बायसी में नदियों के जलस्तर में गिरावट के साथ बढ़ा कटाव का खतरा: महानंदा, कनकई और परमान के घटते पानी से ग्रामीण चिंतित, प्रशासन से सुरक्षात्मक उपायों की मांग
पूर्णिया जिले के बायसी अनुमंडल क्षेत्र में बहने वाली प्रमुख नदियां—महानंदा, कनकई और परमान—के जलस्तर में पिछले कुछ दिनों से लगातार कमी दर्ज की जा रही है। आमतौर पर बाढ़ के पानी के उतरने को राहत के रूप में देखा जाता है, लेकिन बायसी क्षेत्र के लिए यह स्थिति नई आफत लेकर आई है। जलस्तर घटने के साथ ही कई ग्रामीण इलाकों में नदी का भीषण कटाव (River Erosion) शुरू हो गया है, जिससे तटीय इलाकों में बसे लोगों की नींद उड़ गई है। उपजाऊ कृषि योग्य भूमि और कई आशियाने नदी की तेज धारा में समाने की कगार पर पहुंच गए हैं। आइए इस विस्तृत रिपोर्ट के माध्यम से जानते हैं बायसी क्षेत्र में उत्पन्न इस नए संकट, ग्रामीणों की समस्याओं और प्रशासनिक तैयारियों के बारे में।
महानंदा, कनकई और परमान नदियों के जलस्तर में लगातार गिरावट
नेपाल और उत्तर बंगाल के जलग्रहण क्षेत्रों में बारिश थमने के बाद अब बायसी क्षेत्र से गुजरने वाली इन तीनों प्रमुख नदियों के जलस्तर में काफी कमी आई है।
खतरे के निशान से नीचे आया पानी: पिछले कुछ हफ्तों से उफान पर रहने वाली महानंदा, कनकई और परमान नदियों का पानी अब धीरे-धीरे अपने सामान्य स्तर की ओर लौट रहा है। जलस्तर घटने से एक तरफ जहां निचले इलाकों में बाढ़ का खतरा टला है, वहीं दूसरी तरफ जलवाव के बदलते स्वरूप ने तटीय इलाकों के लिए एक नई चुनौती खड़ी कर दी है।
तेज बहाव और पानी का खिंचाव: जानकारों का मानना है कि जब नदियां उफनती हैं तो वे अपने साथ भारी मात्रा में मिट्टी और सिल्ट बहाकर लाती हैं। लेकिन जब जलस्तर अचानक घटता है, तो पानी का दबाव और किनारों की ओर खिंचाव तटों को कमजोर कर देता है, जिससे मिट्टी धंसने लगती है।
कटाव की चपेट में कई ग्रामीण इलाके: लोगों पर मंडराया बेघर होने का खतरा
बायसी अनुमंडल के कई पंचायतें और गांव इन दिनों नदियों के हो रहे इस भयानक कटाव की सीधी जद में आ गए हैं।
उपजाऊ जमीनों का कटाव: महानंदा और कनकई नदियों के किनारे बसे गांवों में जलस्तर कम होने के साथ ही उपजाऊ खेत और बगान तेजी से नदी में विलीन हो रहे हैं। किसानों की महीनों की मेहनत और पूंजी कुछ ही पलों में नदी की भेंट चढ़ रही है।
आशियानों पर मंडराता संकट: कई जगहों पर तो स्थिति इतनी भयावह हो गई है कि नदी का किनारा ग्रामीणों के घरों के बिल्कुल नजदीक आ गया है। लोग अपने आशियानों को बचाने के लिए खुद ही अपने घरों को तोड़ने और सुरक्षित स्थानों पर सामान शिफ्ट करने को मजबूर हो गए हैं।
ग्रामीणों की चिंता और प्रशासनिक सुस्ती पर सवाल
कटाव की इस गंभीर समस्या से जूझ रहे स्थानीय ग्रामीणों में प्रशासन के प्रति गहरी नाराजगी और चिंता देखी जा रही है।
राहत के बजाय बढ़ी मुश्किलें: ग्रामीणों का कहना है कि बाढ़ के समय तो किसी तरह जान बचा ली जाती है, लेकिन पानी घटने के बाद होने वाला कटाव उससे भी ज्यादा खतरनाक साबित होता है। हर साल इसी तरह उनकी जमीनें नदी में कट जाती हैं, लेकिन स्थायी समाधान नहीं मिल पाता है।
स्थाई समाधान की मांग: क्षेत्र के किसानों और बुद्धिजीवियों ने मांग की है कि जल संसाधन विभाग द्वारा समय रहते संवेदनशील बिंदुओं पर नायलॉन क्रेटिंग, बांस-बल्ली की पाइलिंग और बोल्डर पिचिंग जैसे एंटी-इरोजन (कटाव रोधी) कार्य कराए जाएं, ताकि बहुमूल्य जमीनों और बस्तियों को बचाया जा सके।
प्रशासनिक चौकसी और विभागीय पहल की आवश्यकता
मामले की गंभीरता को देखते हुए स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक अधिकारियों से त्वरित कार्रवाई की उम्मीद की जा रही है।
क्षति का आकलन: स्थानीय जनप्रतिनिधियों और अंचल कार्यालय के अधिकारियों द्वारा कटाव प्रभावित क्षेत्रों का दौरा कर नुकसान का जायजा लिया जा रहा है।
आपातकालीन कदम: जल संसाधन विभाग को निर्देश दिया गया है कि वे प्रभावित और अतिसंवेदनशील जगहों पर तुरंत बालू की बोरियां (Sandbags) और अन्य सुरक्षात्मक सामग्रियां भेजकर कटाव को रोकने का प्रयास करें, ताकि स्थिति को और बिगड़ने से रोका जा सके।
बायसी में महानंदा, कनकई और परमान नदियों के जलस्तर में कमी भले ही राहत की खबर लग रही हो, लेकिन इसके साथ शुरू हुआ भीषण कटाव ग्रामीणों के लिए एक बड़ा संकट बन गया है। यदि समय रहते प्रभावी और स्थायी कटाव रोधी उपाय नहीं किए गए, तो सैकड़ों परिवार बेघर और भूमिहीन होने के कगार पर पहुंच जाएंगे।