शैक्षणिक सत्र 2026–27 के लिए प्राइवेट एमबीबीएस की फीस में भारी इजाफा: सालाना ट्यूशन फीस 7.50 लाख से बढ़कर पहुँची 17.13 लाख रुपये तक; नीट अभ्यर्थियों के अभिभावकों में गहरा रोष और चिंता

नई दिल्ली/मुंबई: देश भर के मेडिकल छात्रों और उनके अभिभावकों के लिए एक बार फिर बड़ी और चिंताजनक खबर सामने आ रही है। शैक्षणिक सत्र 2026–27 के लिए निजी चिकित्सा महाविद्यालयों (Private Medical Colleges) में एमबीबीएस की पढ़ाई बेहद महंगी होती जा रही है। ताजा नियमों और नियामक प्राधिकरणों द्वारा स्वीकृत नई सूची के अनुसार, विभिन्न प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में वार्षिक एमबीबीएस फीस 7.50 लाख रुपये से लेकर 17.13 लाख रुपये के बीच तय की गई है। फीस में लगातार हो रही इस बेतहाशा बढ़ोतरी से नीट (NEET) अभ्यर्थियों और उनके माता-पिता में भारी नाराजगी देखने को मिल रही है। अभिभावकों का कहना है कि लगातार बढ़ते शैक्षणिक खर्चों के कारण अब आम और मध्यमवर्गीय परिवारों के मेधावी बच्चों के लिए डॉक्टर बनने का सपना पूरा करना लगभग नामुमकिन होता जा रहा है।

फीस का नया ढांचा और प्रमुख आंकड़े

फीस नियामक प्राधिकरण (Fees Regulating Authority) द्वारा शैक्षणिक सत्र 2026-27 के लिए जारी की गई नई फीस संरचना के तहत प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में भारी अंतर देखने को मिल रहा है। प्रमुख कॉलेजों के आंकड़ों पर नजर डालें तो:

न्यूनतम और अधिकतम दायरा: इस बार अधिकांश निजी संस्थानों में वार्षिक ट्यूशन फीस का न्यूनतम स्तर लगभग 7.50 लाख रुपये से शुरू होकर अधिकतम 17.13 लाख रुपये सालाना तक पहुंच गया है। इसके बीच विभिन्न कॉलेजों ने अपने यहां की सुविधाओं और संसाधनों के आधार पर फीस तय की है।

शीर्ष महंगे संस्थान: उदाहरण के लिए, पालघर स्थित वेदान्ता इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (Vedantaa Institute of Medical Sciences) में सालाना फीस बढ़कर 17.13 लाख रुपये तक पहुंच गई है, जो इस सूची में सबसे ऊपर है। इसके अलावा नागपुर के एनकेपी साल्वे इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में यह फीस 15.62 लाख रुपये सालाना तय की गई है।

दूसरी ओर कुछ राहत वाले संस्थान: पुणे स्थित भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में वार्षिक फीस 7.50 लाख रुपये और सिंधुदुर्ग के एसएसपीएम मेडिकल कॉलेज में 7.64 लाख रुपये तय की गई है, जो तुलनात्मक रूप से कम है, लेकिन फिर भी एक आम परिवार के लिए काफी ज्यादा है।

अभिभावकों में क्यों है नाराजगी?

प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों की फीस में लगातार हो रहे इस इजाफे को लेकर अभिभावक संघों और नीट पास करने वाले छात्रों के परिजनों में तीव्र आक्रोश व्याप्त है। उनके गुस्से की मुख्य वजहें निम्नलिखित हैं:

बजट और लोन का भारी दबाव: पांच-साढ़े पांच साल के लंबे एमबीबीएस कोर्स के दौरान केवल ट्यूशन फीस ही लाखों-करोड़ों में बैठती है। ऐसे में एक साल में डेढ़ से दो लाख रुपये तक की अचानक बढ़ोतरी (जैसे एनकेपी साल्वे कॉलेज में फीस का 13.95 लाख से बढ़कर 15.62 लाख होना) परिवार के पूरे बजट को बिगाड़ कर रख देती है। अभिभावकों को मजबूरन भारी-भरकम बैंक कर्ज (Education Loan) लेना पड़ रहा है।

छिपे हुए और अतिरिक्त खर्चे (Hidden Charges): अभिभावक प्रतिनिधियों का कहना है कि प्राधिकरण द्वारा जो फीस तय की जाती है, वह केवल ट्यूशन और डेवलपमेंट फीस होती है। इसके अलावा कॉलेज प्रबंधन द्वारा होस्टल फीस (Hostel Charges), मेस का खर्च, कॉशन मनी, लाइब्रेरी और परीक्षा शुल्क के नाम पर हर साल लाखों रुपये अलग से वसूले जाते हैं। कई मामलों में तो कागजों पर ट्यूशन फीस कम दिखाई जाती है, लेकिन अन्य खर्चों के नाम पर छात्रों का आर्थिक शोषण किया जाता है।

बुनियादी ढांचे में सुधार के बिना बढ़ोतरी: पैरेंट्स एसोसिएशन का आरोप है कि अधिकांश निजी कॉलेज बिना किसी अतिरिक्त या बेहतर शैक्षणिक बुनियादी ढांचे (Infrastructure) के ही हर साल अंधाधुंध फीस बढ़ा रहे हैं, जिसपर नियंत्रण लगाने वाला कोई ठोस तंत्र नजर नहीं आता।

नीट अभ्यर्थियों के भविष्य पर संकट

भारत में सरकारी मेडिकल कॉलेजों की सीमित सीटों के कारण लाखों छात्रों को मजबूरन प्राइवेट कॉलेजों का रुख करना पड़ता है।

मेधावी छात्र हो रहे बाहर: नीट जैसी कठिन राष्ट्रीय परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करने के बावजूद, यदि कोई छात्र सरकारी सीट पाने से चूक जाता है, तो प्राइवेट कॉलेजों की यह भारी-भरकम फीस उसके रास्ते का सबसे बड़ा रोड़ा बन जाती है।

सपना टूटने की कगार पर: गरीब और मध्यम वर्ग के वे परिवार जो अपनी जमीन या जेवर गिरवी रखकर बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं, वे इस बढ़ती हुई महंगाई के आगे लाचार नजर आ रहे हैं। छात्रों का कहना है कि यदि शिक्षा का बाजारीकरण इसी तरह जारी रहा, तो चिकित्सा पेशा केवल रईसों और अमीरों की जागीर बनकर रह जाएगा।

शैक्षणिक सत्र 2026–27 के लिए प्राइवेट एमबीबीएस की फीस का 7.50 लाख रुपये से लेकर 17.13 लाख रुपये के ऊंचे स्तर पर पहुंचना शिक्षा जगत में एक गंभीर चिंता का विषय है। सरकार और राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) को इस दिशा में कड़े कदम उठाने की आवश्यकता है, ताकि निजी संस्थानों की मनमानी फीस बढ़ोतरी पर लगाम लगाई जा सके। जब तक पारदर्शी और किफायती शुल्क नीति लागू नहीं होती, तब तक देश के प्रतिभावान युवाओं का यूं ही आर्थिक और मानसिक शोषण होता रहेगा, और अभिभावकों का यह असंतोष सड़कों से लेकर सोशल मीडिया तक यूं ही उबलता रहेगा