिट्टी और मोरंग डलवाकर आवागमन योग्य बनाया जाए, और स्थायी समाधान के लिए प्राक्कलन (Estimate) तैयार कर जल्द से जल्द पक्की सड़क का निर्माण शुरू किया जाए।

जनता की बुनियादी जरूरत: लोगों का कहना है कि सड़क जैसी बुनियादी सुविधा के लिए एक दशक तक इंतजार करना पड़ रहा है, जो विकास के दावों की पोल खोलता है।

जलालगढ़ रेलवे गुमटी से सोठा जाने वाली सड़क की यह दर्दनाक दास्तान सिर्फ एक मार्ग की बर्बादी नहीं है, बल्कि यह व्यवस्था की संवेदनहीनता का एक जीवंत उदाहरण है। जब तक प्रशासन और सरकार गहरी नींद से नहीं जागेंगे, तब तक आम जनता यूं ही कीचड़ और गड्ढों भरे रास्तों पर चलने को मजबूर रहेगी। अब देखना यह है कि प्रशासनिक महकमा इस खबर के बाद कितनी जल्दी हरकत में आता है और इन 10 वर्षों से पीड़ित ग्रामीणों को राहत मिलती है या नहीं।