हजियापुर मुसहर टोली का पांच साल का दर्द — बुनियादी सुविधाओं के लिए तरसते दलित परिवार
लोकतंत्र में हर नागरिक को सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार है, लेकिन गोपालगंज के हजियापुर स्थित मुसहर टोली के निवासियों के लिए यह अधिकार पिछले पांच वर्षों से एक सपने जैसा है। विकास की मुख्यधारा से कोसों दूर, यह बस्ती आज भी उन बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रही है जो एक सामान्य नागरिक के लिए जीवन की न्यूनतम आवश्यकताएं हैं। शुद्ध पेयजल से लेकर सिर पर पक्की छत तक, इनकी जिंदगी अभावों के बीच सिमटी हुई है।
विकास के वादे और यथार्थ का संघर्ष
हजियापुर मुसहर टोली के निवासियों का कहना है कि पिछले पांच वर्षों में न जाने कितने जनप्रतिनिधि आए और गए, लेकिन उनकी समस्याओं का समाधान आज भी शून्य है। बस्ती की बदहाली को निम्न बिंदुओं में समझा जा सकता है:
आवास का संकट: प्रधानमंत्री आवास योजना जैसी महत्वाकांक्षी योजना का लाभ यहां के लोगों को नहीं मिल पाया है। कारण? जमीन का मालिकाना हक (स्वामित्व) न होना। मुसहर समुदाय के पास अपनी जमीन के कागज न होने के कारण वे सरकारी रिकॉर्ड में 'अपात्र' या 'अवैध कब्जाधारी' की श्रेणी में आते हैं।
पेयजल की समस्या: भीषण गर्मी में भी यहां के लोग दूषित या दूर-दराज के चापानल से पानी लाने को मजबूर हैं। सरकारी हैंडपंप या तो खराब पड़े हैं या उनका जल स्तर इतना नीचे गिर चुका है कि वहां पानी नहीं आता।
बिजली और प्रकाश: बस्ती में बिजली की तारें तो पहुंच गई हैं, लेकिन ट्रांसफार्मर और वोल्टेज की समस्या के कारण अक्सर अंधेरे में रहना पड़ता है। रात के समय पूरी बस्ती में सन्नाटा और अंधेरा रहता है, जो सुरक्षा के लिहाज से भी खतरनाक है।
'जमीन का स्वामित्व' बनाम 'सरकारी योजनाएं'
हजियापुर मुसहर टोली की सबसे बड़ी बाधा उनकी 'भूमिहीनता' है। प्रशासन का तर्क है कि सरकारी योजनाओं के तहत पक्का मकान बनाने के लिए रैयती जमीन (अपनी जमीन) का प्रमाण होना आवश्यक है।
एक अंतहीन चक्र: बस्तीवासी कहते हैं कि वे दशकों से यहां रह रहे हैं, लेकिन उन्हें आज तक 'बासगीत पर्चा' (जमीन का अधिकार पत्र) नहीं दिया गया है। जब तक पर्चा नहीं मिलता, वे प्रधानमंत्री आवास योजना के लिए आवेदन नहीं कर सकते।
अधिकार की लड़ाई: पांच वर्षों से वे अंचल कार्यालय से लेकर जिला मुख्यालय तक चक्कर काट रहे हैं, लेकिन उनकी फाइलें लालफीताशाही के गलियारों में खो गई हैं।
सामाजिक और मानवीय दृष्टिकोण
मुसहर समुदाय, जो पहले से ही सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़ा है, हजियापुर में नारकीय जीवन जीने को मजबूर है।
स्वास्थ्य पर असर: दूषित पानी के सेवन से बच्चों में आए दिन डायरिया, त्वचा रोग और अन्य बीमारियां होती रहती हैं। स्वच्छता के नाम पर यहां कोई नाली या शौचालय की व्यवस्था नहीं है।
बच्चों की शिक्षा: बस्ती के बच्चों के लिए पढ़ाई का माहौल बनाना मुश्किल है। न बिजली है, न सुरक्षित घर, ऐसे में शिक्षा का अधिकार केवल कागजों तक सीमित रह जाता है।
मानसिक प्रताड़ना: हर चुनाव में वोट मांगने वालों के खोखले वादे सुन-सुनकर अब लोगों का लोकतंत्र पर से भरोसा कम होने लगा है।
प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की भूमिका
सवाल यह है कि क्या पांच साल का समय एक छोटी बस्ती को जमीन का पर्चा देने के लिए पर्याप्त नहीं है? स्थानीय प्रशासन का कहना है कि मामले की जांच चल रही है, जबकि बस्तीवासी इसे प्रशासनिक उदासीनता मानते हैं।
जनप्रतिनिधियों का रवैया: स्थानीय नेताओं की चुप्पी ने बस्तीवासियों के आक्रोश को और बढ़ा दिया है। चुनावी रैलियों में बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं, लेकिन जीत के बाद हजियापुर मुसहर टोली के रास्ते कोई झांकने नहीं आता।
हजियापुर मुसहर टोली के निवासियों की मांग अनुचित नहीं है। वे केवल इतना चाहते हैं कि उनके पास रहने के लिए एक सुरक्षित छत हो, पीने के लिए साफ पानी हो और बिजली हो।
यह स्थिति बिहार सरकार के उस दावे पर सवाल खड़ा करती है जिसमें 'हर घर तक विकास' पहुंचाने की बात की जाती है। यदि प्रशासन ईमानदारी से प्रयास करे, तो बासगीत पर्चा वितरण अभियान के माध्यम से इन्हें जमीन का मालिक बनाकर आवास योजना का लाभ तुरंत दिया जा सकता है।
पांच साल का संघर्ष एक लंबी अवधि है। अब समय आ गया है कि जिला प्रशासन को संवेदनशीलता दिखाते हुए इस बस्ती की सुध लेनी चाहिए। इनके लिए केवल सहानुभूति नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई की आवश्यकता है, ताकि वे भी मुख्यधारा के समाज के साथ कदम मिलाकर चल सकें।