बंगाल के कांवरियों का अद्भुत संकल्प, 70 किलो की कांवड़ लेकर अजगैवीनाथ धाम से बाबाधाम की पदयात्रा
सुल्तानगंज (भागलपुर): श्रावणी मेला 2026 के आगमन के साथ ही धर्मनगरी सुल्तानगंज में भक्ति का ऐसा अनूठा संगम देखने को मिल रहा है जो आस्था की नई परिभाषा लिख रहा है। उत्तरवाहिनी गंगा के तट पर स्थित अजगैवीनाथ धाम की पावन धरती पर शनिवार को पश्चिम बंगाल के हावड़ा और हुगली से आए युवा कांवरियों के एक जत्थे ने सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। आठ सदस्यों के इस समूह ने 70 किलोग्राम वजन वाली विशाल कांवड़ के साथ अपनी पदयात्रा का संकल्प लिया है, जिसे लेकर वे देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम के लिए प्रस्थान कर रहे हैं।
भक्ति का महासंकल्प: 70 किलो का भार और अटूट विश्वास
सावन की शुरुआत के साथ ही गंगा घाटों पर शिवभक्तों की भीड़ उमड़ रही है, लेकिन हावड़ा और हुगली के इन युवाओं का जत्था चर्चा का विषय बना हुआ है। आठ सदस्यीय इस समूह में दो महिलाएं भी शामिल हैं, जो पुरुष कांवरियों के साथ कदम-से-कदम मिलाकर बाबा की भक्ति में लीन हैं।
समूह के सदस्यों ने बताया कि यह 70 किलोग्राम की कांवड़ केवल वजन नहीं, बल्कि उनकी मन्नतों और बाबा भोलेनाथ के प्रति उनके समर्पण का प्रतीक है। इतनी भारी कांवड़ को कंधे पर लेकर लगभग 105 किलोमीटर की कठिन पैदल यात्रा तय करना शारीरिक क्षमता से अधिक मानसिक दृढ़ता का प्रमाण है। जत्थे के नेतृत्वकर्ता ने कहा, "बाबा की कृपा हो तो 70 किलो का भार भी फूल के समान महसूस होता है।"
समूह की एकता और प्रेरणा
इस जत्थे की सबसे बड़ी विशेषता इसका अनुशासन है। आठ सदस्यों का यह समूह एक लय में 'बोल बम' के जयकारे लगाता हुआ आगे बढ़ रहा है। इसमें शामिल दोनों महिला कांवरियों का हौसला देखते ही बनता है। उन्होंने बताया कि वे पिछले कई वर्षों से इस यात्रा का हिस्सा बन रही हैं, लेकिन इस बार का अनुभव और संकल्प कहीं अधिक गहरा है।
सुल्तानगंज के स्थानीय लोगों और अन्य कांवरियों के लिए यह समूह प्रेरणा का स्रोत बन गया है। जब ये कांवरिये सुल्तानगंज की सड़कों से गुजरते हैं, तो राहगीर हाथ जोड़कर उनका अभिवादन करते हैं और उनकी यात्रा सफल होने की कामना करते हैं।
व्यवस्था और सुरक्षा: प्रशासन का सहयोग
श्रद्धालुओं की इस बढ़ती संख्या और विशिष्ट जत्थों को देखते हुए भागलपुर जिला प्रशासन ने कमर कस ली है। जिलाधिकारी ने स्वयं पूरे क्षेत्र की निगरानी का जिम्मा संभाला है।
स्वास्थ्य सुरक्षा: कांवरियों की इस लंबी यात्रा के दौरान उन्हें चिकित्सा सहायता मिल सके, इसके लिए मुख्य कांवरिया पथ पर 14 स्थायी चिकित्सा शिविर स्थापित किए गए हैं।
राहत और ठहरने की व्यवस्था: हावड़ा-हुगली के इस जत्थे जैसे दूरस्थ कांवरियों के लिए प्रशासन ने 'टेंट सिटी' में विशेष इंतजाम किए हैं, जहां उन्हें 24 घंटे बिजली, पेयजल और सुरक्षित विश्राम की सुविधा मिल रही है।
निगरानी: भीड़ को नियंत्रित करने के लिए इस वर्ष पहली बार एआई (AI) आधारित सीसीटीवी निगरानी प्रणाली का उपयोग किया जा रहा है, ताकि कांवरियों को सुरक्षित माहौल दिया जा सके।
सामाजिक समरसता का प्रतीक
यह यात्रा केवल धर्म तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बंगाल और बिहार की सांस्कृतिक एकता का भी प्रतीक है। सुल्तानगंज के स्थानीय निवासियों ने बताया कि बंगाल से आने वाले कांवरियों के जत्थे हर साल यहां की अर्थव्यवस्था और आध्यात्मिक माहौल में चार चांद लगा देते हैं। हावड़ा और हुगली के इन युवाओं के जत्थे ने यह सिद्ध कर दिया है कि बाबा की भक्ति में न तो उम्र की बाधा है और न ही लिंग का भेद।
आगामी यात्रा की चुनौतियां
70 किलो का वजन लेकर चलने वाले इन कांवरियों के लिए आगामी यात्रा का मार्ग काफी चुनौतीपूर्ण हो सकता है। हालांकि, सुल्तानगंज से देवघर तक का पूरा मार्ग 'बोल बम' के नारों से गुंजायमान है। प्रशासन ने कांवरिया पथ पर जगह-जगह बालू बिछवाने का कार्य पूरा कर लिया है, ताकि नंगे पैर चलने वाले श्रद्धालुओं को परेशानी न हो।
भक्ति की अटूट डगर
हावड़ा और हुगली से आए इन आठ युवाओं का संकल्प लाखों श्रद्धालुओं के लिए एक मिसाल है। यह यात्रा न केवल शारीरिक सहनशीलता की परीक्षा है, बल्कि एक ऐसा मार्ग है जो मनुष्य को ईश्वर से जोड़ता है। सुल्तानगंज के गंगा घाट पर जल भरकर जब ये कांवरिये आगे बढ़ते हैं, तो उनके चेहरे पर थकान नहीं, बल्कि बाबा के दर्शन की एक अनूठी चमक दिखाई देती है।
उनकी यह यात्रा 30 जुलाई से औपचारिक रूप से शुरू होने वाले श्रावणी मेला 2026 की भव्यता और भक्ति के उस ज्वार को दर्शाती है, जिसे देखने के लिए पूरा देश सुल्तानगंज की ओर निहार रहा है। बाबा बैद्यनाथ इनके संकल्प को पूर्ण करें और उनकी यात्रा निर्विघ्न संपन्न हो, यही कामना पूरा सुल्तानगंज कर रहा है।