महानंदा और कोसी का कहर: कटिहार के कई गांवों पर मंडरा रहा कटाव का संकट, कृषि भूमि निगल रही नदियां

कटिहार, जागरण टीम। बिहार का सीमांचल क्षेत्र हर वर्ष बाढ़ और कटाव की दोहरी मार झेलता है, लेकिन कटिहार जिले की स्थिति कुछ अलग और अधिक गंभीर है। यहां महानंदा और कोसी नदियों का जलस्तर बढ़े या घटे, दोनों ही परिस्थितियों में लोगों को कटाव की समस्या का सामना करना पड़ता है। इस वर्ष भी यही स्थिति देखने को मिल रही है। हाल के दिनों में नदियों का जलस्तर बढ़ने के बाद अब धीरे-धीरे कम हो रहा है, लेकिन इसके साथ ही कई इलाकों में कटाव की रफ्तार तेज हो गई है। आजमनगर, कदवा, कुरसेला और आसपास के क्षेत्रों के दर्जनों गांवों में नदी कटाव का खतरा गहरा गया है, जिससे ग्रामीणों में चिंता बढ़ती जा रही है।

कटिहार जिले के कई हिस्सों में महानंदा और कोसी नदी लगातार अपनी धारा बदल रही हैं। नदी के किनारे बसे गांवों के लोगों का कहना है कि पिछले कुछ दिनों में नदी के बहाव में बदलाव आने के कारण खेतों और बस्तियों के पास कटाव तेजी से बढ़ा है। कई स्थानों पर उपजाऊ कृषि भूमि नदी में समा चुकी है, जबकि कई अन्य जगहों पर आबादी वाले क्षेत्रों तक कटाव पहुंचने की आशंका जताई जा रही है।

आजमनगर प्रखंड के कई गांवों में स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। ग्रामीणों का कहना है कि महानंदा नदी लगातार किनारों को काट रही है। कई किसानों की वर्षों की मेहनत से तैयार की गई खेती योग्य जमीन नदी में विलीन हो चुकी है। जिन खेतों में कुछ सप्ताह पहले तक धान और अन्य फसलों की तैयारी चल रही थी, वहां अब नदी का पानी और कटाव का मंजर दिखाई दे रहा है। किसानों का कहना है कि यदि कटाव की यही गति बनी रही तो आने वाले दिनों में कई और एकड़ जमीन नदी में समा सकती है।

कुरसेला क्षेत्र में कोसी नदी का कटाव लोगों के लिए बड़ी परेशानी बन गया है। कोसी को बिहार का "शोक" कहा जाता है और यह उपाधि एक बार फिर सही साबित होती दिखाई दे रही है। नदी के किनारे बसे गांवों के लोग दिन-रात भय के साये में जी रहे हैं। कई परिवारों ने अपने घरों के आसपास की जमीन खिसकते देखी है और उन्हें आशंका है कि यदि जल्द सुरक्षा उपाय नहीं किए गए तो उन्हें अपना आशियाना छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है।

कदवा प्रखंड में भी कटाव का असर लगातार बढ़ रहा है। यहां कई गांवों के किसान अपनी कृषि भूमि को बचाने के लिए स्वयं प्रयास कर रहे हैं। कहीं बालू की बोरियां लगाई जा रही हैं तो कहीं स्थानीय स्तर पर अस्थायी सुरक्षा दीवारें बनाई जा रही हैं। हालांकि ग्रामीणों का कहना है कि ये उपाय स्थायी समाधान नहीं हैं और बड़े स्तर पर सरकारी हस्तक्षेप की आवश्यकता है।

कटाव के कारण केवल कृषि भूमि ही प्रभावित नहीं हो रही है, बल्कि ग्रामीणों की आजीविका पर भी सीधा असर पड़ रहा है। अधिकांश लोग खेती पर निर्भर हैं और जमीन के नुकसान का मतलब उनके लिए आय के प्रमुख स्रोत का समाप्त होना है। कई किसानों ने बताया कि वे पहले ही बाढ़ और मौसम की अनिश्चितताओं से जूझ रहे हैं, ऐसे में कटाव की समस्या उनकी आर्थिक स्थिति को और कमजोर कर रही है।

स्थानीय लोगों का आरोप है कि हर वर्ष कटाव रोकने के लिए योजनाएं बनाई जाती हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर उनका अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता। कई ग्रामीणों का कहना है कि समय रहते यदि तटबंधों की मरम्मत और कटावरोधी कार्य कराए जाएं तो नुकसान को काफी हद तक रोका जा सकता है। उनका कहना है कि प्रशासन को केवल आपदा आने के बाद सक्रिय होने के बजाय पहले से तैयारी करनी चाहिए।

क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों ने भी कटाव की समस्या पर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने प्रशासन और जल संसाधन विभाग से प्रभावित क्षेत्रों का सर्वेक्षण कर तत्काल आवश्यक कदम उठाने की मांग की है। जनप्रतिनिधियों का कहना है कि यदि समय रहते कार्रवाई नहीं की गई तो आने वाले दिनों में स्थिति और गंभीर हो सकती है।

जल संसाधन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि कटाव प्रभावित क्षेत्रों पर लगातार नजर रखी जा रही है। विभाग की टीमों को संवेदनशील स्थानों का निरीक्षण करने का निर्देश दिया गया है। अधिकारियों के अनुसार, जहां कटाव का खतरा अधिक है, वहां आवश्यकतानुसार बचाव कार्य भी शुरू किए जाएंगे। हालांकि स्थानीय लोग चाहते हैं कि केवल निरीक्षण के बजाय तत्काल ठोस कार्रवाई की जाए।

विशेषज्ञों का मानना है कि नदियों के जलस्तर में तेजी से होने वाले उतार-चढ़ाव के कारण कटाव की समस्या बढ़ जाती है। जब जलस्तर घटता है तो नदी का बहाव किनारों पर अधिक दबाव बनाता है, जिससे मिट्टी का क्षरण तेज हो जाता है। यही कारण है कि जलस्तर कम होने के बावजूद कटाव की घटनाएं बढ़ जाती हैं।

पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार, जलवायु परिवर्तन और अनियमित वर्षा का प्रभाव भी नदियों के व्यवहार पर पड़ रहा है। पिछले कुछ वर्षों में नदियों की धारा और बहाव में तेजी से बदलाव देखने को मिला है। इसका असर सीधे तौर पर नदी किनारे बसे गांवों पर पड़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि दीर्घकालिक योजना और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाकर ही इस समस्या का स्थायी समाधान निकाला जा सकता है।

ग्रामीणों का कहना है कि हर वर्ष वे अपनी जमीन और घर बचाने की लड़ाई लड़ते हैं। कई परिवार ऐसे हैं जिन्हें पहले भी कटाव के कारण विस्थापित होना पड़ा था। अब एक बार फिर उनके सामने वही संकट खड़ा हो गया है। लोग प्रशासन से मांग कर रहे हैं कि प्रभावित परिवारों को राहत और सुरक्षा प्रदान की जाए तथा कटाव रोकने के लिए स्थायी उपाय किए जाएं।

फिलहाल महानंदा और कोसी नदी का जलस्तर धीरे-धीरे घट रहा है, लेकिन कटाव की समस्या लगातार बढ़ती जा रही है। प्रशासन और जल संसाधन विभाग स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं, जबकि ग्रामीण अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले दिनों में कटिहार जिले के कई गांवों को भारी नुकसान का सामना करना पड़ सकता है। क्षेत्र के लोगों की निगाहें अब प्रशासनिक कार्रवाई पर टिकी हैं और वे उम्मीद कर रहे हैं कि उनकी समस्या का जल्द समाधान निकलेगा।