विभीषिका के मुहाने पर उत्तर बिहार! केंद्रीय टीम के आदेश 'हवा', पश्चिमी कोसी तटबंध भगवान भरोसे

कोसी का काउंटडाउन शुरू: नेपाल में भारी बारिश के बाद वीरपुर बैराज से छूटा पानी, जर्जर तटबंध पर बढ़ा हाइड्रोलिक प्रेशर।

फाइलों में दबा 'सुरक्षा कवच': केंद्रीय उच्चस्तरीय टीम ने दिए थे युद्धस्तर पर काम के निर्देश, बाबूशाही ने योजनाओं पर चला दी 'कैंची'।

भीतर से खोखला हुआ बांध: टी-स्पर ध्वस्त, सैंड बैग नदी में विलीन; चूहों और जंगली जानवरों के बिलों से 'पाइपिंग' का खतरा।

ग्राउंड जीरो की कड़वी हकीकत: जब बांध ही सुरक्षित नहीं, तो जनता कैसे सोएगी?

उत्तर बिहार को हर साल अपनी लहरों से डराने वाली कोसी नदी एक बार फिर उफान पर है। लेकिन इस बार खतरा सिर्फ नदी का पानी नहीं, बल्कि इंसानी लापरवाही है। लाखों लोगों की सुरक्षा की गारंटी माना जाने वाला पश्चिमी कोसी तटबंध (Western Kosi Embankment) इस वक्त खुद जिंदगी और मौत की जंग लड़ रहा है। मानसून सिर पर है, लेकिन बांध की मरम्मत के नाम पर जमीन पर 'सन्नाटा' पसरा है।

【 ग्राउंड रियलिटी चेक: किलोमीटर 32 से 52 】 स्थिति: अति-संवेदनशील (Hyper-Sensitive) करंट स्टेटस: टी-स्पर जर्जर, बोल्डर पिचिंग गायब, मिट्टी का कटाव जारी।

'सिस्टम' का खेल: दिल्ली से आया आदेश, पटना में हो गया 'शॉर्ट'

कुछ समय पहले जब केंद्रीय तकनीकी टीम ने इस इलाके का दौरा किया था, तो उन्होंने साफ लफ्जों में कहा था कि मानसून आने से पहले इस तटबंध का कायाकल्प हो जाना चाहिए। इसके लिए एक भारी-भरकम बजट और सुरक्षा योजना तैयार की गई थी।

लेकिन फिर क्या हुआ? > प्रशासनिक गलियारों में बैठे अफसरों ने बजट बचाने के चक्कर में या फाइलों को अटकाने के लिए ऐन वक्त पर सबसे संवेदनशील 32 किलोमीटर से लेकर 52 किलोमीटर तक की सुरक्षा योजनाओं में भारी कटौती कर दी। नतीजा? काम शुरू होने से पहले ही योजना दम तोड़ चुकी है।

तटबंध के 3 'साइलेंट किलर' जो ला सकते हैं तबाही

1. नदी के पेट में समा गए सुरक्षा इंतजाम

बीते सालों में कटाव को रोकने के लिए जो नायलॉन क्रैट्स और सैंड बैग्स (बालू की बोरियां) लगाए गए थे, वे कोसी की तेज धारा में बह चुके हैं। अब नदी का सीधा प्रहार सीधे मुख्य बांध की मिट्टी पर हो रहा है।

2. खोखली हो चुकी है 'दीवार'

तटबंध के स्लोप पर उगी झाड़ियों के बीच चूहों और जंगली सियारों ने गहरी सुरंगें बना ली हैं। पानी का स्तर बढ़ते ही इन सुराखों से पानी रिसने लगेगा (जिसे तकनीकी भाषा में पाइपिंग इफेक्ट कहते हैं), जो किसी भी बांध को ताश के पत्तों की तरह ढहाने के लिए काफी है।

3. अधिकारियों के दावों की 'कागजी नाव'

जल संसाधन विभाग के आला अफसर हर बार की तरह कह रहे हैं— "सब नियंत्रण में है, फ्लड फाइटिंग मटेरियल तैयार है।" लेकिन स्थानीय ग्रामीणों का गुस्सा सातवें आसमान पर है। लोगों का कहना है, "जब बाढ़ घर में घुस जाएगी, तब बालू की बोरी फेंकने से क्या होगा? सूखाड़ के दिनों में इंजीनियर साहब सो रहे थे क्या?"

अगर बांध टूटा... तो मचेगा हाहाकार (The Worst Case Scenario)

यह कोई मामूली चेतावनी नहीं है। अगर गौड़ाबौराम या कुशेश्वरस्थान के पास यह पश्चिमी तटबंध क्रैक होता है, तो:

दरभंगा, मधुबनी और समस्तीपुर के सैकड़ों गांव पलक झपकते ही जलमग्न हो जाएंगे।

किसानों की गाढ़ी कमाई (धान की फसलें) और हजारों मवेशी पानी में बह जाएंगे।

उत्तर बिहार का संपर्क मुख्य शहरों से पूरी तरह कट जाएगा।

 जब मालूम है कि कोसी हर साल तबाही मचाती है, तो सुरक्षा योजनाओं में कटौती किसके इशारे पर की गई? सरकार को बिना एक पल गंवाए इस जर्जर तटबंध पर 'आपातकालीन टास्क फोर्स' तैनात करनी चाहिए। कागजी घोड़े दौड़ाना बंद करिए साहब, क्योंकि कोसी की लहरें दफ्तर की फाइलें देखकर अपना रास्ता नहीं बदलतीं!