विश्व प्रसिद्ध श्रावणी मेले में शिवभक्ति का अनूठा रंग; सिलीगुड़ी से सुल्तानगंज पहुंचे कांवरिया प्रेम कुमार दास ने पहली बार धारण किया भगवान शिव का स्वरूप, डमरू-त्रिशूल और गंगाजल के साथ बाबाधाम के लिए भरी हुंकार
भागलपुर/सुल्तानगंज, कार्यालय संवाददाता: देवभूमि कहे जाने वाले भारतवर्ष में सावन मास का महीना आते ही पूरा देश भगवान भोलेनाथ की भक्ति में सराबोर हो जाता है। मोक्षदायिनी उत्तरवाहिनी गंगा के तट पर बसे पावन नगरी सुल्तानगंज से शुरू होने वाली कांवर यात्रा दुनिया की सबसे अनूठी और ऐतिहासिक पैदल यात्रा मानी जाती है। इस बार के श्रावणी मेले में देश के कोने-कोने से शिवभक्त अपनी अनोखी आस्था के साथ पहुंच रहे हैं। इसी क्रम में पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी से सुल्तानगंज पहुंचे एक विशेष शिवभक्त प्रेम कुमार दास इन दिनों पूरे मेला क्षेत्र में आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। प्रेम कुमार दास ने अपनी पहली बार की बाबाधाम यात्रा को बेहद खास बनाते हुए भगवान शिव का जीवंत वेश धारण किया है। हाथ में पारंपरिक डमरू, त्रिशूल और पीठ पर पवित्र गंगाजल का कांवड़ उठाए जब वे आगे बढ़ रहे हैं, तो हर कोई उनकी भक्ति भाव को देखकर मंत्रमुग्ध हो रहा है।
सिलीगुड़ी से सुल्तानगंज तक की आस्था भरी लंबी दूरी
पश्चिम बंगाल के उत्तर में स्थित प्रमुख शहर सिलीगुड़ी से झारखंड के देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम तक की यह कांवर यात्रा अपने आप में लंबी और कठिन है, लेकिन शिव के प्रति अटूट प्रेम ने इस दूरी को आसान बना दिया है:
पहली बार की यात्रा का रोमांच: मीडिया से बातचीत करते हुए प्रेम कुमार दास ने बताया कि उनके जीवन में यह पहला अवसर है जब वे बाबाधाम की इस पावन यात्रा पर निकले हैं। पहली बार कांवर उठाने को लेकर उनके मन में जो उत्साह और ऊर्जा थी, उसी ने उन्हें भगवान शिव का रूप धारण करने की प्रेरणा दी।
भक्ति में डूबा परिवार और मित्र मंडल: सिलीगुड़ी से उनके साथ आए अन्य कांवरियों ने भी बताया कि प्रेम कुमार दास पिछले कई हफ्तों से इस यात्रा की तैयारी कर रहे थे। भगवान शिव के प्रति उनकी निष्ठा ऐसी है कि उन्होंने रास्ते भर शिव महिमा का गुणगान करने का संकल्प लिया है।
भगवान शिव का रूप धारण कर बने आकर्षण का केंद्र
सुल्तानगंज के अजगैबीनाथ धाम से जल उठाने के बाद जब प्रेम कुमार दास ने शिव स्वरूप में कदम बढ़ाए, तो देखने वालों का तांता लग गया:
भव्य श्रृंगार और वेशभूषा: उन्होंने भगवान शिव की तरह जटाएं, गले में रुद्राक्ष की मालाएं, भस्म रमाने की मुद्रा और पारंपरिक अस्त्र-शस्त्र रूपी प्रतीक धारण किए हुए हैं। उनके दाहिने हाथ में डमरू और त्रिशूल तथा बाएं हाथ में बेलपत्र व पूजन सामग्री सुशोभित हो रही है।
पीठ पर गंगाजल का भार और चेहरे पर अलौकिक संतोष: पीठ पर पवित्र उत्तरवाहिनी गंगा का जल लादे हुए जब वे "बोल बम" के जयकारे लगाते हैं, तो पूरा वातावरण शिवमय हो जाता है। उनके चेहरे पर लंबी पैदल यात्रा की कोई थकान नजर नहीं आती, बल्कि एक अलग ही प्रकार का आध्यात्मिक संतोष और आनंद झलकता है।
"इस यात्रा का ले रहा हूं अलौकिक आनंद" - प्रेम कुमार दास
यात्रा के दौरान अपने अनुभवों को साझा करते हुए शिवभक्त प्रेम कुमार दास ने भावुक और ऊर्जावान लहजे में कहा:
"यह मेरे जीवन का सबसे सौभाग्यशाली क्षण है। जब मैंने पहली बार बाबाधाम जाने का निर्णय लिया, तो मन में विचार आया कि क्यों न अपने आराध्य देवों के देव महादेव के स्वरूप में ही उनकी यात्रा की जाए। सुल्तानगंज से गंगाजल उठाने के बाद से जो आनंद मुझे मिल रहा है, उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। रास्ते में हर कोई 'बम-बम भोले' कहकर मेरा स्वागत कर रहा है, जिससे मेरी सारी थकान छूमंतर हो जाती है।"
उन्होंने आगे कहा कि भगवान शिव की कृपा से ही वे इतनी लंबी यात्रा तय कर पा रहे हैं और उन्हें पूरा विश्वास है कि बाबा बैद्यनाथ उनकी इस पहली यात्रा को अवश्य स्वीकार करेंगे।
श्रावणी मेले में उमड़ती श्रद्धा और कांवरियों का उत्साह
प्रेम कुमार दास जैसी अनूठी और समर्पित यात्राएं यह दर्शाती हैं कि श्रावणी मेला केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति, कला और अटूट आस्था का एक महाकुंभ है:
राहगीरों और स्थानीय लोगों का अभिवादन: सुल्तानगंज से लेकर देवघर जाने वाले कांवर मार्ग पर जहां से भी प्रेम कुमार दास गुजर रहे हैं, स्थानीय ग्रामीण और अन्य कांवरिया हाथ जोड़कर उनका अभिनंदन कर रहे हैं। कई लोग उनके साथ सेल्फी लेने और उनका आशीर्वाद पाने के लिए उत्सुक दिखे।
मेला प्रशासन की व्यवस्थाएं: इस बार श्रावणी मेले में लाखों की संख्या में आ रहे श्रद्धालुओं की सुरक्षा और सुविधाओं को ध्यान में रखते हुए प्रशासन भी पूरी तरह मुस्तैद है। जगह-जगह स्वास्थ्य शिविर, सुरक्षा बल और सहायता केंद्र बनाए गए हैं, ताकि प्रेम कुमार दास जैसे दूर-दराज से आने वाले शिवभक्तों को किसी प्रकार की कठिनाई का सामना न करना पड़े।
सिलीगुड़ी से सुल्तानगंज पहुंचकर पहली बार बाबाधाम के लिए यात्रा कर रहे प्रेम कुमार दास द्वारा भगवान शिव का वेश धारण करना और डमरू-त्रिशूल के साथ आगे बढ़ना इस बात का जीवंत प्रमाण है कि सच्ची श्रद्धा में कितनी बड़ी शक्ति होती है। उनकी यह यात्रा न केवल उनके लिए अविस्मरणीय है, बल्कि श्रावणी मेले में शामिल होने वाले लाखों अन्य शिवभक्तों के लिए भी प्रेरणा और ऊर्जा का एक बड़ा स्त्रोत बन गई है।