मुजफ्फरपुर में जनसंख्या स्थिरता पखवाड़े में लापरवाही: परिवार नियोजन ऑपरेशन न होने पर सिविल सर्जन ने छह सीएचसी प्रभारियों से मांगा स्पष्टीकरण
मुजफ्फरपुर: बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में स्वास्थ्य विभाग की व्यवस्थाओं और अधिकारियों की कार्यशैली पर एक बार फिर सवालिया निशान खड़े हो गए हैं। स्वास्थ्य विभाग द्वारा जनसंख्या नियंत्रण और परिवार नियोजन को बढ़ावा देने के लिए बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर प्रशासनिक सुस्ती इन दावों की पोल खोलती नजर आ रही है। हाल ही में जिले में 11 से 31 जुलाई के बीच मनाए गए 'जनसंख्या स्थिरता पखवाड़ा' (Population Stabilization Fortnight) के दौरान परिवार नियोजन के मोर्चे पर बेहद लचर प्रदर्शन देखने को मिला।
निर्धारित समयावधि में कई सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHC) में एक भी परिवार नियोजन ऑपरेशन (नसबंदी या बंध्याकरण) नहीं किए जाने की गंभीर शिकायतों पर जिला प्रशासन और स्वास्थ्य महकमे में हड़कंप मच गया है। इस लापरवाही को बेहद गंभीरता से लेते हुए मुजफ्फरपुर के सिविल सर्जन (Civil Surgeon) ने कड़ा रुख अपनाया है और जिले के छह सीएचसी प्रभारियों (Medical Officers In-Charge) से स्पष्टीकरण (शो-कॉज नोटिस) की मांग की है। इसके साथ ही, पखवाड़े के दौरान औचक निरीक्षण में अनुपस्थित पाए गए चिकित्सा कर्मियों पर भी गाज गिरने की पूरी संभावना है।
क्या है जनसंख्या स्थिरता पखवाड़ा और इसका उद्देश्य?
भारत सरकार और राज्य सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा हर साल देश में बढ़ती आबादी को नियंत्रित करने और लोगों के बीच परिवार नियोजन के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए विशेष अभियान चलाए जाते हैं। इसी कड़ी में हर वर्ष जुलाई माह में 'जनसंख्या स्थिरता पखवाड़ा' आयोजित किया जाता है।
इस पखवाड़े का मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित होता है:
जागरूकता बढ़ाना: ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में दंपतियों को छोटे परिवार के लाभों के बारे में जागरूक करना।
साधनों की उपलब्धता: गर्भनिरोधक उपायों और परिवार नियोजन की स्थायी व अस्थायी पद्धतियों को आसानी से सुलभ कराना।
नसबंदी और बंध्याकरण शिविर: अस्पतालों में विशेष शिविर लगाकर महिलाओं और पुरुषों के लिए परिवार नियोजन के ऑपरेशन निःशुल्क और सुरक्षित रूप से संपन्न कराना।
लेकिन मुजफ्फरपुर जिले में इस बार जुलाई के पखवाड़े में जो आंकड़े सामने आए, वे बेहद निराशाजनक थे। जिन स्वास्थ्य केंद्रों को इस राष्ट्रीय कार्यक्रम को सफल बनाने की मुख्य जिम्मेदारी सौंपी गई थी, वहां के प्रभारियों की उदासीनता के कारण लक्ष्य का एक चौथाई हिस्सा भी पूरा नहीं हो सका।
शून्य ऑपरेशन: स्वास्थ्य प्रभारियों की कार्यशैली पर उठे सवाल
सिविल सर्जन कार्यालय से मिली जानकारी के अनुसार, 11 जुलाई से 31 जुलाई तक चले इस पखवाड़े की जब समीक्षा की गई, तो चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए। जिले के कई सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHC) में परिवार नियोजन के तहत एक भी महिला या पुरुष का बंध्याकरण/नसबंदी ऑपरेशन नहीं किया गया।
यह स्थिति तब है जब सरकार की ओर से इन अभियानों के लिए पर्याप्त बजट, जागरूकता अभियान के खर्चे और अस्पतालों को संसाधन मुहैया कराए जाते हैं। सवाल यह उठता है कि जब ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को इसकी आवश्यकता होती है और सरकार इसके लिए पूरी व्यवस्था का दावा करती है, तो आखिर क्यों सरकारी अस्पतालों में ताले लटके रहे या डॉक्टरों ने इसमें रुचि नहीं दिखाई?
जानकारों का मानना है कि सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों की उदासीनता, क्षेत्र में आशा कार्यकर्ताओं (ASHA Workers) द्वारा सही तरीके से प्रेरित न किया जाना और मॉनिटरिंग की कमी इसके मुख्य कारण रहे हैं।
सिविल सर्जन की सख्त कार्रवाई: छह सीएचसी प्रभारियों को नोटिस
मामले की गंभीरता को देखते हुए मुजफ्फरपुर के सिविल सर्जन ने इसे अपने प्रशासनिक कर्तव्यों के प्रति गंभीर लापरवाही माना है। उन्होंने संबंधित छह सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों के प्रभारियों को चिन्हित करते हुए उनके खिलाफ आधिकारिक तौर पर स्पष्टीकरण पत्र जारी किया है।
इन सभी प्रभारियों से निम्नलिखित बिंदुओं पर जवाब तलब किया गया है:
शून्य प्रगति क्यों? पखवाड़े जैसे महत्वपूर्ण राष्ट्रीय कार्यक्रम के दौरान उनके अस्पताल में एक भी परिवार नियोजन ऑपरेशन क्यों नहीं हुआ?
लक्ष್ಯ के प्रति उदासीनता: सरकार द्वारा दिए गए दिशा-निर्देशों और लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए उन्होंने अपने स्तर पर क्या प्रयास किए?
संसाधनों का उपयोग क्यों नहीं? जब अस्पताल में दवाइयां और सर्जन उपलब्ध थे, तो मरीजों को बिना ऑपरेशन के वापस क्यों लौटाया गया?
प्रभारियों को चेतावनी दी गई है कि यदि संतोषजनक जवाब नहीं मिला, तो उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई (Departmental Proceedings) शुरू की जाएगी, जिसमें वेतन रोकने से लेकर उच्चाधिकारियों को अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए संस्तुति भेजना शामिल है।
निरीक्षण के दौरान अनुपस्थित कर्मियों पर भी कसा शिकंजा
जनसंख्या स्थिरता पखवाड़े के क्रियान्वयन की जमीनी हकीकत जानने के लिए जब स्वास्थ्य विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने विभिन्न स्वास्थ्य केंद्रों का औचक निरीक्षण (Surprise Inspection) किया, तो एक और गंभीर अनियमितता सामने आई। निरीक्षण के दौरान कई चिकित्सा अधिकारी, डॉक्टर और पैरामेडिकल स्टाफ अपनी ड्यूटियों से नदारद पाए गए।
अस्पतालों में डॉक्टरों के गायब रहने और कुव्यवस्था के कारण दूर-दराज से इलाज या परिवार नियोजन की उम्मीद लेकर आने वाले मरीजों को भारी बैरंग लौटना पड़ा। सिविल सर्जन ने इन अनुपस्थित कर्मियों की सूची भी तैयार कर ली है और स्पष्टीकरण में इनसे भी जवाब मांगा जा रहा है। अनुपस्थिति की इस प्रवृत्ति से यह साफ जाहिर होता है कि निचले स्तर पर स्वास्थ्य कर्मियों में अनुशासन का कितना अभाव है।
स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार की सख्त जरूरत
मुजफ्फरपुर जिले की यह घटना बिहार की ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं की पोल खोलने के लिए काफी है। एक तरफ जहाँ सरकार स्वास्थ्य सूचकांकों (Health Indicators) को बेहतर बनाने के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, वहीं दूसरी तरफ कुछ लापरवाह अधिकारियों के कारण सरकारी योजनाएं कागजों तक ही सिमट कर रह जाती हैं।
आम जनता की परेशानी: गरीब तबके के लोग निजी अस्पतालों का भारी-भरकम खर्च उठाने में असमर्थ होते हैं, इसलिए वे पूरी तरह सरकारी अस्पतालों पर निर्भर रहते हैं। ऐसे में यदि CHC में ऑपरेशन जैसी बुनियादी सुविधाएं भी बंद मिलें, तो जनता का स्वास्थ्य तंत्र से विश्वास उठने लगता है।
प्रशासनिक संदेश: सिविल सर्जन द्वारा की गई यह कार्रवाई भले ही शुरुआती कदम हो, लेकिन यदि इस पर ठोस और कड़ी कार्रवाई नहीं की गई, तो भविष्य में भी ऐसे अभियानों का हस्र ऐसा ही होगा।
मुजफ्फरपुर में जनसंख्या स्थिरता पखवाड़े के दौरान परिवार नियोजन ऑपरेशन में शून्य प्रगति और औचक निरीक्षण में स्वास्थ्य कर्मियों की अनुपस्थिति ने एक बार फिर प्रशासनिक तंत्र की पोल खोल दी है। सिविल सर्जन द्वारा छह सीएचसी प्रभारियों से स्पष्टीकरण मांगा जाना एक सही कदम है, लेकिन यह सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है कि इस तरह की लापरवाही दोबारा न हो। जनता के स्वास्थ्य और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में कोताही बरतने वालों के खिलाफ सख्त मिसाल कायम करना ही स्वास्थ्य विभाग की साख को बचा सकता है।