तैयारियों का महाकुंभ और सुल्तानगंज से देवघर तक की जमीनी हकीकत
सुल्तानगंज/देवघर: विश्व प्रसिद्ध श्रावणी मेला 2026 की गूंज अब धर्मनगरी सुल्तानगंज से लेकर बाबा बैद्यनाथ की नगरी देवघर तक सुनाई देने लगी है। हालांकि, इस वर्ष मेले की शुरुआत 30 जुलाई 2026 से होने जा रही है, लेकिन तैयारियों को लेकर प्रशासन और स्थानीय स्तर पर गहमागहमी अपने चरम पर है। मेले की भव्यता और लाखों कांवरियों के आगमन को देखते हुए बिहार और झारखंड सरकार ने मिलकर एक अभूतपूर्व कार्ययोजना तैयार की है, जिसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित भीड़ प्रबंधन से लेकर 2650 बेड की टेंट सिटी तक का समावेश है।
तैयारियों की हकीकत: समय बनाम चुनौती
प्रशासन ने मेले की तैयारी के लिए पहले 15 से 20 जुलाई तक की डेडलाइन तय की थी। अब जबकि मेले के आरंभ में कुछ ही दिन शेष हैं, सुल्तानगंज और मुंगेर जैसे प्रमुख पड़ावों पर काम युद्धस्तर पर जारी है।
मौसम की मार: लगातार हो रही बारिश ने तैयारियों की गति को प्रभावित किया है। कच्चे कांवरिया पथ पर मिट्टी और बालू डालने का कार्य, जो कांवरियों की सुगम यात्रा के लिए अत्यंत आवश्यक है, बारिश के कारण कई बार बाधित हुआ है।
मरम्मत की दरकार: नमामि गंगे घाट पर गाद और मिट्टी हटाने के दौरान जेसीबी के उपयोग से कई सीढ़ियां क्षतिग्रस्त हो गई हैं। स्थानीय लोगों और तीर्थयात्रियों के लिए यह एक बड़ी चिंता का विषय है, क्योंकि यदि इन सीढ़ियों की मरम्मत समय रहते नहीं हुई, तो कांवरियों के चोटिल होने का खतरा बना रहेगा।
पेयजल की समस्या: सुल्तानगंज मंदिर परिसर में पेयजल की उपलब्धता को लेकर अभी भी संशय के बादल मंडरा रहे हैं। यद्यपि प्रशासन ने जगह-जगह वाटर कूलर और आरओ प्लांट लगाने का दावा किया है, लेकिन धरातल पर काम अभी भी अंतिम रूप लेने की प्रक्रिया में है।
क्या है प्रशासन का पक्ष?
प्रशासनिक अधिकारियों का दावा है कि मौसम की बाधाओं के बावजूद वे निर्धारित समय सीमा के भीतर सभी व्यवस्थाओं को दुरुस्त करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। रेलवे स्टेशन पर 12 करोड़ की लागत से बन रहा आधुनिक फुट ओवरब्रिज अब अंतिम चरण में है, और इसे श्रद्धालुओं के लिए जल्द ही खोल दिया जाएगा। इसके अलावा:
स्वच्छता का विशेष ध्यान: मेले को सात जोन में बांटा गया है और 750 सफाईकर्मियों की तैनाती की जा रही है।
तकनीकी सुदृढ़ीकरण: कांवरियों की सुरक्षा के लिए पहली बार AI-आधारित भीड़ नियंत्रण और सीसीटीवी निगरानी को प्राथमिकता दी गई है।
आवास की नई व्यवस्था: कांवरियों के लिए भागलपुर, बांका और मुंगेर में 2650 बेड की टेंट सिटी बनाई जा रही है, जहां उन्हें स्वच्छ पेयजल, बिजली और चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध होंगी।
कांवरियों की उम्मीदें और जमीनी चिंताएं
हर साल लाखों की संख्या में सुल्तानगंज से गंगाजल भरकर देवघर जाने वाले कांवरियों की संख्या बढ़ती जा रही है। इस वर्ष मेले को 'शिवमय' बनाने के प्रयास तो किए जा रहे हैं, परंतु अधूरी तैयारियों के बीच कांवरियों के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या उन्हें एक सुगम और सुरक्षित यात्रा मिल पाएगी?
स्थान-स्थान पर बिजली के खंभों पर भोले बाबा की आकृति उकेरना और रंग-रोगन करना तो उत्साहजनक है, लेकिन मूलभूत सुविधाएं जैसे घाटों की सुरक्षा, साफ-सफाई और निर्बाध पेयजल आपूर्ति ही कांवरियों के अनुभव को यादगार बनाती है। प्रशासन के लिए अगले 12 दिन एक 'अग्निपरीक्षा' के समान हैं, जिसमें उन्हें न केवल अपनी घोषणाओं को धरातल पर उतारना होगा, बल्कि बारिश जैसे अनियंत्रित कारकों से भी लड़ना होगा।
यद्यपि 30 जुलाई से शुरू होने वाले इस 65 दिवसीय राजकीय मेले के लिए सरकारी तंत्र पूरी तरह सक्रिय है, फिर भी अंतिम समय के कार्यों की गति में तेजी लाना अनिवार्य है। यदि समय रहते क्षतिग्रस्त घाटों की मरम्मत और पेयजल की सुदृढ़ व्यवस्था सुनिश्चित कर ली जाती है, तो कांवरियों की यह कठिन यात्रा निश्चित रूप से भक्ति और सुविधाओं के समन्वय के साथ संपन्न होगी।