योजना का नया नाम 'विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार एवं आजीविका मिशन, ग्रामीण': क्या नाम बदलने से बदलेगी मजदूरों की किस्मत?
भारत सरकार ने हाल ही में ग्रामीण विकास की धुरी मानी जाने वाली 'महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना' (मनरेगा) का नाम बदलकर 'विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार एवं आजीविका मिशन, ग्रामीण' कर दिया है। सरकार का यह कदम देश के 'विकसित भारत' के विजन को मजबूती देने के उद्देश्य से उठाया गया है। हालांकि, इस नाम परिवर्तन के बाद जमीनी स्तर पर जो तस्वीर उभरकर आ रही है, वह बेहद चिंताजनक है। योजना का नाम बदलने के बावजूद ग्रामीण मजदूरों में उत्साह का अभाव है, क्योंकि उनकी मूल समस्याएं—काम का अभाव और मजदूरी का भुगतान—ज्यों की त्यों बनी हुई हैं।
क्या है नया स्वरूप?
सरकार की ओर से जारी अधिसूचना के अनुसार, इस मिशन का लक्ष्य ग्रामीण अर्थव्यवस्था को अधिक समावेशी और उत्पादक बनाना है। नए नाम के साथ इसके क्रियान्वयन में कुछ तकनीकी बदलाव भी किए गए हैं, ताकि पारदर्शिता बढ़ाई जा सके। लेकिन ग्रामीण इलाकों में रहने वाले मजदूरों के लिए, जिनके लिए यह योजना 'जीवन रेखा' (Lifeline) रही है, इस नाम का कोई विशेष अर्थ नहीं है।
मजदूरों का दर्द: "नाम बदल गया, हालात नहीं"
दरभंगा और उसके आसपास के ग्रामीण इलाकों के मजदूरों का कहना है कि नाम बदलने से उनके खाली हाथ नहीं भरेंगे। उनकी मुख्य शिकायतें निम्नलिखित हैं:
काम की कमी: मजदूरों का आरोप है कि नया मिशन शुरू होने के बाद भी उन्हें साल में 100 दिन का रोजगार सुनिश्चित नहीं हो रहा है। कई बार काम की मांग करने के बावजूद उन्हें खाली हाथ लौटा दिया जाता है।
मजदूरी का भुगतान: सबसे बड़ी समस्या मजदूरी के भुगतान में देरी की है। महीनों तक काम करने के बाद भी जब मजदूरी का पैसा खाते में नहीं आता, तो मजदूरों के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो जाता है।
प्रक्रियात्मक उलझनें: नए नाम के साथ आए नियमों में पारदर्शिता के नाम पर तकनीकी बाधाएं बढ़ गई हैं। आधार सीडिंग और बायोमेट्रिक उपस्थिति की समस्याओं के कारण कई मजदूरों को काम मिलने में कठिनाई हो रही है।
विशेषज्ञों की राय: नाम बनाम नियति
सामाजिक कार्यकर्ताओं और अर्थशास्त्रियों का मानना है कि केवल नाम बदलने से योजना की प्रभावशीलता नहीं बढ़ेगी। नाम बदलने से ब्रांडिंग तो हो सकती है, लेकिन जब तक जमीनी स्तर पर जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक मजदूर परेशान ही रहेंगे।
"मनरेगा एक कानून था जिसने मजदूरों को 'काम का अधिकार' दिया था। नए नाम 'विकसित भारत मिशन' के साथ सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि बजट का आवंटन पर्याप्त हो और भुगतान की प्रक्रिया को सरलीकृत किया जाए।" — एक स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता
योजना की चुनौतियां
योजना के नए मिशन में बदलावों के बावजूद निम्नलिखित चुनौतियां बनी हुई हैं:
समयबद्ध भुगतान की कमी: सरकार के 'मिस्टर्ड' (Musters) के बावजूद भुगतान महीनों लटका रहता है।
सामग्री और मजदूरी का असंतुलन: कई बार काम तो शुरू हो जाता है, लेकिन भुगतान की प्रक्रिया धीमी होने से काम बीच में ही रुक जाता है।
जागरूकता का अभाव: मजदूरों को यह नहीं पता कि नए मिशन में उनके अधिकार पहले से बेहतर हैं या केवल नाम का बदलाव हुआ है।
प्रशासनिक रुख
दूसरी ओर, जिला प्रशासन के अधिकारियों का दावा है कि 'विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार एवं आजीविका मिशन, ग्रामीण' का उद्देश्य ग्रामीण भारत में कौशल विकास और टिकाऊ परिसंपत्तियों का निर्माण करना है। उन्होंने भरोसा दिलाया है कि भुगतान प्रक्रिया को तेज करने के लिए डिजिटल निगरानी को मजबूत किया गया है।
ग्रामीण मजदूरों में जो असंतोष दिख रहा है, वह एक चेतावनी है। 'विकसित भारत' का सपना तब तक अधूरा है, जब तक उस भारत का सबसे निचला तबका—ग्रामीण मजदूर—अपने अधिकारों के लिए दर-दर न भटकना पड़े। यदि सरकार वाकई इस मिशन को सफल बनाना चाहती है, तो उसे नाम के साथ-साथ 'नियति' बदलने पर भी काम करना होगा। मजदूरों को 'गारंटी' केवल कागजों या नाम पर नहीं, बल्कि उनके बैंक खातों में समय पर मजदूरी के रूप में चाहिए।