एलएनएमयू में 'भारत की विदेश नीति और समकालीन परिदृश्य' पर विशेष व्याख्यान: प्रो. सत्यनारायण प्रसाद ने साझा किए ऐतिहासिक दृष्टिकोण

दरभंगा: ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय (LNMU) के स्नातकोत्तर (पीजी) राजनीति विज्ञान विभाग में हाल ही में एक महत्वपूर्ण शैक्षणिक आयोजन हुआ। विभाग द्वारा 'भारत की विदेश नीति और समकालीन परिदृश्य' विषय पर एक विशेष व्याख्यान माला का आयोजन किया गया, जिसमें प्रख्यात शिक्षाविद् प्रो. सत्यनारायण प्रसाद मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित रहे। इस कार्यक्रम में उन्होंने भारत की विदेश नीति के विकासवादी सफर और इसके ऐतिहासिक संदर्भों पर सारगर्भित चर्चा की।

विदेश नीति का ऐतिहासिक आधार: आजादी के समय की चुनौतियां

प्रो. सत्यनारायण प्रसाद ने अपने व्याख्यान की शुरुआत भारत की स्वतंत्रता के समय की वैश्विक परिस्थितियों से की। उन्होंने बताया कि जब भारत को आजादी मिली, तब विश्व दो गुटों (शीत युद्ध के दौरान अमेरिका और सोवियत संघ) में बंटा हुआ था। उस समय भारत की विदेश नीति का आकार किसी भी सैन्य गुट में शामिल न होने और अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखने के इर्द-गिर्द बुना गया था।

प्रो. प्रसाद ने जोर देकर कहा कि:

गुटनिरपेक्षता की नीति (NAM): भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के दूरदर्शी नेतृत्व में भारत ने 'गुटनिरपेक्षता' का रास्ता चुना। यह निर्णय उस समय की कूटनीतिक परिपक्वता का प्रमाण था।

शांति और सह-अस्तित्व: भारत ने 'पंचशील' के सिद्धांतों को अपनाकर विश्व के सामने शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का मार्ग प्रशस्त किया।

स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता: उन्होंने बताया कि शुरुआती दौर में भारत की प्राथमिकता अपने नवजात लोकतंत्र को मजबूत करना और आर्थिक आत्मनिर्भरता प्राप्त करना था, जिसके लिए एक शांत अंतरराष्ट्रीय माहौल आवश्यक था।

विदेश नीति का विकासवादी स्वरूप

व्याख्यान के दौरान प्रो. प्रसाद ने चर्चा की कि कैसे समय के साथ भारत की विदेश नीति में बदलाव आए हैं। उन्होंने बताया कि शुरुआती दशकों में जहां नीति 'आदर्शवाद' (Idealism) की ओर अधिक झुकी थी, वहीं आधुनिक समय में यह 'यथार्थवाद' (Realism) की ओर तेजी से बढ़ी है।

उन्होंने कुछ महत्वपूर्ण चरणों का उल्लेख किया:

आर्थिक कूटनीति का युग: 1991 के उदारीकरण के बाद भारत की विदेश नीति में 'इकोनॉमिक डिप्लोमेसी' का प्रवेश हुआ।

बहु-ध्रुवीय विश्व की ओर: अब भारत केवल एक क्षेत्रीय शक्ति नहीं, बल्कि एक वैश्विक शक्ति के रूप में अपनी भूमिका निभा रहा है।

रणनीतिक स्वायत्तता: आज भारत अपने हितों के लिए किसी भी देश के साथ सामरिक भागीदारी (Strategic Partnership) करने में सक्षम है, जो कि उसके बढ़ते वैश्विक कद को दर्शाता है।

समकालीन परिदृश्य: चुनौतियों और अवसरों का संतुलन

प्रो. सत्यनारायण प्रसाद ने वर्तमान विदेश नीति की चुनौतियों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आज का विश्व बहुत जटिल है। भारत को अपने पड़ोसियों के साथ संबंधों, सीमा विवादों और बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच बहुत सावधानी से आगे बढ़ना पड़ रहा है।

चीन और पाकिस्तान के साथ संबंध: भारत की वर्तमान विदेश नीति का एक बड़ा हिस्सा पड़ोसी देशों के साथ शक्ति संतुलन (Balance of Power) बनाए रखना है।

वैश्विक मंच पर नेतृत्व: जी-20 (G20) की अध्यक्षता और 'ग्लोबल साउथ' की आवाज बनकर भारत ने साबित कर दिया है कि उसकी विदेश नीति अब 'प्रतिक्रिया' (Reaction) देने वाली नहीं, बल्कि 'पहला कदम' (Proactive) उठाने वाली है।

डिजिटल और तकनीकी कूटनीति: साइबर सुरक्षा और तकनीकी सहयोग अब भारत की कूटनीति के नए स्तंभ बन गए हैं।

छात्रों के लिए सीख और विभाग की भूमिका

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे विभागाध्यक्ष ने कहा कि ऐसे व्याख्यान छात्रों को किताबी ज्ञान से परे व्यावहारिक और कूटनीतिक दृष्टिकोण प्रदान करते हैं। पीजी राजनीति विज्ञान के छात्रों के लिए प्रो. सत्यनारायण प्रसाद का यह व्याख्यान अत्यंत प्रेरणादायक रहा। उन्होंने छात्रों को प्रोत्साहित किया कि वे केवल इतिहास न पढ़ें, बल्कि वर्तमान में हो रहे कूटनीतिक बदलावों का सूक्ष्म विश्लेषण करना सीखें।

इस विशेष व्याख्यान का समापन इस निष्कर्ष के साथ हुआ कि भारत की विदेश नीति हमेशा 'वसुधैव कुटुंबकम' (विश्व एक परिवार है) के दर्शन पर आधारित रही है। समय और परिस्थितियों के साथ इसमें बदलाव जरूर आए हैं, लेकिन 'शांतिपूर्ण विकास' और 'समानता' का मूल तत्व आज भी बना हुआ है।

प्रो. सत्यनारायण प्रसाद ने अपने संबोधन के अंत में कहा कि भारत जिस तरह से वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में अपनी साख मजबूत कर रहा है, वह दिन दूर नहीं जब भारत विश्व राजनीति का एक निर्णायक केंद्र होगा। यह कार्यक्रम न केवल शैक्षिक दृष्टि से सफल रहा, बल्कि इसने युवाओं को देश की रणनीतिक सोच को बेहतर ढंग से समझने का अवसर भी दिया।