'हर हर मंजूषा, हर घर मंजूषा' अभियान के तहत भव्य कार्यक्रम आयोजित, मंजूषा गुरु मनोज कुमार पंडित के नेतृत्व में एक लाख लोगों को जागरूक करने का संकल्प

भागलपुर, मुख्य संवाददाता: अंग प्रदेश की प्राचीन, समृद्ध और सांस्कृतिक धरोहर के रूप में विश्वविख्यात 'मंजूषा कला' (Manjusha Art) को पुनर्जीवित करने और उसे जन-जन तक पहुँचाने के लिए भागलपुर में इन दिनों एक महाअभियान चलाया जा रहा है। इसी कड़ी में शहर में 'हर हर मंजूषा, हर घर मंजूषा' जागरूकता अभियान के अंतर्गत एक भव्य और प्रेरणादायी कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस विशेष कार्यक्रम का नेतृत्व प्रख्यात मंजूषा गुरु और राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित कलाकार मनोज कुमार पंडित ने किया। इस अभियान का मुख्य उद्देश्य भागलपुर और आसपास के ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों के कम से कम एक लाख लोगों को इस अद्वितीय लोककला के इतिहास, उसकी बनावट और सांस्कृतिक महत्व के प्रति जागरूक करना है।

क्या है मंजूषा कला और इसका ऐतिहासिक महत्व?

कार्यक्रम के दौरान मंजूषा गुरु मनोज कुमार पंडित ने उपस्थित कला प्रेमियों, युवाओं और छात्र-छात्राओं को विस्तार से बताया कि मंजूषा कला अंग क्षेत्र (विशेषकर भागलपुर और इसके आसपास के इलाकों) की एकमात्र ऐसी लोक चित्रकला है, जो अंग देश के प्रसिद्ध महाकाव्य और लोकगाथा 'बिशहरा' (विषहरी पूजा या माँ मनसा पूजा) की कथा पर आधारित है। इसे 'अंगिका पेंटिंग' भी कहा जाता है।

प्रमुख रंग और विशेषताएं: इस कला में मुख्य रूप से तीन पारंपरिक रंगों—पीला, हरा और लाल—का प्रयोग किया जाता है। इसकी रूपरेखा सर्प (सांप) की आकृति और प्राचीन मंदिरों जैसी संरचनाओं के इर्द-गिर्द घूमती है।

ऐतिहासिक मान्यता: इसे भारत की प्राचीन और विलुप्त होती लोक कलाओं में गिना जाता था, जिसे बचाने और अंतर्राष्ट्रीय मंच दिलाने में भागलपुर के कलाकारों ने लंबी लड़ाई लड़ी है। आज इस कला को देश-विदेश में 'अंग की पहचान' के रूप में देखा जाता है।

'हर हर मंजूषा, हर घर मंजूषा' अभियान का मुख्य उद्देश्य

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए अभियान के अगुआ और प्रख्यात गुरु मनोज कुमार पंडित ने कहा कि आधुनिकता की अंधी दौड़ और पश्चिमी संस्कृति के प्रभाव के कारण हमारी प्राचीन लोक कलाएं अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही हैं। नई पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से दूर होती जा रही है। इसी खाई को पाटने के लिए इस जन-जागरूकता अभियान की शुरुआत की गई है।

अभियान के मुख्य बिंदुओं पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने बताया कि:

एक लाख लोगों तक पहुँच: इस महाअभियान के माध्यम से भागलपुर जिले के विभिन्न विद्यालयों, महाविद्यालयों और सामुदायिक केंद्रों के जरिए कम से कम एक लाख नागरिकों, खासकर युवाओं को इस कला से जोड़ना है।

घरेलू और व्यावसायिक पहचान: जिस प्रकार घरों में अन्य धार्मिक या सांस्कृतिक प्रतीक होते हैं, उसी तरह हर घर में मंजूषा कला से जुड़ी कोई न कोई वस्तु (पेंटिंग, हस्तशिल्प, कपड़े आदि) मौजूद हो, यही इस नारे 'हर घर मंजूषा' का मूल भाव है।

स्थानीय कलाकारों को रोजगार: इस कला के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं और युवाओं को स्वरोजगार से जोड़ना, ताकि वे आर्थिक रूप से सशक्त हो सकें।

कार्यक्रम में उमड़ी भीड़, युवाओं और महिलाओं में दिखा भारी उत्साह

कार्यक्रम स्थल पर आयोजित इस जागरूकता शिविर में भाग लेने के लिए शहर के विभिन्न स्कूलों के छात्र, कला के छात्र और महिला स्वयं सहायता समूहों की सदस्याएं बड़ी संख्या में पहुँची थीं। आयोजन के दौरान मंजूषा गुरु मनोज कुमार पंडित ने लाइव डेमो (Live Demonstration) के जरिए युवा कलाकारों को मंजूषा कला के मूल सिद्धांतों और बारीकियों से अवगत कराया।

कार्यशाला (Workshop) का आयोजन: कार्यक्रम में एक छोटी कार्यशाला भी रखी गई, जहाँ युवाओं ने खुद अपने हाथों से पीला, हरा और लाल रंग लेकर मंजूषा के पारंपरिक बॉर्डर और सर्प आकृतियों को बनाना सीखा।

युवाओं की प्रतिक्रिया: भाग लेने वाले कई छात्र-छात्राओं ने कहा कि उन्हें पहली बार इतनी गहराई से पता चला कि उनके अपने शहर भागलपुर की संस्कृति इतनी समृद्ध है। उन्होंने संकल्प लिया कि वे अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और दोस्तों के बीच इस कला का प्रचार-प्रसार करेंगे।

अंग क्षेत्र की पहचान को वैश्विक मंच दिलाने का संकल्प

विशिष्ट अतिथियों और वक्ताओं ने अपने संबोधन में इस बात पर जोर दिया कि जिस प्रकार मधुबनी पेंटिंग (मिथिला पेंटिंग) को बिहार और देश भर में वैश्विक पहचान मिली है, ठीक उसी तरह मंजूषा कला भी अपनी अनूठी कथा-शैली के कारण पूरी दुनिया में अपनी विशेष जगह बना सकती है। जरूरत इस बात की है कि सरकार और स्थानीय प्रशासन के साथ-साथ आम जनता भी इस सांस्कृतिक विरासत को सहेजने में अपनी नैतिक जिम्मेदारी निभाए।

भागलपुर में आयोजित 'हर हर मंजूषा, हर घर मंजूषा' जागरूकता अभियान महज एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं है, बल्कि यह अपनी खोई हुई सांस्कृतिक अस्मिता को वापस पाने और उसे संजोने का एक बड़ा प्रयास है। मंजूषा गुरु मनोज कुमार पंडित के नेतृत्व में चल रहा यह अभियान आने वाले दिनों में भागलपुर के हर घर तक अपनी पहुँच बनाने में सफल साबित होगा, जिससे न केवल हमारी प्राचीन लोककला जीवित रहेगी, बल्कि आने वाली पीढ़ियां भी अपनी इस समृद्ध विरासत पर गर्व कर सकेंगी।