असरगंज प्रखंड में कमजोर मानसून से बढ़ा किसानों का संकट: पिछले 15 दिनों से बारिश न होने के कारण धान की रोपाई पर मंडराया सूखा
बिहार में कृषि और किसानों की तकदीर आज भी काफी हद तक मानसून की चाल और बादलों की मेहरबानी पर टिकी हुई है। राज्य के विभिन्न हिस्सों से कृषि जगत को लेकर जो खबरें सामने आ रही हैं, वे चिंताजनक हैं। इसी कड़ी में मुंगेर जिले के असरगंज प्रखंड क्षेत्र से एक अत्यंत गंभीर और परेशान करने वाली खबर सामने आई है। क्षेत्र में मानसून के कमजोर पड़ने के कारण खरीफ फसल की रीढ़ यानी धान की रोपाई (Paddy Cultivation) बुरी तरह प्रभावित हो रही है।
पिछले 15 दिनों से आसमान में बादलों की आवाजाही तो बनी हुई है, लेकिन एक बूंद भी संतोषजनक बारिश नहीं हुई है। नतीजतन, खेतों में नमी गायब हो चुकी है, जमीन फटने लगी है और रोपे गए या रोपाई के इंतजार में पड़े खेत सूखने की कगार पर पहुंच गए हैं। किसान मजबूरी में निजी बोरिंग और महंगे डीजल पंप सेट के सहारे खेतों तक पानी पहुंचाने की जद्दोजहद कर रहे हैं, जिससे खेती की लागत आसमान छू रही है। आइए असरगंज के इस कृषि संकट, किसानों के दर्द, बढ़ते खर्च और प्रशासनिक मोर्चे पर उठ रहे सवालों का विस्तार से विश्लेषण करते हैं।
पृष्ठभूमि: धान की खेती और मानसून का गणित
धान की फसल को उसकी शुरुआती अवस्था में, विशेषकर बिछड़ा गिराने और रोपाई के समय प्रचुर मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है। जब प्रकृति का साथ नहीं मिलता, तो किसानों की सारी मेहनत और उम्मीदें दांव पर लग जाती हैं।
असरगंज में कृषि की स्थिति: असरगंज प्रखंड का एक बड़ा हिस्सा कृषि पर निर्भर है। यहां के किसानों की मुख्य आजीविका धान की फसल पर टिकी होती है। समय पर मानसूनी बारिश न होने से पूरा कृषि चक्र गड़बड़ा गया है।
15 दिनों का सूखा: पिछले डेढ़ हफ्ते से अधिक समय से बारिश न होने के कारण तापमान और उमस बढ़ गई है। तेज धूप और गर्म हवाओं के थपेड़ों ने खेतों की बची-कुची नमी को भी पूरी तरह सोख लिया है, जिससे किसान मायूस हैं।
सूखे की मार: सूख रहे खेत और पिछड़ता रोपाई का कार्य
धान की रोपाई का यह पीक सीजन (Peak Season) माना जाता है, लेकिन पानी के अभाव में किसान चाहकर भी अपने खेतों में उतर नहीं पा रहे हैं।
खेतों में पड़ने लगीं दरारें: बिना पानी के धान के खेत कंक्रीट की तरह सख्त होने लगे हैं और उनमें बड़ी-बड़ी दरारें पड़ गई हैं। जिन किसानों ने किसी तरह पहले रोपाई कर दी थी, उनके पौधे भी अब पानी के अभाव में पीले पड़कर सूखने लगे हैं।
समय का निकलता चक्र: कृषि जानकारों के अनुसार, यदि समय पर धान की रोपाई न हो सके, तो पौधे का विकास रुक जाता है और अंततः पैदावार (Yield) पर इसका बहुत बुरा असर पड़ता है। किसान आसमान की ओर टकटकी लगाए बैठे हैं कि कबइंद्र देवता प्रसन्न हों और बारिश हो।
आसमान छूती लागत: डीजल पंप और बोरिंग का महंगा विकल्प
कुदरत की बेरुखी के बाद जब किसानों ने अपने स्तर पर खेतों को बचाने का विकल्प तलाशा, तो उनकी जेब पर भारी आर्थिक बोझ पड़ गया।
सरकारी सिंचाई के साधनों की नाकामी: ग्रामीण इलाकों में सरकारी नलकूप या तो खराब पड़े हैं या फिर बिजली आपूर्ति की अनियमितता के कारण उनसे कोई खास मदद नहीं मिल पा रही है।
महंगा डीजल और बढ़ता कर्ज: ऐसी स्थिति में किसानों के पास एकमात्र विकल्प निजी बोरिंग या डीजल पंप सेट से खेतों में सिंचाई करने का बचता है। बाजार में डीजल के बढ़े हुए दामों और पंप सेट के किराए के कारण एक बीघा खेत की सिंचाई में हजारों रुपये खर्च हो रहे हैं। गरीब और सीमांत किसानों के लिए यह खर्च उठाना नामुमकिन सा हो गया है, जिससे वे कर्ज के दलदल में फंसते जा रहे हैं।
सरकारी सहायता और अनुदान की मांग
इस विकट परिस्थिति में असरगंज के किसानों ने सरकार और कृषि विभाग से गुहार लगाई है कि उन्हें इस संकट से उबारने के लिए त्वरित कदम उठाए जाएं।
डीजल अनुदान योजना की आस: किसान चाहते हैं कि सरकार द्वारा चलाई जाने वाली डीजल अनुदान योजना का लाभ उन्हें तुरंत और बिना किसी जटिल प्रक्रिया के मिले, ताकि वे कम से कम सिंचाई के खर्च की भरपाई कर सकें।
सूखाग्रस्त क्षेत्र घोषित करने की सुगबुगाहट: यदि आने वाले कुछ दिनों तक बारिश के यही हालात रहे, तो किसानों और स्थानीय बुद्धिजीवियों द्वारा असरगंज प्रखंड को सूखाग्रस्त घोषित करने की मांग भी जोर पकड़ सकती है।
असरगंज प्रखंड क्षेत्र में कमजोर मानसून और पिछले 15 दिनों से बारिश न होने के कारण सूखे की कगार पर पहुंचे खेत अन्नदाता की बेबसी को साफ बयां कर रहे हैं। महंगा डीजल और बोरिंग के सहारे खेती करने की मजबूरी किसानों की कमर तोड़ रही है। यह समय सिर्फ किसानों के अकेले संघर्ष का नहीं है, बल्कि प्रशासनिक तंत्र और कृषि विभाग की संवेदनशीलता की भी परीक्षा का है। यदि समय रहते किसानों को बिजली की सुचारू आपूर्ति, डीजल अनुदान और वैकल्पिक सिंचाई की व्यवस्था नहीं मिली, तो इस बार का कृषि सत्र मुंगेर के किसानों के लिए भारी आर्थिक तबाही लेकर आ सकता है।