सहरसा-पूर्णिया सीमा पर 'जलप्रलय': रूपौली के बिंदटोली गांव का अस्तित्व खतरे में, 400 लोग बेघर
रूपौली: कोसी और सहायक नदियों के जलस्तर में वृद्धि के साथ ही सीमांचल और कोसी क्षेत्र के गांवों पर संकट गहरा गया है। रूपौली थाना अंतर्गत बिंदटोली गांव आज अस्तित्व के संकट से जूझ रहा है। भीषण नदी कटाव के कारण यह गांव अब इतिहास के पन्नों में सिमट जाने की कगार पर है। कभी चहल-पहल से भरा रहने वाला यह गांव आज मलबे और पानी के बीच तब्दील हो चुका है।
विस्थापन की दर्दनाक कहानी
बिंदटोली गांव की स्थिति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक समय में यहां सैकड़ों परिवार हंसी-खुशी रहते थे, लेकिन आज वहां मात्र 5 से 10 बासे (घर) ही शेष बचे हैं। बाकी पूरा गांव नदी की आगोश में समा चुका है।
जनसंख्या का पलायन: इस गांव की लगभग 400 की आबादी अब पूरी तरह विस्थापित हो चुकी है। ये लोग अब ऊंचे बांधों या अन्य गांवों में शरण लेने को मजबूर हैं।
संपत्ति का नुकसान: गांव के साथ-साथ उपजाऊ कृषि भूमि, पशुधन और स्थानीय बुनियादी ढांचा भी नदी के कटाव में बह गया है।
ग्रामीणों की मांग: पुनर्वास और रिंग बांध का निर्माण
बिंदटोली के विस्थापित ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने अपना सब कुछ गंवा दिया है। अब उनकी प्रमुख मांगें निम्नलिखित हैं:
उचित पुनर्वास (Rehabilitation): शासन द्वारा विस्थापित परिवारों को रहने के लिए सुरक्षित जमीन और पक्के आवास उपलब्ध कराए जाएं।
रिंग बांध (Ring Dam) का निर्माण: ग्रामीणों का मानना है कि यदि प्रशासन ने समय रहते कटाव निरोधी कार्य और रिंग बांध का निर्माण कराया होता, तो आज यह स्थिति नहीं होती। अब भी जो क्षेत्र बचा है, उसे बचाने के लिए तत्काल कटाव निरोधी कार्य शुरू किए जाने चाहिए।
प्रशासन और सरकारी तंत्र की सुस्ती
स्थानीय प्रशासन पर विस्थापन के बाद की व्यवस्था को लेकर सवाल उठ रहे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि आपदा की इस घड़ी में उन्हें जो सहायता मिलनी चाहिए थी, वह नाकाफी है। हालांकि, प्रशासन के अधिकारियों का कहना है कि विस्थापितों को सरकारी सहायता उपलब्ध कराने की प्रक्रिया चल रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर इसका लाभ बहुत ही धीमी गति से पहुंच रहा है।
कटाव का वैज्ञानिक और पर्यावरणीय कारण
कोसी बेसिन क्षेत्र में मिट्टी का कटाव एक वार्षिक समस्या है। मानसून के समय जल का तीव्र प्रवाह और नदी का बदलता रास्ता (Meandering) किनारे स्थित गांवों को पूरी तरह तबाह कर देता है। बिंदटोली जैसे गांवों के लिए दीर्घकालिक योजना न होना ही इस विस्थापन का मुख्य कारण है। विशेषज्ञों के अनुसार, नदी तटों पर वृक्षारोपण और भू-संरक्षण की आधुनिक तकनीकों का अभाव इस तरह के गांवों के लिए घातक सिद्ध हो रहा है।
भविष्य की चुनौतियां
आज बिंदटोली के लोग जिस स्थिति में हैं, वह किसी भी विकसित समाज के लिए चिंता का विषय है। विस्थापितों के सामने अब आजीविका का संकट है। खेतिहर मजदूर के रूप में काम करने वाले ये लोग अब भूमिहीन हो चुके हैं। यदि सरकार ने समय रहते इनके पुनर्वास के साथ-साथ आजीविका के साधन उपलब्ध नहीं कराए, तो इन परिवारों का भविष्य अंधकारमय हो जाएगा।
प्रशासनिक सूत्रों का कहना है कि उच्च अधिकारियों को इस स्थिति से अवगत करा दिया गया है। कटाव निरोधी कार्य के लिए प्रस्ताव भेजे गए हैं, लेकिन तकनीकी और वित्तीय बाधाओं के कारण कार्य प्रारंभ होने में समय लग रहा है। फिलहाल, बिंदटोली के लोग उम्मीद भरी नजरों से राहत की ओर देख रहे हैं।
बिंदटोली गांव का यह मामला केवल एक गांव के डूबने की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस बड़ी त्रासदी का संकेत है जो हर साल बिहार के सीमांचल और कोसी क्षेत्र में घटित होती है। क्या प्रशासन आने वाले समय में इन गांवों को बचाने के लिए कोई 'मास्टर प्लान' तैयार करेगा या फिर बिंदटोली की तरह अन्य गांव भी नक्शे से गायब होते रहेंगे?