बिहार में बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी और युवाओं का पलायन: राज्य के विकास के रास्ते में खड़े सबसे बड़े गंभीर संकट
पूर्णिया: बिहार अपनी समृद्ध ऐतिहासिक विरासत, सांस्कृतिक विविधता और मेहनतकश आबादी के लिए जाना जाता है, लेकिन आज इस राज्य के सामने कुछ ऐसे विकराल और गंभीर संकट खड़े हैं, जो इसके भविष्य को अंदर से खोखला कर रहे हैं। राज्य भर में लगातार आसमान छूती महंगाई, चरमराती बेरोजगारी और हुनरमंद युवाओं का बड़े पैमाने पर अन्य राज्यों की ओर पलायन आज बिहार के विकास के मार्ग में सबसे बड़ी चिंता का विषय बन चुका है। सीमांचल के प्रमुख केंद्र पूर्णिया से लेकर पटना तक, हर आम नागरिक की जुबान पर आज यही सवाल है कि आखिर इन बुनियादी समस्याओं का समाधान कब और कैसे निकलेगा। आइए जानते हैं कि कैसे महंगाई, बेरोजगारी और पलायन की इस त्रिकोणीय समस्या ने बिहार के जनजीवन को पूरी तरह प्रभावित कर रखा है और इसके क्या दूरगामी परिणाम हो सकते हैं।
बेलगाम महंगाई: आम आदमी की थाली से गायब होती दाल और सब्जियां
बिहार के बाजारों में आज महंगाई का ऐसा चक्रव्यूह रचा हुआ है, जिससे मध्यम वर्ग और गरीब परिवार पूरी तरह पिस चुके हैं। खाने-पीने की जरूरी वस्तुएं, दालें, खाद्य तेल, रसोई गैस (LPG), पेट्रोल-डीजल और सब्जियों के दाम लगातार बढ़ते जा रहे हैं।
रसोई का बजट हुआ ध्वस्त: एक तरफ जहां आम आदमी की आय (Income) स्थिर है या बहुत धीमी गति से बढ़ रही है, वहीं दूसरी तरफ महंगाई हर दिन नए रिकॉर्ड बना रही है। गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करना भी मुश्किल होता जा रहा है।
बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य पर असर: महंगाई का सबसे बुरा असर बच्चों की पढ़ाई और स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ रहा है। प्राइवेट स्कूलों की फीस, कॉपियां-किताबें और महंगी होती दवाइयां आम आदमी की पहुंच से बाहर होती जा रही हैं। मजबूरन लोगों को कर्ज के जाल में फंसना पड़ रहा है।
बेरोजगारी का अभिशाप: डिग्रियां हाथ में, लेकिन रोजगार की भारी किल्लत
बिहार में बेरोजगारी की समस्या किसी से छिपी नहीं है। हर साल लाखों छात्र विश्वविद्यालयों और कॉलेजों से इंजीनियरिंग, ग्रेजुएशन, मैनेजमेंट और अन्य तकनीकी डिग्रियां लेकर बाहर निकलते हैं, लेकिन उनके सामने रोजगार का कोई ठोस विकल्प नहीं होता।
उद्योगों और कारखानों का अभाव: बिहार में बड़े पैमाने पर औद्योगिकीकरण (Industrialization) न होने के कारण रोजगार के अवसरों का सृजन बहुत सीमित है। पूर्णिया और आसपास के सीमांचल क्षेत्र में कृषि आधारित उद्योगों (जैसे मक्का और जूट आधारित कारखाने) की अपार संभावनाएं होने के बावजूद सरकारी उपेक्षा के चलते यहां नए कारखाने स्थापित नहीं हो सके हैं।
सरकारी नौकरियों की लंबी कतारें और परीक्षाएं: जब भी राज्य में सरकारी नौकरियों के लिए विज्ञापन निकलते हैं, तो लाखों की संख्या में युवा आवेदन करते हैं। पेपर लीक, लंबी कानूनी प्रक्रियाएं और परीक्षाओं में देरी के कारण युवाओं का मनोबल टूटता जा रहा है। रोजगार न मिलने के कारण राज्य के शिक्षित युवा या तो हताशा का शिकार हो रहे हैं या डिप्रेशन में जा रहे हैं।
युवाओं का पलायन: अपनी ही माटी छोड़ने को मजबूर क्यों हैं बिहार के नौजवान?
जब राज्य के भीतर युवाओं को अपनी योग्यता के अनुसार काम और दो वक्त की रोटी का ठिकाना नहीं मिलता, तो उनके सामने पलायन (Migration) के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचता। बिहार से हर साल लाखों युवा दिल्ली, मुंबई, पंजाब, गुजरात, बेंगलुरु और चेन्नई जैसे बड़े महानगरों की ओर रुख करते हैं।
दिहाड़ी मजदूर से लेकर कारखानों तक की मजबूरी: बिहार से जाने वाले अधिकांश युवा इन महानगरों में जाकर छोटी-मोटी नौकरियों, फैक्ट्रियों में मजदूरी, निर्माण स्थलों पर दिहाड़ी मजदूर या डिलीवरी बॉय के रूप में काम करने को विवश होते हैं।
मेधा (Brain Drain) का पलायन: सिर्फ मजदूर वर्ग ही नहीं, बल्कि बिहार के जो युवा तकनीकी रूप से दक्ष हैं या डॉक्टर-इंजीनियर हैं, वे भी बेहतर भविष्य और उच्च वेतन के लिए दूसरे राज्यों या विदेशों में बस रहे हैं। इसे 'ब्रेन Drain' कहा जाता है, जिससे राज्य अपनी सबसे कीमती बौद्धिक पूंजी खो रहा है।
परिवारों का टूटना: पलायन के कारण ग्रामीण इलाकों में सामाजिक ताना-बाना भी बिखर रहा है। पति के बाहर रहने के कारण महिलाओं और बुजुर्गों को अकेले गांवों में संघर्ष करना पड़ता है, और बच्चों को पिता का साया ठीक से नहीं मिल पाता।
राजनीतिक और प्रशासनिक विमर्श: वादों और हकीकत के बीच का अंतर
महंगाई, बेरोजगारी और पलायन के इन गंभीर मुद्दों पर हर राजनीतिक दल चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे और दावे करता है, लेकिन जमीन पर स्थिति जस की तस बनी हुई है।
नीतिगत बदलाव की आवश्यकता: अर्थशास्त्रियों और जानकारों का मानना है कि जब तक बिहार में कृषि का आधुनिकीकरण नहीं होता, स्थानीय स्तर पर कृषि आधारित फूड प्रोसेसिंग यूनिट्स नहीं लगतीं और एमएसएमई (MSME) सेक्टर को बढ़ावा नहीं दिया जाता, तब तक इस समस्या का स्थाई समाधान संभव नहीं है।
कौशल विकास (Skill Development) की जमीनी हकीकत: सरकार द्वारा चलाए जा रहे कौशल विकास कार्यक्रमों को धरातल पर अधिक पारदर्शी और रोजगारोन्मुखी बनाने की जरूरत है, ताकि युवाओं को सिर्फ कागजी ट्रेनिंग न मिलकर सीधा रोजगार मिल सके।
बिहार में लगातार बढ़ती महंगाई, गंभीर बेरोजगारी और युवाओं का यह अनवरत पलायन अब केवल एक आर्थिक मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह राज्य के आत्मसम्मान और भविष्य का सवाल बन चुका है। पूर्णिया से लेकर पूरे बिहार के कोने-कोने में आज एक ऐसी ठोस नीति की मांग उठ रही है जो युवाओं को उनके अपने गृह राज्य में ही सम्मानजनक रोजगार दे सके और महंगाई पर लगाम कसकर आम आदमी का जीवन सुगम बना सके। यदि समय रहते सरकारों ने इस दिशा में क्रांतिकारी कदम नहीं उठाए, तो बिहार की विकास यात्रा हमेशा पिछड़ी हुई ही रह जाएगी।