सहरसा में लूट के एक माह बाद भी न्याय की दरकार: पुलिस की निष्क्रियता पर उठे सवाल
सहरसा (बिहार): सहरसा जैसे संवेदनशील और अपराध की दृष्टि से चर्चा में रहने वाले जिले में कानून-व्यवस्था की स्थिति एक बार फिर सवालों के घेरे में है। 26 मई को हुई एक बड़ी लूट की घटना के एक माह बीत जाने के बाद भी स्थानीय पुलिस किसी भी आरोपी को गिरफ्तार करने में नाकाम रही है। पीड़ित द्वारा थाने में नामजद शिकायत दर्ज कराने के बावजूद मामले का ठंडे बस्ते में चले जाना न केवल पुलिस की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न लगाता है, बल्कि आम नागरिकों में सुरक्षा के प्रति भय और अविश्वास की भावना को भी गहरा कर रहा है।
घटना का विवरण
26 मई को दिनदहाड़े हुई इस लूट की घटना ने पूरे क्षेत्र को दहला दिया था। प्रत्यक्षदर्शियों और पीड़ित के बयानों के अनुसार, हथियारबंद अपराधियों ने दिन के उजाले में लूटपाट की और बड़ी ही चालाकी से फरार हो गए। पीड़ित ने उसी दिन स्थानीय थाना में मामले की प्राथमिकी दर्ज कराई थी और पुलिस को अपराधियों के हुलिए और वारदात के तरीके के बारे में विस्तृत जानकारी दी थी। घटना के समय पुलिस द्वारा त्वरित कार्रवाई का आश्वासन भी दिया गया था, लेकिन 30 दिनों का लंबा समय बीत जाने के बाद भी स्थिति जस की तस बनी हुई है।
एक माह बीत जाने के बाद भी खाली हाथ पुलिस
एक माह की अवधि किसी भी गंभीर आपराधिक जांच के लिए काफी होती है। सहरसा पुलिस की विफलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अभी तक न तो किसी आरोपी की पहचान उजागर की गई है और न ही लूट के सामान की बरामदगी हुई है। पुलिस के उच्चाधिकारी इस मामले पर चुप्पी साधे हुए हैं, जबकि निचले स्तर के अधिकारियों का वही पुराना रटा-रटाया जवाब मिल रहा है—"मामले की छानबीन की जा रही है।"
इस मामले में सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि घटनास्थल के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज तक का उपयोग सही तरीके से नहीं किया गया। क्या पुलिस के पास तकनीकी साक्ष्य की कमी है या फिर किसी राजनीतिक दबाव के कारण जांच को जानबूझकर धीमा किया गया है? यह सवाल अब स्थानीय जनता के बीच चर्चा का मुख्य विषय बन गया है।
स्थानीय जनता और पीड़ितों में आक्रोश
पीड़ित परिवार का कहना है कि वे न्याय के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं। उनका आरोप है कि थाने के चक्कर काटने के बाद भी उन्हें केवल निराशा ही हाथ लगी है। क्षेत्र के निवासी भी इस घटना से डरे हुए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है:
"अगर दिनदहाड़े ऐसी लूट हो सकती है और पुलिस एक महीने तक अपराधियों को पकड़ नहीं पाती, तो हम सुरक्षित होने की उम्मीद किससे रखें? सहरसा में गंभीर मामलों में पुलिस का यह ढुलमुल रवैया अपराधियों के मनोबल को और बढ़ा रहा है।"
स्थानीय निवासियों का यह भी आरोप है कि पुलिस केवल बड़े और हाई-प्रोफाइल मामलों में सक्रियता दिखाती है, जबकि आम आदमी के साथ होने वाली अपराधों को सामान्य मानकर फाइल बंद कर दी जाती है।
कानून-व्यवस्था और पुलिस प्रशासन की जिम्मेदारी
सहरसा की यह घटना जिले के पुलिस प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती है। राज्य के पुलिस मुख्यालय के दावों के विपरीत, ज़मीनी हकीकत यह है कि अपराधियों का डर कम होने के बजाय बढ़ रहा है। पुलिस की प्राथमिक जिम्मेदारी अपराध को रोकना और अपराधियों को कानून के कटघरे में खड़ा करना है। यदि पुलिस एक महीने तक लूट जैसे संगीन अपराध में भी कोई प्रगति नहीं कर पाती है, तो यह प्रशासनिक विफलता ही मानी जाएगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में पुलिस की देरी से न केवल पीड़ितों का भरोसा टूटता है, बल्कि समाज में 'कानून के डर' का अंत हो जाता है। यदि समय रहते कार्रवाई नहीं की गई, तो सहरसा में इसी तरह की अन्य घटनाओं की पुनरावृत्ति होने से इंकार नहीं किया जा सकता।
अब देखना यह है कि क्या इस समाचार के सार्वजनिक होने के बाद सहरसा पुलिस प्रशासन अपनी नींद से जागता है या नहीं। पीड़ित परिवार ने अब पुलिस के वरीय अधिकारियों और जिला प्रशासन से गुहार लगाई है कि मामले की उच्च-स्तरीय जांच कराई जाए। क्या पुलिस दबाव में आकर अपराधियों को पकड़ेगी, या पीड़ित को न्याय के लिए लंबी और कठिन लड़ाई लड़नी पड़ेगी?
यह मामला केवल एक लूट की घटना नहीं है, बल्कि यह सहरसा की उस व्यवस्था का प्रतीक है जहां पीड़ित को ही अपनी रक्षा के लिए जूझना पड़ता है। स्थानीय जनता की मांग स्पष्ट है: अपराधियों की गिरफ्तारी हो और पुलिस अपनी जिम्मेदारी को ईमानदारी से निभाए।