बायसी और केनगर में तकनीकी गड़बड़ी से ठप हुआ राशन वितरण: तीन दिनों से खाली हाथ लौट रहे गरीब लाभुक, दुकानदारों और उपभोक्ताओं में बढ़ी नाराजगी
पूर्णिया: बिहार के पूर्णिया जिले के अंतर्गत आने वाले बायसी (Baisi) और केनगर (Kenagar) प्रखंडों में जन वितरण प्रणाली (Public Distribution System - PDS) की व्यवस्था इन दिनों गहरी तकनीकी समस्याओं की चपेट में आ गई है। गरीब और जरूरतमंद परिवारों को मिलने वाला सरकारी राशन पिछले दो से तीन दिनों से पूरी तरह बाधित है। सर्वर डाउन रहने, ई-पॉश (e-POS) मशीनों में तकनीकी खराबी और इंटरनेट कनेक्टिविटी फेल होने के कारण राशन कार्डधारी उपभोक्ताओं को दुकानों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं और अंततः निराश होकर खाली हाथ घर लौटना पड़ रहा है। इस व्यवस्थागत लापरवाही के कारण आम जनता में रोष लगातार बढ़ता जा रहा है, वहीं डीलर भी इस संकट के बीच पिसते नजर आ रहे हैं। आइए जानते हैं इस समस्या के सभी पहलुओं को विस्तार से।
क्या है पूरी समस्या? क्यों रुका हुआ है राशन वितरण?
सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत हर महीने की तय तारीखों से कार्डधारियों के बीच खाद्यान्न (गेहूं, चावल आदि) का वितरण किया जाता है। लेकिन पिछले 72 घंटों (दो से तीन दिनों) से बायसी और केनगर क्षेत्र के दर्जनों गांवों में हालात पूरी तरह बिगड़ चुके हैं।
सर्वर और नेटवर्क की भारी समस्या: ई-पॉश मशीनों में अंगूठा लगाने (बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण) के लिए मजबूत सर्वर और इंटरनेट कनेक्टिविटी की आवश्यकता होती है। पिछले कुछ दिनों से सर्वर का लिंक पूरी तरह फेल चल रहा है या फिर पेज खुलने में घंटों का समय लग रहा है।
मशीनों का हैंग होना: कई दुकानों पर मशीनें या तो काम नहीं कर रही हैं या फिर 'सर्वर डाउन' (Server Down) का एरर मैसेज बार-बार शो कर रहा है। ऐसी स्थिति में डीलर चाहकर भी किसी लाभुक का अंगूठा स्कैन नहीं कर पा रहे हैं।
समय सीमा का दबाव: विभागीय नियमों के अनुसार हर महीने एक निश्चित समयावधि के भीतर शत-प्रतिशत राशन का वितरण किया जाना अनिवार्य होता है। तकनीकी बाधाओं के कारण इस महीने का कोटा समय पर बटना मुश्किल हो गया है, जिससे डीलरों पर भी दबाव बढ़ गया है।
लाभुकों का दर्द: घंटों लाइन में खड़े रहने के बाद मिल रही निराशा
बायसी और केनगर के ग्रामीण इलाकों से सुबह-सुबह महिलाएं, बुजुर्ग और मजदूर वर्ग के लोग अपना राशन लेने के लिए कोटे की दुकानों (PDS Shops) पर लंबी-लंबी कतारों में खड़े हो रहे हैं। लेकिन कई-कई घंटे धूप और लाइनों में खड़े रहने के बाद जब उनकी बारी आती है, तो मशीन काम करना बंद कर देती है।
मजदूरी छोड़कर दुकान पहुंच रहे लोग: गरीब तबके के इन लोगों के लिए हर दिन की मजदूरी बहुत मायने रखती है। एक दिन राशन के चक्कर में दुकान पर खड़े होने का मतलब है कि उस दिन की दिहाड़ी का नुकसान। इसके बावजूद जब उन्हें बिना अनाज के खाली हाथ लौटना पड़ता है, तो उनका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच जाता है।
बुजुर्गों और महिलाओं की परेशानी: बायोमेट्रिक सिस्टम में कई बार बुजुर्गों के फिंगरप्रिंट (अंगूठे के निशान) घिस जाने के कारण मैच नहीं करते, और ऊपर से सर्वर फेल होने की समस्या ने उनकी परेशानी को दोगुना कर दिया है। कई वृद्ध महिलाओं ने बताया कि वे पिछले तीन दिनों से लगातार दुकान के चक्कर काट रही हैं, लेकिन डीलर सर्वर न चलने का हवाला देकर उन्हें वापस भेज देते हैं।
राशन दुकानदारों (डीलरों) की भी अपनी मजबूरी
इस तकनीकी संकट के बीच केवल उपभोक्ता ही परेशान नहीं हैं, बल्कि जन वितरण प्रणाली के विक्रेता (डीलर) भी प्रशासनिक और जनता के गुस्से के बीच बुरी तरह फंसे हुए हैं।
जनता के गुस्से का सामना: डीलरों का कहना है कि वे सरकार के नियम और मशीन से ही बंधे हुए हैं। जब तक ई-पॉश मशीन पर पर्ची नहीं कटेगी, वे अपनी मर्जी से किसी को अनाज नहीं दे सकते। लेकिन ग्राहक यह बात समझने को तैयार नहीं होते और वे डीलरों पर धांधली या राशन छुपाने का बेबुनियाद आरोप लगाने लगते हैं।
खाद्यान्न उठान और स्टॉक की समस्या: कई डीलरों का यह भी कहना है कि तकनीकी समस्याओं के कारण गोदाम से मिलने वाला अनाज समय पर अपडेट नहीं हो पा रहा है, जिससे मासिक वितरण का रिकॉर्ड (Stock Register) मिलाने में भारी दिक्कत आ रही है।
प्रशासनिक सुस्ती और विभागीय अधिकारियों की चुप्पी
बायसी और केनगर जैसे बड़े ग्रामीण क्षेत्रों में पिछले कई दिनों से राशन वितरण ठप होने के बावजूद खाद्य एवं उपभोक्ता संरक्षण विभाग या स्थानीय आपूर्ति पदाधिकारियों (Supply Officers) की ओर से कोई ठोस वैकल्पिक व्यवस्था या तकनीकी समाधान तुरंत नहीं निकाला जा सका है।
तकनीकी टीम की गैर-मौजूदगी: स्थानीय लोगों और डीलरों का आरोप है कि इस तरह की सर्वर संबंधी समस्याएं अक्सर महीने के शुरुआती दिनों में आती हैं, लेकिन विभाग के स्तर पर तकनीकी सहायकों की कोई टीम मैदान में नजर नहीं आती जो तुरंत मशीनों या सर्वर की दिक्कतों को दूर कर सके।
मैनुअल वितरण की मांग: ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों का कहना है कि जब तक सर्वर पूरी तरह ठीक नहीं हो जाता, तब तक विभाग को ओटीपी (OTP) आधारित या रजिस्टर के माध्यम से मैनुअल वितरण की अनुमति देनी चाहिए, ताकि कम से कम भूखे पेट सोने वाले गरीबों को समय पर राशन मिल सके।
भविष्य की आशंका और चेतावनी
यदि बायसी और केनगर में इन तकनीकी समस्याओं का समाधान अगले एक-दो दिनों के भीतर नहीं किया गया, तो स्थिति और अधिक बिगड़ सकती है।
आक्रोशित प्रदर्शन की संभावना: स्थानीय स्तर पर उपभोक्ताओं द्वारा प्रखंड आपूर्ति कार्यालय (Block Supply Office) का घेराव या सड़क जाम करने की चेतावनी दी जा रही है।
खाद्यान्न कालाबाजारी का अंदेशा: जानकारों का यह भी मानना है कि यदि पारदर्शी डिजिटल प्रक्रिया लंबे समय तक बाधित रहती है, तो इससे कुव्यवस्था का फायदा उठाकर खाद्यान्न की कालाबाजारी की आशंका भी बढ़ जाती है।
पूर्णिया जिले के बायसी और केनगर प्रखंडों में तकनीकी समस्याओं के कारण जन वितरण प्रणाली का ठप होना और पिछले तीन दिनों से लाभुकों का खाली हाथ लौटना एक गंभीर प्रशासनिक विफलता को दर्शाता है। डिजिटल इंडिया और ऑनलाइन सिस्टम अपनी जगह बेहतर हो सकते हैं, लेकिन जब तकनीक आम आदमी के लिए जी का जंजाल बन जाए और गरीबों को दो वक्त के भोजन के लिए दर-दर भटकना पड़े, तो यह चिंता का विषय है। आवश्यकता इस बात की है कि जिला प्रशासन और खाद्य आपूर्ति विभाग तुरंत संज्ञान लेते हुए सर्वर की तकनीकी खामियों को दूर करे और वैकल्पिक तरीकों से राशन वितरण सुनिश्चित करे, ताकि जनता की नाराजगी को शांत किया जा सके।