पूर्णिया के नशा मुक्ति केंद्र में युवक की संदिग्ध मौत: परिजनों का हंगामा, प्रबंधन पर लापरवाही के गंभीर आरोप
पूर्णिया। पूर्णिया के मधुबनी थाना क्षेत्र स्थित एक निजी नशा मुक्ति केंद्र में भर्ती एक युवक की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। घटना की सूचना मिलते ही मृतक के परिजनों में कोहराम मच गया। परिजनों ने केंद्र संचालकों पर इलाज में लापरवाही और युवक के साथ मारपीट करने का गंभीर आरोप लगाया है। इस घटना के बाद स्थानीय स्तर पर नशा मुक्ति केंद्रों की कार्यप्रणाली और उनकी सुरक्षा व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े हो गए हैं।
क्या है पूरा मामला?
मृतक युवक को कुछ दिन पूर्व ही नशे की लत से छुटकारा पाने के लिए इस केंद्र में भर्ती कराया गया था। परिजनों का आरोप है कि केंद्र में भर्ती करने के बाद से ही युवक के साथ ठीक से व्यवहार नहीं किया जा रहा था। शुक्रवार देर रात केंद्र के कर्मचारियों ने परिजनों को फोन कर सूचना दी कि युवक की तबीयत अचानक बिगड़ गई है और उसे अस्पताल ले जाया जा रहा है। जब परिजन अस्पताल पहुँचे, तो उन्हें युवक का शव मिला।
परिजनों का दावा है कि युवक के शरीर पर चोट के गहरे निशान थे, जो केंद्र के संचालकों द्वारा दी गई प्रताड़ना की ओर इशारा करते हैं। वहीं, केंद्र प्रबंधन ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे 'प्राकृतिक मौत' या 'अचानक आई बीमारी' करार दिया है।
परिजनों का आक्रोश और अस्पताल परिसर में हंगामा
युवक की मौत की खबर मिलते ही परिजनों और स्थानीय लोगों ने अस्पताल परिसर में जमकर हंगामा किया। आक्रोशित लोगों का कहना था कि नशा मुक्ति केंद्र की आड़ में यहाँ युवाओं का शोषण किया जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र में कोई भी चिकित्सक या प्रशिक्षित नर्स मौजूद नहीं रहती है। अधिकांश नशा मुक्ति केंद्र बिना किसी सरकारी पंजीकरण और मानकों के खुलेआम संचालित किए जा रहे हैं।
परिजनों ने मधुबनी थाना पुलिस से मांग की है कि केंद्र के संचालकों के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज किया जाए और तुरंत उनकी गिरफ्तारी सुनिश्चित हो।
नशा मुक्ति केंद्रों की कार्यप्रणाली पर सवाल
पूर्णिया शहर में पिछले कुछ वर्षों में दर्जनों की संख्या में निजी नशा मुक्ति केंद्र खुले हैं। अधिकांश केंद्र एक-दो कमरों के किराए के मकानों में चलाए जा रहे हैं, जहाँ सुरक्षा की दृष्टि से भी कोई पुख्ता इंतजाम नहीं है।
इस घटना के बाद शहर के बुद्धिजीवियों का कहना है:
मानकों का अभाव: क्या इन केंद्रों के पास स्वास्थ्य विभाग की वैध मान्यता है?
प्रशिक्षित स्टाफ का न होना: क्या यहाँ तैनात कर्मचारी नशा छोड़ने वाले मरीजों को संभालने में सक्षम हैं?
निगरानी का अभाव: क्या प्रशासन समय-समय पर इन केंद्रों का निरीक्षण करता है?
पुलिस की कार्रवाई और जांच
मधुबनी थाना अध्यक्ष ने बताया कि मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस मौके पर पहुँची है। शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया है। पुलिस ने कहा, "पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही मौत के सही कारणों का पता चल पाएगा। हमने केंद्र के संचालकों से पूछताछ के लिए उन्हें तलब किया है। यदि लापरवाही पाई जाती है, तो कानूनी कार्रवाई निश्चित है।"
पुलिस की एक टीम ने घटनास्थल का मुआयना भी किया है और केंद्र में भर्ती अन्य मरीजों के बयान भी लिए जा रहे हैं।
समाज के लिए चेतावनी
यह घटना उन तमाम परिवारों के लिए एक बड़ा सबक है जो अपने बच्चों को नशे से दूर रखने के लिए निजी केंद्रों पर भरोसा करते हैं। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि नशा मुक्ति केंद्र चुनने से पहले:
संस्थान का सरकारी पंजीकरण अवश्य देखें।
केंद्र में तैनात डॉक्टर्स और काउंसलर्स की योग्यता की जांच करें।
वहां की सुविधाओं और सुरक्षा व्यवस्था का व्यक्तिगत रूप से निरीक्षण करें।
यदि संभव हो, तो सरकारी पुनर्वास केंद्रों को ही प्राथमिकता दें।
प्रशासन का रुख
इस घटना के बाद अब जिला प्रशासन भी हरकत में आता दिख रहा है। जिलाधिकारी ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई भी नशा मुक्ति केंद्र बिना मानकों के चल रहा है, तो उसके विरुद्ध अभियान चलाकर सख्त से सख्त कार्रवाई की जाएगी। स्वास्थ्य विभाग की एक विशेष टीम गठित की जाएगी जो शहर के सभी निजी नशा मुक्ति केंद्रों की जांच करेगी।
युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़
नशा मुक्ति केंद्र, जो उम्मीद की किरण होने चाहिए थे, वे यदि काल कोठरी बन जाएं, तो यह समाज के लिए बहुत दुखद है। इस युवक के असमय चले जाने से एक परिवार का इकलौता चिराग बुझ गया है। न्याय की गुहार लगा रहे परिजनों की आवाज प्रशासन तक पहुँचनी चाहिए, ताकि भविष्य में किसी अन्य परिवार को इस पीड़ा से न गुजरना पड़े।
पूर्णिया का यह मामला कोई पहला नहीं है, लेकिन इसने नशा मुक्ति केंद्रों की सुरक्षा व्यवस्था को आईना दिखा दिया है। जब तक प्रशासन कड़ाई से इन केंद्रों का ऑडिट नहीं करता और नियमों का पालन सुनिश्चित नहीं कराता, तब तक ऐसे हादसों की पुनरावृत्ति को रोका नहीं जा सकता। अब देखना यह है कि पुलिस की जांच किस दिशा में जाती है और क्या दोषी संचालकों को सजा मिल पाती है।