दूसरी पत्नी भी फैमिली पेंशन की हकदार, पटना हाईकोर्ट का बड़ा फैसला; 17 साल से भटक रही कुसुम देवी को मिला न्याय
पटना। पटना हाईकोर्ट ने पारिवारिक पेंशन से जुड़े एक अहम मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए मृत सरकारी कर्मचारी की दूसरी पत्नी को राहत दी है। अदालत के आदेश के बाद करीब 17 वर्षों से अपने हक के लिए सरकारी दफ्तरों और अदालत का चक्कर लगा रही कुसुम देवी को न्याय मिलने का रास्ता साफ हो गया है। न्यायमूर्ति पूर्णेंदु सिंह की एकलपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए विभागीय स्तर पर उनकी पेंशन की दावेदारी खारिज किए जाने के आदेश को रद्द कर दिया और राज्य सरकार को उनके पेंशन संबंधी लाभ पर कानून के अनुसार कार्रवाई करने का निर्देश दिया।
मामला जल संसाधन विभाग में ग्रेड-III कर्मचारी रहे जय लाल साह की मृत्यु के बाद पारिवारिक पेंशन को लेकर खड़ा हुआ था। कुसुम देवी ने खुद को उनकी दूसरी पत्नी बताते हुए पारिवारिक पेंशन की मांग की थी। लंबे समय तक यह मामला सरकारी प्रक्रिया में उलझा रहा। अब हाईकोर्ट के फैसले ने इस मामले में महत्वपूर्ण कानूनी पहलुओं को स्पष्ट किया है।
1982 में दूसरी शादी की अनुमति के लिए दिया था आवेदन
मामले की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी वर्ष 1982 की है। अदालत के सामने रखे गए रिकॉर्ड के अनुसार, जय लाल साह ने कुसुम देवी से दूसरी शादी के लिए 28 फरवरी 1982 को संबंधित विभाग के समक्ष अनुमति का आवेदन दिया था। उनका कहना था कि पहली पत्नी को भी इस विवाह से आपत्ति नहीं थी और दोनों महिलाएं साथ रहती थीं।
लेकिन विभाग की ओर से उस आवेदन पर कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया। यही तथ्य बाद में मामले की सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण साबित हुआ। हाईकोर्ट ने पाया कि दूसरी शादी के लिए सरकारी अनुमति मांगने का आवेदन कर्मचारी के सेवा रिकॉर्ड में मौजूद था, लेकिन उस पर निर्णय किए बिना मामले को बंद कर दिया गया था।
अदालत के सामने यह भी बताया गया कि पहली पत्नी से कोई संतान नहीं थी। जय लाल साह और कुसुम देवी के छह बच्चे थे, जिनमें दो बेटे और चार बेटियां शामिल हैं। पति की मृत्यु के बाद कुसुम देवी के सामने परिवार की जिम्मेदारी भी आ गई।
2009 में पति की मृत्यु, इसके बाद शुरू हुई पेंशन की लड़ाई
जय लाल साह की मृत्यु 17 अप्रैल 2009 को हुई। इसके बाद कुसुम देवी ने पारिवारिक पेंशन का दावा किया। लेकिन उनका दावा स्वीकार नहीं किया गया और उन्हें लंबे समय तक पेंशन का लाभ नहीं मिल सका।
इस दौरान उन्होंने अपने अधिकार के लिए विभागीय स्तर पर प्रयास किए। मामला आगे बढ़ा और अंततः न्यायालय तक पहुंचा। लगभग 17 साल तक चली इस प्रक्रिया ने उनके लिए आर्थिक और मानसिक परेशानियां पैदा कीं।
रिपोर्ट के अनुसार, 2019 में राज्य सरकार के अधिकारियों ने उनकी पेंशन की मांग खारिज कर दी थी। विभाग ने यह आधार बनाया कि दूसरी शादी के लिए राज्य सरकार की औपचारिक अनुमति उपलब्ध नहीं थी।
कुसुम देवी ने इस फैसले को पटना हाईकोर्ट में चुनौती दी। सुनवाई के दौरान उनके पक्ष की ओर से अदालत को बताया गया कि उनके पति ने दूसरी शादी के लिए आवश्यक अनुमति लेने की प्रक्रिया शुरू की थी और विभाग के पास इसका रिकॉर्ड भी मौजूद था।
हाईकोर्ट ने नियम 23(2) की व्याख्या की
मामले में बिहार सरकारी सेवक आचरण नियमावली, 1976 के नियम 23(2) की व्याख्या महत्वपूर्ण रही। अदालत ने कहा कि इस नियम को दूसरी शादी पर पूर्ण प्रतिबंध के रूप में नहीं देखा जा सकता। नियम के तहत सरकार के पास परिस्थितियों के अनुसार दूसरी शादी की अनुमति देने का अधिकार है।
अदालत ने इस मामले में यह भी देखा कि कर्मचारी ने दूसरी शादी के लिए अनुमति लेने की प्रक्रिया शुरू की थी। इसके बावजूद संबंधित आवेदन पर विभाग की ओर से कोई निर्णय नहीं लिया गया।
हाईकोर्ट ने इस तथ्य को नजरअंदाज करना उचित नहीं माना। अदालत के सामने मौजूद रिकॉर्ड ने यह दिखाया कि कर्मचारी ने अपनी ओर से विभाग को इस संबंध में सूचित किया था और अनुमति का अनुरोध किया था।
2019 का विभागीय आदेश रद्द
कुसुम देवी की याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने 5 फरवरी 2019 के उस विभागीय आदेश को रद्द कर दिया, जिसके माध्यम से उनकी पेंशन की मांग को खारिज किया गया था। अदालत ने कहा कि केवल इस आधार पर पेंशन से इनकार नहीं किया जा सकता कि दूसरी शादी की औपचारिक अनुमति का अंतिम आदेश उपलब्ध नहीं था, जबकि कर्मचारी द्वारा अनुमति के लिए आवेदन किया गया था और वह सेवा रिकॉर्ड में मौजूद था।
अदालत ने मामले के मानवीय पहलू पर भी ध्यान दिया। कुसुम देवी ने अपने पति के साथ लंबे समय तक जीवन बिताया और उनके छह बच्चों का पालन-पोषण किया। पति की मृत्यु के बाद परिवार की जिम्मेदारियां भी उनके सामने थीं।
ऐसे में वर्षों तक पारिवारिक पेंशन से वंचित रहना उनके लिए गंभीर आर्थिक परेशानी का कारण बना।
17 साल बाद मिला न्याय
कुसुम देवी के लिए यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने करीब 17 साल तक अपने अधिकार के लिए संघर्ष किया। पति की मृत्यु के बाद शुरू हुई पेंशन की लड़ाई सरकारी विभागों से होते हुए हाईकोर्ट तक पहुंची।
हाईकोर्ट के आदेश के बाद अब उनके लंबित पेंशन लाभ को लेकर रास्ता साफ हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार, अदालत ने राज्य सरकार को 17 अप्रैल 2009 से बकाया पेंशन लाभ जारी करने का निर्देश दिया है। यानी उन्हें पति की मृत्यु की तारीख से ही पेंशन संबंधी लाभ दिए जाने का आदेश हुआ है।
इस आदेश का अर्थ है कि केवल भविष्य की पेंशन ही नहीं, बल्कि लंबे समय से लंबित बकाया राशि पर भी कार्रवाई करनी होगी।
पहली पत्नी की स्थिति भी बनी महत्वपूर्ण कड़ी
इस मामले में पहली पत्नी की स्थिति भी महत्वपूर्ण रही। रिकॉर्ड के अनुसार पहली पत्नी से कोई संतान नहीं थी और कर्मचारी की मृत्यु के कुछ महीनों बाद ही पहली पत्नी का भी निधन हो गया था। रिपोर्ट के अनुसार पहली पत्नी की मृत्यु 10 दिसंबर 2009 को हुई।
अदालत के सामने यह परिस्थिति भी थी कि कर्मचारी की मृत्यु के समय कुसुम देवी जीवित थीं और उन्होंने पारिवारिक पेंशन का दावा किया था। ऐसे में मामले की परिस्थितियों का सामान्य नियमों के बजाय पूरी पृष्ठभूमि के साथ मूल्यांकन किया गया।
फैसले का व्यापक महत्व
पटना हाईकोर्ट का यह फैसला केवल कुसुम देवी के लिए राहत नहीं है, बल्कि सरकारी कर्मचारियों की दूसरी शादी और पारिवारिक पेंशन से जुड़े मामलों में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
हालांकि, इसका यह अर्थ नहीं है कि हर दूसरी पत्नी स्वतः पारिवारिक पेंशन की हकदार हो जाएगी। ऐसे मामलों में विवाह की वैधता, लागू कानून, सरकारी नियम, कर्मचारी की सेवा स्थिति, पहली पत्नी की स्थिति और उपलब्ध रिकॉर्ड जैसे कई तथ्यों पर विचार करना जरूरी होता है।
पटना हाईकोर्ट पहले भी अलग-अलग मामलों में दूसरी पत्नी के पारिवारिक पेंशन अधिकार से जुड़े अलग परिस्थितियों वाले मामलों की सुनवाई कर चुका है। इसलिए प्रत्येक मामले का फैसला उसके विशिष्ट तथ्यों और लागू कानूनी प्रावधानों के आधार पर होता है।
सरकार को करना होगा पेंशन लाभ का भुगतान
हाईकोर्ट के फैसले के बाद अब संबंधित विभाग को कुसुम देवी के मामले में आगे की प्रक्रिया पूरी करनी होगी। उन्हें बकाया पारिवारिक पेंशन और आगे मिलने वाली नियमित पेंशन के संबंध में आवश्यक आदेश जारी करने होंगे।
17 साल तक चले इस संघर्ष के बाद अदालत का फैसला कुसुम देवी और उनके परिवार के लिए बड़ी राहत के रूप में सामने आया है।
यह मामला इस बात का उदाहरण भी है कि सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज किसी महत्वपूर्ण आवेदन पर समय रहते निर्णय नहीं होने से किसी व्यक्ति को वर्षों तक कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ सकती है। यदि 1982 में दिए गए अनुमति आवेदन पर उसी समय विभागीय स्तर पर निर्णय हो जाता, तो संभवतः पेंशन को लेकर यह विवाद इतने लंबे समय तक नहीं चलता।
अदालत ने दिया न्याय और समानता का संदेश
इस पूरे मामले में हाईकोर्ट ने कानूनी प्रावधानों के साथ-साथ मानवीय परिस्थितियों को भी ध्यान में रखा। अदालत के फैसले ने यह स्पष्ट किया कि सरकारी सेवा नियमों की व्याख्या करते समय मामले के वास्तविक तथ्यों और संबंधित व्यक्ति की परिस्थितियों पर भी ध्यान देना आवश्यक है।
कुसुम देवी के लिए यह फैसला 17 वर्षों की लंबी प्रतीक्षा के बाद आया है। अब उन्हें पति की मृत्यु के बाद से लंबित पारिवारिक पेंशन लाभ मिलने का रास्ता खुल गया है।
कुल मिलाकर, पटना हाईकोर्ट का यह फैसला सरकारी कर्मचारियों की दूसरी शादी और पारिवारिक पेंशन से जुड़े विवादों के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। अदालत ने कुसुम देवी को राहत देते हुए विभागीय निर्णय को रद्द किया और पेंशन लाभ को लेकर राज्य सरकार को आवश्यक कार्रवाई करने का निर्देश दिया। लंबे समय से न्याय की प्रतीक्षा कर रही कुसुम देवी के लिए यह फैसला न केवल आर्थिक राहत लेकर आया है, बल्कि वर्षों चले संघर्ष का भी अंत करता है।