दिव्यांग सर्टिफिकेट के लिए दर-दर भटक रही थी गरीब महिला, स्थाई लोक अदालत बनी मसीहा

सहरसा: सरकारी कार्यालयों की उदासीनता और प्रशासनिक लेटलतीफी के शिकार एक गरीब महिला को आखिरकार न्याय की किरण दिखी है। सहरसा की रहने वाली रंजन देवी, जो अनुसूचित जाति से ताल्लुक रखती हैं और अपनी एक आंख से दिव्यांग हैं, दिव्यांग सर्टिफिकेट बनवाने के लिए लंबे समय से सरकारी कार्यालयों के चक्कर काट रही थीं। थक-हारकर उन्होंने स्थाई लोक अदालत का दरवाजा खटखटाया, जिसके बाद अब इस मामले ने तूल पकड़ लिया है।

क्या है पूरा मामला?

रंजन देवी आर्थिक रूप से अत्यंत कमजोर वर्ग से आती हैं और अपनी एक आंख से देख पाने में असमर्थ हैं। इस दिव्यांगता के कारण उन्हें न केवल दैनिक जीवन में संघर्ष करना पड़ रहा है, बल्कि सरकारी योजनाओं का लाभ लेने में भी भारी कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है। दिव्यांग सर्टिफिकेट प्राप्त करने के लिए उन्होंने सहरसा के सिविल सर्जन कार्यालय में आवेदन दिया था।

आरोप है कि आवेदन देने के बावजूद स्वास्थ्य विभाग और सिविल सर्जन कार्यालय द्वारा उनकी अर्जी पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। बार-बार निवेदन करने के बाद भी फाइल एक टेबल से दूसरी टेबल पर घूमती रही, लेकिन सर्टिफिकेट जारी करने की प्रक्रिया शुरू नहीं हुई।

स्थाई लोक अदालत का हस्तक्षेप

जब रंजन देवी को कहीं से न्याय नहीं मिला, तो उन्होंने स्थाई लोक अदालत में गुहार लगाई। अदालत ने मामले की गंभीरता को समझते हुए इसे गंभीरता से लिया है।

अदालत ने सिविल सर्जन कार्यालय से जवाब तलब किया है कि एक दिव्यांग महिला के आवेदन पर इतने लंबे समय तक कार्रवाई क्यों लंबित रखी गई?

न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम के तहत सर्टिफिकेट जारी करना स्वास्थ्य विभाग का दायित्व है और इसमें किसी भी प्रकार की देरी को कोताही माना जाएगा।

अदालत ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे निर्धारित समय सीमा के भीतर महिला के आवेदन का निपटारा करें और मेडिकल बोर्ड के समक्ष उनकी जांच सुनिश्चित करें।

संवेदनहीनता का बड़ा उदाहरण

रंजन देवी के मामले ने एक बार फिर स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक गरीब और दिव्यांग महिला का सर्टिफिकेट के लिए भटकना यह दर्शाता है कि आम आदमी के लिए सरकारी तंत्र आज भी कितना जटिल और असंवेदनशील है। स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि यदि एक दिव्यांग व्यक्ति को अपने अधिकार के लिए अदालत की शरण लेनी पड़े, तो यह पूरी प्रशासनिक व्यवस्था की विफलता है।

आगे की राह: क्या मिलेगा अधिकार?

अदालत के हस्तक्षेप के बाद अब सिविल सर्जन कार्यालय पर दबाव बढ़ गया है। यह मामला न केवल रंजन देवी के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह उन सैकड़ों अन्य दिव्यांगों के लिए एक नजीर बन सकता है जो समान समस्याओं से जूझ रहे हैं।

अदालत ने अब आगामी सुनवाई की तारीख तय कर दी है और यह सुनिश्चित करने के लिए कहा है कि अगली तारीख तक सर्टिफिकेट की प्रक्रिया पूरी हो जाए। रंजन देवी अब उम्मीद भरी नजरों से अदालत की ओर देख रही हैं। उनकी लड़ाई ने यह साबित कर दिया है कि भले ही तंत्र धीमा हो, लेकिन न्यायपालिका का दरवाजा हमेशा आम आदमी के अधिकारों की रक्षा के लिए खुला है।