मुजफ्फरपुर में प्रचार-प्रसार के अभाव में ठंडी शुरुआत: देवघर-वासुकीनाथ और रांची के लिए शुरू हुई सरकारी बस सेवा में यात्रियों का अकाल

मुजफ्फरपुर: बिहार के मुजफ्फरपुर जिले से झारखंड के प्रमुख धार्मिक और व्यावसायिक केंद्रों—देवघर, वासुकीनाथ और रांची—के लिए बिहार राज्य पथ परिवहन निगम (BSRTC) द्वारा शुरू की गई नई सरकारी बस सेवा को लेकर एक बड़ी लापरवाही सामने आई है। सावन के पवित्र महीने और प्रशासनिक दावों के बीच शुरू हुई इस बहुप्रतीक्षित बस सेवा का संचालन बिना किसी प्रचार-प्रसार (Lack of Publicity) के शुरू कर दिया गया, जिसके कारण उद्घाटन के पहले ही दिन इस योजना की पोल खुल गई।

प्रचार के अभाव और सूचनाओं के समय पर आम जनता तक न पहुँच पाने के कारण पहले दिन बसों में यात्रियों की संख्या बेहद निराशाजनक रही। स्थिति यह रही कि सुल्तानगंज और देवघर जाने वाली बसों में जहाँ तहाँ कुछ कांवरिया सवार हुए, वहीं रांची के लिए रवाना हुई लग्जरी सरकारी बस में मात्र 19 यात्री ही मौजूद थे। आइए जानते हैं इस पूरी खबर के विस्तार से, कि कैसे प्रशासनिक सुस्ती के कारण एक अच्छी पहल फीकी पड़ती नजर आ रही है।

क्या है पूरी योजना और क्यों शुरू की गई यह बस सेवा?

बिहार सरकार और परिवहन विभाग लगातार यह प्रयास कर रहा है कि राज्य के विभिन्न जिलों से प्रमुख धार्मिक स्थलों और राजधानी शहरों के बीच सीधी, सुरक्षित और किफायती बस सेवा उपलब्ध कराई जाए। विशेषकर सावन मास के दौरान देवघर और वासुकीनाथ जाने वाले कांवड़ियों की भारी भीड़ को देखते हुए मुजफ्फरपुर से सीधी बस सेवा की मांग लंबे समय से की जा रही थी।

कांवरियों की सुविधा: मुजफ्फरपुर और आसपास के जिलों से हर साल लाखों शिव भक्त सुल्तानगंज से जल लेकर देवघर और वासुकीनाथ बाबा का जलाभिषेक करने जाते हैं। इन्हें सुगम यात्रा प्रदान करने के उद्देश्य से यह विशेष बस सेवा शुरू की गई थी।

रांची के लिए कनेक्टिविटी: झारखंड की राजधानी रांची के लिए भी व्यापारिक और शैक्षणिक दृष्टिकोण से मुजफ्फरपुर से सीधी बसों की मांग रहती है।

लेकिन इतनी महत्वपूर्ण और जनोपयोगी योजना के धरातल पर उतरने के बावजूद, विभागीय अधिकारियों की लचर कार्यशैली ने इसकी शुरुआत को ही फीका कर दिया।

पहले दिन का हाल: दो दर्जन कांवरिया गए सुल्तानगंज, रांची बस में बैठे सिर्फ 19 यात्री

जब नियत समय पर मुजफ्फरपुर बस स्टैंड (या निर्धारित बोर्डिंग पॉइंट) से देवघर-वासुकीनाथ और रांची के लिए बसों ने अपनी यात्रा शुरू की, तो अंदर का नजारा हैरान करने वाला था।

देवघर-वासुकीनाथ व सुल्तानगंज रूट: सावन का दूसरा और तीसरा हफ्ता होने के बावजूद, जहाँ प्राइवेट वाहनों और ट्रेनों में कांवड़ियों की भारी भीड़ उमड़ रही थी, वहीं सरकारी बस में पहले दिन मात्र दो दर्जन (लगभग 24-25) कांवरिया ही सुल्तानगंज जाने के लिए सवार हो पाए। बस में दर्जनों सीटें खाली पड़ी थीं।

रांची रूट की बस: रांची के लिए रवाना हुई सरकारी बस की स्थिति और भी दयनीय रही। विशाल और आरामदायक मानी जाने वाली इस बस में क्षमता से बहुत कम, यानी केवल 19 यात्री ही सफर कर रहे थे।

खाली सीटों के साथ दौड़ती इन बसों को देखकर परिवहन विभाग के अधिकारियों के माथे पर भी चिंता की लकीरें खिंच गई हैं। सवाल यह उठ रहा है कि आखिर सरकार और निगम द्वारा चलाई जाने वाली ऐसी योजनाओं की शुरुआत से पहले आम जनता तक जानकारी क्यों नहीं पहुंचाई जाती है?

प्रचार-प्रसार का अभाव: सबसे बड़ी लापरवाही

इस लचर शुरुआत के पीछे सबसे बड़ा कारण प्रचार-प्रसार की पूरी तरह से कमी होना माना जा रहा है। किसी भी नई परिवहन सेवा, उसके किराए, समय-सारणी (Time Table) और रूट चार्ट की जानकारी अखबारों, सोशल मीडिया, बस स्टैंड पर लाउडस्पीकर या होर्डिंग्स के जरिए आम जनता तक पहुंचाई जानी चाहिए थी।

सूचना का अभाव: मुजफ्फरपुर के आम नागरिकों, दैनिक यात्रियों और कांवरियों को इस बात की भनक तक नहीं थी कि मुजफ्फरपुर से देवघर, वासुकीनाथ और रांची के लिए कोई नई सरकारी बस सेवा शुरू हो चुकी है।

टिकट काउंटर पर असमंजस: बस स्टैंड पर पहुंचने वाले यात्रियों को जब इस सेवा के बारे में पता चला, तब तक बसें रवाना होने की स्थिति में थीं। उचित रूट चार्ट और समय की जानकारी न होने के कारण लोग पुरानी और निजी गाड़ियों का ही रुख करते रहे।

विभाग की उदासीनता: परिवहन निगम के स्थानीय अधिकारियों ने बसें तो हरी झंडी दिखाकर रवाना कर दीं, लेकिन इसके विज्ञापन और मार्केटिंग पर कोई ध्यान नहीं दिया, जिसका खामियाजा पहले दिन खाली चल रही बसों के रूप में भुगतना पड़ा।

यात्रियों की प्रतिक्रिया और असंतोष

जब मुजफ्फरपुर बस स्टैंड पर मौजूद कुछ यात्रियों और कांवरियों से बातचीत की गई, तो उन्होंने अपनी नाराजगी खुलकर जाहिर की।

एक कांवड़िए ने बताया, "हम लोग सुल्तानगंज जाने के लिए ट्रेन या प्राइवेट वाहन की तलाश कर रहे थे। अगर हमें पहले से पता होता कि सरकार की तरफ से सीधी बस सेवा चलाई जा रही है, तो हम इसी से जाते। हमें तो बस स्टैंड पर आने के बाद ही इसके बारे में पता चला, लेकिन तब तक समय निकल चुका था।"

एक अन्य दैनिक यात्री ने कहा कि सरकारी योजनाएं कागजों पर तो बहुत शानदार दिखती हैं, लेकिन उनके क्रियान्वयन और पब्लिसिटी में अफसरशाही भारी पड़ जाती है। यदि समय पर पैफलेट छपवाए जाते या लोकल मीडिया में टाइम-टेबल दिया जाता, तो पहले दिन ही बसें फुल हो जातीं।

परिवहन विभाग और प्रशासन की प्रतिक्रिया

मामले के तूल पकड़ने और मीडिया में खबरें आने के बाद परिवहन निगम के अधिकारियों की नींद खुली है। अधिकारियों का कहना है कि यह सेवा अभी बिल्कुल नई शुरू की गई है, इसलिए शुरुआती दिनों में यात्रियों को इसकी जानकारी होने में थोड़ा समय लग रहा है।

विभाग की ओर से यह आश्वासन दिया गया है कि आने वाले दिनों में:

पब्लिसिटी बढ़ाई जाएगी: बस स्टैंड पर बड़े-बड़े बैनर और पोस्टर लगाए जाएंगे ताकि आने-जाने वाले यात्रियों को रूट और समय की पूरी जानकारी मिल सके।

किराए और सुविधाओं का प्रचार: सोशल मीडिया और स्थानीय समाचार माध्यमों के जरिए बस के किराए, प्रस्थान समय और सुविधाओं का प्रचार प्रसार किया जाएगा।

निरंतरता बनी रहेगी: यात्रियों की संख्या कम होने के बावजूद फिलहाल बसों का परिचालन बंद नहीं किया जाएगा, ताकि धीरे-धीरे लोगों में इसकी आदत पड़ सके।

मुजफ्फरपुर से देवघर-वासुकीनाथ और रांची के लिए शुरू की गई सरकारी बस सेवा का यह अनुभव प्रशासनिक लापरवाही का एक सटीक उदाहरण है। योजनाएं चाहे जितनी भी अच्छी क्यों न हों, यदि उनका सही समय पर प्रचार-प्रसार न किया जाए और जनता तक उनकी पहुँच सुलभ न बनाई जाए, तो उनका उद्देश्य विफल हो जाता है। सावन के पवित्र अवसर पर कांवरियों के लिए शुरू की गई इस सेवा को यदि पटरी पर लाना है, तो परिवहन विभाग को तुरंत युद्धस्तर पर इसकी मार्केटिंग करनी होगी, अन्यथा यह योजना कुछ ही दिनों में बंद होने की कगार पर पहुँच जाएगी।