स्नातकोत्तर (पीजी) के कई सत्र समाप्त होने के बावजूद छात्र-छात्राएं शैक्षणिक भ्रमण के लाभ से हैं वंचित, उच्च शिक्षा की लचर व्यवस्था पर उठ रहे गंभीर सवाल
पूर्णिया: उच्च शिक्षा और अकादमिक अनुसंधान का दायरा केवल चार दीवारों के भीतर चलने वाली सैद्धांतिक कक्षाओं तक सीमित नहीं होता। किताबी ज्ञान को जब तक जमीनी हकीकत, व्यावहारिक प्रयोग और वास्तविक दुनिया के अनुभवों से नहीं जोड़ा जाता, तब तक विद्यार्थियों का बौद्धिक और पेशेवर विकास अधूरा रहता है। इस समग्र विकास की प्रक्रिया में 'शैक्षणिक भ्रमण' (Educational Excursion/Study Tour) की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के दिशा-निर्देशों और उच्च शिक्षा के निर्धारित मानकों के अनुसार, स्नातकोत्तर (PG) स्तर के विद्यार्थियों के पाठ्यक्रम में क्षेत्र भ्रमण और व्यावहारिक अध्ययन को एक अनिवार्य और महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया है।
लेकिन बिहार के सीमांचल और कोसी क्षेत्र में उच्च शिक्षा का दीप जलाने वाले पूर्णिया विश्वविद्यालय से एक बेहद निराशाजनक और चिंताजनक खबर सामने आ रही है। विश्वविद्यालय के विभिन्न स्नातकोत्तर (PG) विभागों के कई सत्र सफलतापूर्वक बीत जाने और परीक्षाएं संपन्न होने के बाद भी छात्र-छात्राएं आज तक शैक्षणिक भ्रमण के लाभ से पूरी तरह वंचित हैं। सत्र पर सत्र समाप्त होते जा रहे हैं, युवा डिग्रियां लेकर दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन की उदासीनता और प्रशासनिक सुस्ती के कारण छात्रों को वह व्यावहारिक अनुभव नसीब नहीं हुआ जो उनके पाठ्यक्रम का एक वैध और आवश्यक हिस्सा था। इस व्यवस्थागत लापरवाही के चलते छात्र-छात्राओं में भारी रोष और निराशा का माहौल व्याप्त है।
शैक्षणिक भ्रमण का महत्व: पाठ्यक्रम का अनिवार्य अंग बनाम प्रशासनिक उपेक्षा
स्नातक स्तर की सामान्य पढ़ाई के विपरीत, स्नातकोत्तर (PG) की शिक्षा किसी विशेष विषय में विशेषज्ञता (Specialization) हासिल करने का माध्यम होती है। चाहे वह इतिहास और भूगोल के छात्र हों, जिन्हें ऐतिहासिक स्थलों और भौगोलिक संरचनाओं का प्रत्यक्ष अध्ययन करना होता है, या फिर विज्ञान, समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र के विद्यार्थी, जिनके लिए क्षेत्रीय डेटा संकलन और प्रयोगशाला से बाहर का अनुभव जरूरी है—शैक्षणिक भ्रमण हर विषय की जान होता है।
सैद्धांतिक ज्ञान और व्यावहारिक दुनिया का सेतु: कक्षा की कुर्सियों पर बैठकर ब्लैकबोर्ड पर पढ़ाई गई चीजें केवल परीक्षा पास करने तक सीमित रह जाती हैं। जब छात्र अपने विषय से जुड़े कारखानों, अनुसंधान केंद्रों, ऐतिहासिक धरोहरों या ग्रामीण-शहरी क्षेत्रों का भ्रमण करते हैं, तो उनकी तार्किक क्षमता और विषय की समझ कई गुना बढ़ जाती है।
बजट और प्रावधान का हड़पना: विश्वविद्यालय और महाविद्यालयों के विकास फंड (Development Fund) व पाठ्यक्रम शुल्क (Course Fee) के नाम पर विद्यार्थियों से हर सत्र में मोटी फीस वसूली जाती है। इस शुल्क में नियमानुसार शैक्षणिक भ्रमण के लिए एक तयशुदा बजट का प्रावधान होता है। इसके बावजूद सत्र समाप्त हो जाने पर भी वह राशि कहां खर्च होती है या किस विभाग के खातों में दफन हो जाती है, यह अपने आप में एक बड़ा भ्रष्टाचार का विषय है।
छात्रों का बौद्धिक नुकसान: कई सत्रों के विद्यार्थी अपनी मास्टर डिग्री पूरी करके विश्वविद्यालय से विदा हो चुके हैं, लेकिन उन्हें कभी यह नहीं बताया गया कि उनके पाठ्यक्रम में कोई ऐसा टूर भी शामिल था। इससे उनका अकादमिक अनुभव अधूरा रह गया है।
पूर्णिया विश्वविद्यालय के विभागों की बदहाली और उदासीनता
पूर्णिया विश्वविद्यालय परिसर के अंतर्गत संचालित विभिन्न स्नातकोत्तर विभागों (जैसे हिंदी, इतिहास, राजनीति विज्ञान, समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र, और विज्ञान संकाय के विभाग) के विद्यार्थियों का कहना है कि उन्होंने कई बार अपने विभागाध्यक्षों (HODs) और संकाय समन्वयकों के सामने शैक्षणिक भ्रमण की मांग रखी, लेकिन हर बार उन्हें केवल कोरे आश्वासन मिले।
"हमने एडमिशन के वक्त ही कोर्स फीस के साथ प्रैक्टिकल और टूर का शुल्क भरा था। हमारा पीजी का पूरा सत्र समाप्त हो चुका है, लेकिन आज तक हमें किसी भी शैक्षणिक भ्रमण पर नहीं ले जाया गया। पूछने पर अधिकारी बजट न होने या प्रशासनिक अनुमति न मिलने का बहाना बना देते हैं।" — एक उत्तीर्ण स्नातकोत्तर छात्र, पूर्णिया विश्वविद्यालय
फाइलों में कैद योजनाएं: कागजों पर अकादमिक कैलेंडर के भीतर शैक्षणिक भ्रमण की तारीखें और योजनाएं बहुत ही सुंदर ढंग से अंकित की जाती हैं, लेकिन जब धरातल पर क्रियान्वयन की बारी आती है, तो प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण वे फाइलें ठंडे बस्ते में चली जाती हैं।
जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ना: विश्वविद्यालय के जिम्मेदार अधिकारी अक्सर यह कहकर अपना बचाव करते हैं कि लॉजिस्टिक्स, सुरक्षा व्यवस्था और छात्रों की संख्या प्रबंधन में कठिनाई होती है। लेकिन क्या अन्य विश्वविद्यालयों के छात्र इन बाधाओं को पार कर भ्रमण नहीं करते? यह तर्क केवल प्रशासनिक नाकामी को छिपाने का एक ढाल मात्र है।
अकादमिक मानकों पर लग रहा बट्टा
जब एक विश्वविद्यालय अपने स्नातकोत्तर विद्यार्थियों को बुनियादी व्यावहारिक सुविधाएं और अध्ययन यात्राएं नहीं मुहैया करा पाता, तो उसकी साख पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
प्रतिस्पर्धा में पिछड़ रहे छात्र: अन्य केंद्रीय और सुव्यवस्थित राज्य विश्वविद्यालयों के छात्र प्रैक्टिकल एक्सपोजर के बल पर राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगी परीक्षाओं और शोध साक्षात्कारों में बेहतर प्रदर्शन करते हैं। इसके विपरीत, पूर्णिया विश्वविद्यालय के छात्रों को केवलता किताबी कीड़ा बनकर रहना पड़ता है, जिससे वे व्यावहारिक ज्ञान की दौड़ में पिछड़ जाते हैं।
विद्यार्थियों में बढ़ता मानसिक क्षोभ: छात्रों का मानना है कि यदि विश्वविद्यालय प्रशासन छात्रों के अकादमिक अधिकारों और उनके द्वारा चुकाए गए पैसों का सदुपयोग नहीं कर सकता, तो इस तरह के खोखले प्रावधानों का कोई औचित्य नहीं है।
छात्र संघों की मांग और चेतावनी
इस गंभीर मुद्दे को लेकर अब छात्र संगठनों और जागरूक विद्यार्थियों ने विश्वविद्यालय के कुलपति (VC) और कुलसचिव (Registrar) को ज्ञापन सौंपने की तैयारी कर ली है।
बजट की पारदर्शी जांच की मांग: छात्रों की मांग है कि जिन-जिन सत्रों का कार्यकाल समाप्त हो चुका है और शैक्षणिक भ्रमण नहीं कराया गया है, उनके नाम पर आवंटित बजट की राशि कहां गई, इसकी उच्च स्तरीय जांच होनी चाहिए।
भविष्य के सत्रों के लिए स्पष्ट गाइडलाइन: छात्रों ने चेतावनी दी है कि आगामी सत्रों के लिए विश्वविद्यालय एक निश्चित समय-सारणी (Timeline) जारी करे, जिसमें यह अनिवार्य हो कि प्रत्येक पीजी छात्र को उसके दो साल के पाठ्यक्रम के दौरान कम से कम एक बार शैक्षणिक भ्रमण पर भेजा ही जाए
पूर्णिया विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर के कई सत्र समाप्त होने के बाद भी छात्र-छात्राओं का शैक्षणिक भ्रमण के लाभ से वंचित रहना यह साबित करता है कि संस्थान में अकादमिक गुणवत्ता से ज्यादा औपचारिकता को प्राथमिकता दी जा रही है। उच्च शिक्षा केवल डिग्री बांटने का कारखाना नहीं है, बल्कि यह विद्यार्थियों के संपूर्ण व्यक्तित्व और बौद्धिक विकास का मंदिर है। समय आ गया है कि पूर्णिया विश्वविद्यालय प्रशासन अपनी वातानुकूलित कुर्सियों की सीमाओं से बाहर निकले, अपनी प्रशासनिक जड़ता को तोड़े और छात्रों के इन बुनियादी अकादमिक अधिकारों को सुनिश्चित करे, ताकि भविष्य के शोधार्थी और युवा देश के निर्माण में पूरी तरह परिपक्व होकर सामने आ सकें।