तारापुर के 'जीविका दीदी की रसोई' में भोजन की गुणवत्ता को लेकर गरमाया मामला: शिकायतों के बाद सिविल सर्जन के निर्देश पर बीपीएम ने की औचक निगरानी, उपाधीक्षक डॉ. एमके पाठक ने स्वास्थ्य कर्मियों से जानी हकीकत
तारापुर (मुंगेर): बिहार सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाओं में शामिल और ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने वाली 'जीविका दीदी की रसोई' एक बार फिर सुर्खियों में है। मुंगेर जिले के तारापुर अनुमंडलीय अस्पताल परिसर में संचालित 'जीविका दीदी की रसोई' के माध्यम से मरीजों को मिलने वाले भोजन की गुणवत्ता और मानको को लेकर पिछले कुछ दिनों से लगातार सवाल उठाए जा रहे थे। अस्पताल में भर्ती मरीजों और उनके तीमारदारों द्वारा खाने के स्वाद, साफ-सफाई और पौष्टिकता को लेकर की गई शिकायतों को जिला स्वास्थ्य प्रशासन ने अत्यंत गंभीरता से लिया है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, सिविल सर्जन के सख्त निर्देश के बाद ब्लॉक प्रोजेक्ट मैनेजर (BPM) ने तारापुर पहुंचकर 'जीविका दीदी की रसोई' की औचक निगरानी की। वहीं दूसरी ओर, अस्पताल के उपाधीक्षक (Deputy Superintendent) डॉ. एमके. पाठक ने भी मौके पर पहुंचकर वहां तैनात स्वास्थ्य कर्मियों और मरीजों से भोजन की गुणवत्ता के संबंध में विस्तृत जानकारी ली। इस प्रशासनिक हलचल से अस्पताल प्रबंधन और रसोई का संचालन करने वाली दीदियों में सतर्कता बढ़ गई है। आइए जानते हैं इस पूरे प्रकरण का पूरा एवं विस्तृत विवरण।
क्या है पूरा मामला? क्यों उठे भोजन की गुणवत्ता पर सवाल?
'जीविका दीदी की रसोई' का मुख्य उद्देश्य सरकारी अस्पतालों में भर्ती मरीजों को घर जैसा, ताजा, पौष्टिक और गुणवत्तापूर्ण भोजन उपलब्ध कराना है। इसके तहत मरीजों को मुफ्त या निर्धारित दरों पर भोजन मुहैया कराया जाता है। लेकिन तारापुर अस्पताल में कुछ दिनों से व्यवस्थाओं को लेकर मतभेद उभर रहे थे।
मरीजों की लगातार शिकायतें: अस्पताल के विभिन्न वार्डों में भर्ती मरीजों और उनके परिजनों का आरोप था कि पिछले कुछ समय से रसोई से मिलने वाले खाने की गुणवत्ता में गिरावट आई है। कभी भोजन का समय पर न मिलना, तो कभी दाल-सब्जी की पतली बनावट और मेनू के अनुसार भोजन न मिलने की बातें सामने आ रही थीं।
स्वास्थ्य और पोषण पर असर: सरकारी अस्पतालों में इलाज करा रहे मरीज पहले से ही कमजोर होते हैं, ऐसे में यदि उन्हें पौष्टिक आहार न मिले, तो उनके स्वास्थ्य लाभ (Recovery) की प्रक्रिया धीमी हो जाती है। जब ये शिकायतें लगातार बढ़ने लगीं, तो मामला सिविल सर्जन के संज्ञान में पहुंच गया।
सिविल सर्जन का कड़ा निर्देश और बीपीएम की औचक निगरानी
मामले की गंभीरता को देखते हुए जिला स्तर से तुरंत हस्तक्षेप किया गया और जमीनी हकीकत जानने के लिए अधिकारियों को मैदान में उतारा गया।
सिविल सर्जन का सख्त रुख: मुंगेर के सिविल सर्जन ने तारापुर अस्पताल प्रबंधन को निर्देश दिया कि मरीजों के भोजन के मामले में किसी भी प्रकार की कोताही या लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। उन्होंने तत्काल प्रभाव से रसोई की कार्यप्रणाली की जांच और निगरानी के आदेश दिए।
बीपीएम द्वारा औचक निरीक्षण: सिविल सर्जन के निर्देश के आलोक में ब्लॉक प्रोजेक्ट मैनेजर (BPM) ने तारापुर स्थित 'जीविका दीदी की रसोई' का औचक निरीक्षण किया। बीपीएम ने रसोई के अंदर जाकर साफ-सफाई, खाना बनाने में इस्तेमाल होने वाली सामग्री (मसाले, दाल, चावल, तेल आदि), भंडारण की स्थिति और खाना पकाने की पूरी प्रक्रिया का बारीकी से मु मुआयना किया। उन्होंने वहां मौजूद दीदियों को स्पष्ट निर्देश दिए कि भोजन की गुणवत्ता से किसी भी कीमत पर समझौता नहीं किया जाना चाहिए।
उपाधीक्षक डॉ. एमके. पाठक की पहल: स्वास्थ्य कर्मियों और मरीजों से फीडबैक
स्थानीय स्तर पर स्थिति को सुधारने और मरीजों को संतुष्ट करने के लिए तारापुर अनुमंडलीय अस्पताल के उपाधीक्षक डॉ. एमके. पाठक ने भी सक्रिय भूमिका निभाई।
वार्डों में जाकर मरीजों से संवाद: डॉ. एमके. पाठक ने अस्पताल के विभिन्न वार्डों का दौरा किया और सीधे मरीजों व उनके तीमारदारों से रूबरू होकर पूछा कि उन्हें कैसा खाना मिल रहा है। उन्होंने खाने के स्वाद, मात्रा और स्वच्छता के बारे में मरीजों से फीडबैक लिया।
स्वास्थ्य कर्मियों से पूछताछ: उपाधीक्षक ने अस्पताल में तैनात स्वास्थ्य कर्मियों और ड्यूटी पर मौजूद नर्सों से भी जानकारी ली कि क्या समय पर मरीजों तक भोजन पहुंच रहा है या नहीं। उन्होंने कर्मियों को यह भी निर्देश दिया कि वे नियमित रूप से खाने के पैकेट या थाली की गुणवत्ता की जांच करें, ताकि यदि कोई कमी हो, तो तुरंत उसका समाधान किया जा सके।
'जीविका दीदी की रसोई' का उद्देश्य और सुधार की गुंजाइश
'जीविका दीदी की रसोई' योजना ग्रामीण महिलाओं के स्वावलंबन का एक बेहतरीन उदाहरण है, जिससे सैकड़ों परिवारों की आजीविका जुड़ी हुई है। लेकिन इसके सफल संचालन के लिए गुणवत्ता नियंत्रण (Quality Control) सबसे अहम पहलू है।
पारदर्शिता और साफ-सफाई पर जोर: इस औचक निरीक्षण और प्रशासनिक जांच के बाद यह बात स्पष्ट हो गई है कि संचालन समितियों को साफ-सफाई, तय मेनू और समयबद्धता का विशेष ध्यान रखना होगा।
भविष्य के लिए चेतावनी: अधिकारियों की इस सख्ती से यह संदेश साफ है कि यदि भविष्य में भोजन की गुणवत्ता को लेकर फिर से शिकायतें मिलीं, तो संबंधित एजेंसी या प्रबंधन के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जा सकती है।
तारापुर अनुमंडलीय अस्पताल स्थित 'जीविका दीदी की रसोई' में भोजन की गुणवत्ता को लेकर उठे सवालों के बाद सिविल सर्जन के निर्देश पर बीपीएम और उपाधीक्षक डॉ. एमके. पाठक द्वारा की गई यह निगरानी और जांच प्रशासनिक संवेदनशीलता को दर्शाती है। मरीजों के स्वास्थ्य और उनके अधिकारों के प्रति प्रशासन का यह रुख स्वागत योग्य है। उम्मीद है कि इस कार्रवाई के बाद रसोई के संचालन में सुधार आएगा और अस्पताल में भर्ती हर मरीज को ताज़ा, पौष्टिक और गुणवत्तापूर्ण भोजन समय पर मिल सकेगा, जिससे 'जीविका दीदी की रसोई' की साख भी बरकरार रहे और मरीजों को भी राहत मिले।