विक्रमशिला सेतु पर सावन की दस्तक और ट्रैफिक का ‘महा-संकट’ क्या प्रशासन तैयार है?

भागलपुर: विक्रमशिला सेतु, जो उत्तर और दक्षिण बिहार को जोड़ने वाली मुख्य कड़ी है, इन दिनों अपने अस्तित्व की सबसे कठिन परीक्षा से गुजर रहा है। पुल पर जारी मरम्मत कार्य, बेली ब्रिज का निर्माण और क्षतिग्रस्त स्लैब के कारण वाहनों की गति पर मानो 'ब्रेक' लग गई है। अब चुनौती और भी बड़ी होने वाली है, क्योंकि सावन का पावन महीना शुरू होने वाला है। सावन के दौरान सुल्तानगंज से देवघर जाने वाले कांवरियों और श्रद्धालुओं की भारी भीड़ भागलपुर के रास्ते गुजरती है, जिससे सेतु पर वाहनों का दबाव कई गुना बढ़ जाएगा। यह स्थिति पुलिस और प्रशासन के लिए किसी बड़ी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है।

बेली ब्रिज: जरूरत या मजबूरी?

पुल के पिलर संख्या 133 के पास स्लैब में आई दरार के बाद प्रशासन ने आवागमन को सुचारू रखने के लिए बेली ब्रिज का विकल्प चुना। हालांकि, इस अस्थायी निर्माण ने भारी वाहनों की गति को नियंत्रित कर दिया है। बेली ब्रिज की अपनी सीमाएं हैं, जिस कारण वाहनों को रेंग-रेंग कर चलना पड़ता है। यही कारण है कि सेतु पर अक्सर 'बॉटल-नेक' (Bottle-neck) की स्थिति बन जाती है, जहां से वाहनों का निकलना घंटों का काम हो गया है।

सावन का दबाव: ट्रैफिक प्रबंधन की बड़ी चुनौती

सावन के दौरान भागलपुर की सड़कों और विक्रमशिला सेतु पर यातायात का स्वरूप पूरी तरह बदल जाता है।

कांवरियों का रेला: सुल्तानगंज से जल लेकर देवघर जाने वाले लाखों श्रद्धालु इस मार्ग का उपयोग करते हैं। निजी वाहनों, बसों और ट्रकों के साथ कांवरियों के जत्थों का संगम सेतु पर भारी भीड़ पैदा कर देता है।

समन्वय की कमी: प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह निर्माण कार्य और यातायात प्रबंधन के बीच सामंजस्य कैसे बैठाए। यदि निर्माण कार्य के दौरान वाहनों को नहीं रोका गया, तो सेतु पर 'ट्रैफिक जाम' का ऐसा मंजर दिखेगा जिसे संभालना पुलिस बल के लिए मुश्किल होगा।

सुरक्षा और एंबुलेंस का रास्ता: जाम की स्थिति में सबसे ज्यादा परेशानी एंबुलेंस और आपातकालीन सेवाओं को होती है। सेतु पर ऐसी व्यवस्था की दरकार है जहां आपातकालीन वाहनों के लिए एक 'ग्रीन कॉरिडोर' (Green Corridor) सुनिश्चित किया जा सके।

वर्तमान स्थिति: रेंगते हुए वाहन

वर्तमान में, सेतु पर स्थिति यह है कि भारी वाहनों को सीमित गति से गुजरने की हिदायत दी गई है। सेतु के दोनों सिरों पर तैनात पुलिसकर्मी दिन-रात मशक्कत कर रहे हैं, लेकिन संसाधनों की कमी और पुल की संकरी बनावट के कारण वे भी लाचार दिखते हैं। सेतु के ऊपर बने अस्थायी डिवाइडर न केवल ट्रैफिक को धीमा कर रहे हैं, बल्कि किसी वाहन के खराब होने पर उसे साइड करने में भी भारी अड़चन पैदा कर रहे हैं।

प्रशासन का 'सावन एक्शन प्लान'

सूत्रों के अनुसार, जिला प्रशासन और यातायात विभाग ने सावन को देखते हुए एक विशेष कार्य योजना (Action Plan) पर काम शुरू कर दिया है:

हेवी व्हीकल पर प्रतिबंध: सावन के पीक दिनों में भारी मालवाहक वाहनों के परिचालन पर समय-सीमा के तहत प्रतिबंध लगाया जा सकता है।

समय-सारणी का निर्धारण: ट्रकों और व्यावसायिक वाहनों को रात के समय या कम व्यस्त घंटों में गुजरने की अनुमति देने पर विचार किया जा रहा है।

क्विक रिस्पांस टीम (QRT): सेतु के दोनों ओर क्रेन और टो-वेन के साथ QRT टीम की तैनाती बढ़ाई जाएगी ताकि वाहन खराब होने की स्थिति में उसे 5 मिनट के भीतर हटाया जा सके।

जागरूकता अभियान: जिला प्रशासन लाउडस्पीकर के माध्यम से चालकों को सेतु पर लेन-अनुशासन का पालन करने की चेतावनी दे रहा है।

क्या आम जनता को मिलेगी राहत?

विशेषज्ञों का मानना है कि केवल पुलिस तैनाती से समस्या हल नहीं होगी। सावन में यदि निर्माण कार्य (ट्रस ब्रिज का काम) पूरी रफ्तार से नहीं चलता, तो यह जाम और अधिक भयानक हो सकता है। आम लोगों की मांग है कि सेतु के दोनों ओर वैकल्पिक रास्ते (फेरी सेवा) को पूरी तरह से मजबूत किया जाए ताकि छोटी गाड़ियों और बाइक सवारों को पुल पर चढ़ने की जरूरत ही न पड़े।

विक्रमशिला सेतु इस समय केवल एक पुल नहीं, बल्कि भागलपुर की परीक्षा का केंद्र बन गया है। सावन का महीना प्रशासनिक दक्षता की असली परीक्षा लेगा। अगर प्रशासन ने पहले से ही कमर नहीं कसी, तो भागलपुरवासियों को आने वाले दिनों में और अधिक जाम का सामना करना पड़ सकता है। फिलहाल, सेतु से गुजरने वाले हर चालक की जुबान पर एक ही सवाल है—क्या सावन में इस जाम से मुक्ति मिलेगी?