पूर्णिया में 100 दिनों के सघन अभियान में 2,000 टीबी मरीजों की हुई पहचान

पूर्णिया: स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन की संयुक्त पहल पर जिले में चलाए गए 'टीबी मुक्त भारत अभियान' के तहत एक बड़ी उपलब्धि हासिल हुई है। विश्व यक्ष्मा दिवस (24 मार्च) के उपलक्ष्य में शुरू किए गए इस 100 दिवसीय सघन अभियान का समापन स्वास्थ्य विभाग की बड़ी सफलता के साथ हुआ है। इस अवधि के दौरान स्वास्थ्य कर्मियों ने घर-घर जाकर सर्वे किया, जिसके परिणामस्वरूप जिले में 2,000 नए टीबी (क्षय रोग) रोगियों की पहचान की गई है।

अभियान का उद्देश्य और पृष्ठभूमि

टीबी (तपेदिक) भारत के लिए एक गंभीर स्वास्थ्य चुनौती रही है। भारत सरकार के 'टीबी मुक्त भारत' संकल्प को साकार करने के उद्देश्य से पूर्णिया स्वास्थ्य विभाग ने 100 दिनों का विशेष अभियान शुरू किया था। इस अभियान का मुख्य उद्देश्य टीबी के उन मरीजों को मुख्यधारा में लाना था, जो अब तक जांच और उपचार से वंचित थे।

अभियान की अवधि: 100 दिन (24 मार्च से प्रभावी)।

लक्ष्य: टीबी के सक्रिय मामलों की पहचान करना और उन्हें तत्काल उपचार (DOTS) के दायरे में लाना।

कार्यप्रणाली: आशा कार्यकर्ता, एएनएम और स्वास्थ्य विभाग की टीम ने गांवों और शहरी मोहल्लों में घर-घर जाकर संभावित मरीजों की स्क्रीनिंग की।

100 दिनों की कार्ययोजना: कैसे हासिल हुआ यह लक्ष्य?

पूर्णिया के स्वास्थ्य अधिकारियों ने बताया कि इस सफलता के पीछे एक त्रि-स्तरीय रणनीति काम कर रही थी। केवल मरीजों की पहचान करना ही पर्याप्त नहीं था, बल्कि उन्हें उपचार के साथ जोड़ना भी एक बड़ी चुनौती थी।

1. घर-घर सघन स्क्रीनिंग (Active Case Finding)

स्वास्थ्य विभाग की टीमों ने विशेष रूप से उन क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया जहां जनसंख्या घनत्व अधिक है। खांसी, बुखार और वजन कम होने जैसे लक्षणों वाले व्यक्तियों की सूची तैयार कर उनकी बलगम की जांच करवाई गई।

2. तकनीक और लैब का उपयोग

पूर्णिया के सभी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC) और जिला अस्पताल में जांच की सुविधाओं को बढ़ाया गया। सीबी-नॉट (CB-NAAT) और ट्रूनॉट (TrueNat) मशीनों के माध्यम से मरीजों की सटीक और त्वरित जांच सुनिश्चित की गई, जिससे रिपोर्ट मिलने का समय कम हुआ।

3. जन जागरूकता अभियान

24 मार्च (विश्व यक्ष्मा दिवस) से शुरू होकर अभियान के दौरान नुक्कड़ नाटकों, माइकिंग और स्वास्थ्य शिविरों के माध्यम से टीबी के प्रति फैली भ्रांतियों को दूर किया गया। लोगों को यह समझाया गया कि टीबी का इलाज पूरी तरह संभव है और सरकारी अस्पतालों में यह पूर्णतः नि:शुल्क है।

आंकड़ों की जुबानी: स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट

स्वास्थ्य विभाग द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार, यह पिछले कुछ वर्षों का सबसे सफल टीबी स्क्रीनिंग अभियान रहा है।

चरणअवधिपहचाने गए मरीजों की संख्या
प्रथम चरण (30 दिन)मार्च-अप्रैल550
द्वितीय चरण (30 दिन)अप्रैल-मई750
तृतीय चरण (40 दिन)मई-जून700
कुल100 दिन2,000

मरीजों के लिए 'निक्षय पोषण योजना' और उपचार

पहचाने गए सभी 2,000 मरीजों को 'निक्षय' पोर्टल पर पंजीकृत कर दिया गया है। पूर्णिया के स्वास्थ्य अधिकारियों ने बताया कि टीबी मुक्त भारत अभियान के तहत मरीजों को मिलने वाली सुविधाएं:

निशुल्क दवा: मरीजों को कोर्स पूरा होने तक सभी दवाइयां मुफ्त प्रदान की जा रही हैं।

निक्षय पोषण योजना: उपचार के दौरान मरीजों को पौष्टिक आहार के लिए प्रति माह 500 रुपये की आर्थिक सहायता सीधे उनके बैंक खातों में दी जा रही है।

काउंसलिंग: टीबी के प्रति डर और सामाजिक बहिष्कार (stigma) को दूर करने के लिए विशेष काउंसलिंग सत्र आयोजित किए जा रहे हैं।

चुनौतियां और भविष्य की राह

अभियान के समापन पर स्वास्थ्य विभाग ने उन चुनौतियों को भी रेखांकित किया जिनका सामना फील्ड टीमों ने किया। कई क्षेत्रों में आज भी टीबी को लेकर सामाजिक झिझक है, जिससे लोग जांच कराने से कतराते हैं।

"2,000 मरीजों की पहचान करना एक बड़ी उपलब्धि है, लेकिन हमारी असली जीत तब होगी जब ये सभी मरीज अपना कोर्स पूरा करेंगे। टीबी का बीच में इलाज छोड़ना (Drop-out) सबसे खतरनाक है, जिससे ड्रग-रेसिस्टेंट टीबी होने का खतरा रहता है।" — जिला स्वास्थ्य अधिकारी, पूर्णिया

आगामी रणनीति:

फॉलो-अप टीम: इन 2,000 मरीजों के लिए एक विशेष फॉलो-अप टीम बनाई गई है, जो यह सुनिश्चित करेगी कि कोई भी मरीज बीच में दवा न छोड़े।

टीबी चैंपियंस का सहयोग: उन मरीजों की मदद ली जा रही है जिन्होंने टीबी को मात दी है, ताकि वे दूसरों को प्रेरित कर सकें।

सतत निगरानी: अभियान के बाद भी स्क्रीनिंग की प्रक्रिया सामान्य रूप से जारी रहेगी

पूर्णिया जिले का यह 100 दिवसीय टीबी मुक्त अभियान समाज के लिए एक मिसाल है। यह साबित करता है कि यदि प्रशासनिक इच्छाशक्ति और स्वास्थ्य विभाग की प्रतिबद्धता साथ मिल जाए, तो किसी भी महामारी पर काबू पाया जा सकता है। 2,000 मरीजों की समय पर पहचान न केवल उनके जीवन को सुरक्षित करेगी, बल्कि संक्रमण की चेन को तोड़कर समाज को भी सुरक्षित बनाने में मदद करेगी। पूर्णिया ने बिहार के अन्य जिलों के लिए स्वास्थ्य क्षेत्र में एक मॉडल प्रस्तुत किया है।