सहरसा में एनएच सड़कों पर हरियाली का अकाल: सिर्फ सोनवर्षाराज में हो रहा पौधरोपण, अन्य क्षेत्रों में पेड़ न होने से बढ़ रहा प्रदूषण और घट रही छांव

सहरसा: बिहार के सहरसा जिले से पर्यावरण संरक्षण और प्रशासनिक उदासीनता को लेकर एक बेहद चिंताजनक तस्वीर सामने आ रही है। जिले से गुजरने वाले राष्ट्रीय राजमार्गों (National Highways - NH) और मुख्य सड़कों के किनारे इन दिनों हरियाली की भारी कमी देखी जा रही है। हालात यह हैं कि केवल सोनवर्षाराज (Sonbarsa Raj) प्रखंड क्षेत्र को छोड़कर एनएच की पटरियों पर शायद ही कहीं पौधे नजर आते हैं। अन्य तमाम ग्रामीण और शहरी इलाकों में सड़कों के किनारे पेड़ न होने के कारण न केवल पर्यावरण का संतुलन बिगड़ रहा है, बल्कि लगातार बढ़ता प्रदूषण और भीषण गर्मी में राहगीरों को छांव न मिलना गंभीर समस्या बन गया है। इस बदतर स्थिति को लेकर स्थानीय लोगों और पर्यावरण प्रेमियों में गहरा रोष व्याप्त है, और वे सड़कों के दोनों ओर बड़े पैमाने पर पौधरोपण करने की पुरजोर मांग कर रहे हैं। आइए जानते हैं इस समस्या के सभी पहलुओं और इसके दूरगामी प्रभावों का पूरा विवरण।

 सहरसा के एनएच मार्गों पर हरियाली का संकट: धरातल पर कंक्रीट और धूल

सहरसा जिले से गुजरने वाले विभिन्न एनएच और राज्य राजमार्गों (State Highways) के चौड़ीकरण और निर्माण के दौरान सड़कों के किनारे की पुरानी हरियाली या तो विकास की भेंट चढ़ गई या फिर अंधाधुंध कटाई का शिकार हो गई।

पेड़ों के नाम पर खाली पटरियां: जब कोई यात्री सहरसा से अन्य जिलों की ओर सफर करता है, तो उसे सड़कों के दोनों तरफ सिर्फ धूल उड़ती हुई या कंक्रीट की पटरियां दिखाई देती हैं। सोनवर्षाराज को छोड़कर बाकी किसी भी क्षेत्र में वन विभाग या एनएचएआई (NHAI) द्वारा पेड़ों के संरक्षण और नए पौधे लगाने की दिशा में कोई ठोस पहल जमीन पर उतरती नहीं दिखती।

बढ़ता प्रदूषण और जहरीली हवा: वाहनों के लगातार आवागमन से निकलने वाला धुआं और उड़ती हुई धूल सीधे हवा में घुल रही है। सड़कों के किनारे पेड़ न होने के कारण प्राकृतिक रूप से प्रदूषण को फिल्टर करने वाला कोई जरिया नहीं बचा है, जिसके चलते पर्यावरण में कार्बन की मात्रा बढ़ती जा रही है और हवा लगातार जहरीली हो रही है।

 सोनवर्षाराज की पहल: एकमात्र अपवाद जो उम्मीद जगाता है

इस निराशाजनक माहौल के बीच सहरसा जिले के अंतर्गत आने वाला सोनवर्षाराज क्षेत्र एक सकारात्मक अपवाद के रूप में सामने आया है।

पौधरोपण की सराहनीय तस्वीर: सोनवर्षाराज क्षेत्र में स्थानीय प्रशासन, वन विभाग या सामाजिक संगठनों के प्रयासों से एनएच के किनारे कुछ हिस्सों में पौधरोपण के कार्य किए गए हैं। यहां सड़क के किनारे पौधे लहलहाते हुए देखे जा सकते हैं।

अन्य क्षेत्रों में भी ऐसी पहल की दरकार: स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि सोनवर्षाराज में इच्छाशक्ति दिखाकर हरियाली लौटाई जा सकती है, तो सहरसा के अन्य प्रखंडों और मुख्य एनएच मार्गों पर ऐसा क्यों नहीं किया जा सकता? अन्य क्षेत्रों के प्रशासनिक अधिकारियों को भी इस मॉडल से सीख लेनी चाहिए।

भीषण गर्मी और राहगीरों का दर्द: छांव की तलाश में भटकते लोग

पेड़ों के न होने का सबसे सीधा और क्रूर प्रभाव आम राहगीरों, पैदल चलने वाले मजदूरों, साइकिल चालकों और स्कूली बच्चों पर पड़ रहा है।

चिलचिलाती धूप और चिलचिलाती सड़कें: गर्मियों के मौसम में सहरसा का तापमान चरम सीमा पर पहुंच जाता है। ऐसे में जब एनएच पर मीलों तक कोई पेड़ या छांव नहीं मिलती, तो धूप में चलना किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं होता।

यात्री शेड और पेड़ों का अभाव: पहले के समय में लोग सड़क किनारे बड़े-बड़े पेड़ों की घनी छांव में थोड़ी देर सुस्ता लेते थे, लेकिन अब पेड़ कट जाने से सड़क पर सफर करना और भी कष्टदायक हो गया है। छांव न मिलने के कारण कई बार राहगीर लू (Heatwave) और डिहाइड्रेशन का शिकार होकर बीमार पड़ जाते हैं।

स्थानीय लोगों की मांग: 'पेड़ लगाओ, जीवन बचाओ'

सहरसा के विभिन्न इलाकों के स्थानीय नागरिकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों ने प्रशासन के खिलाफ आवाज उठानी शुरू कर दी है। उनका साफ कहना है कि केवल कागजी विज्ञापनों और पर्यावरण दिवस पर फोटो खिंचवाने से हरियाली नहीं आएगी, बल्कि जमीनी स्तर पर काम करना होगा।

सड़क के दोनों ओर वृहद पौधरोपण अभियान: जनता की मांग है कि जिले के सभी एनएच और प्रमुख सड़कों के दोनों किनारों पर तेजी से छायादार और फलदार पौधे लगाए जाएं।

पौधों की सुरक्षा की गारंटी: केवल पौधे लगाना ही काफी नहीं है, बल्कि उनकी देखरेख और सिंचाई के लिए ट्री गार्ड (Tree Guard) की व्यवस्था की जानी चाहिए ताकि जानवर उन्हें न नुकसान पहुंचा सकें और वे बड़े होकर पेड़ का रूप ले सकें।

सहरसा में एनएच सड़कों पर हरियाली की भारी कमी और केवल सोनवर्षाराज तक सीमित पौधरोपण की यह स्थिति प्रशासनिक प्राथमिकताओं पर बड़ा सवालिया निशान लगाती है। विकास और कंक्रीट के इस दौर में प्रकृति की अनदेखी करना हमारे अपने ही भविष्य के साथ खिलवाड़ है। यदि समय रहते सहरसा जिला प्रशासन, वन विभाग और एनएचएआई ने मिलकर व्यापक पौधरोपण अभियान नहीं चलाया, तो आने वाले दिनों में यहां का पर्यावरण और भी अधिक खतरनाक स्तर पर पहुंच जाएगा। जनता की मांग स्पष्ट है—सड़कें चौड़ी हों, विकास हो, लेकिन उसके साथ-साथ सड़कों के किनारे हरी-भरी चादर भी बिछाई जाए ताकि राहगीरों को छांव और पर्यावरण को शुद्ध हवा मिल सके।