नगर निगम में फिर भड़का टकराव; पार्षदों और प्रशासनिक अधिकारियों के बीच पुराना विवाद गरमाया, मुकदमा वापस न लेने पर पार्षदों ने किया उग्र आंदोलन का ऐलान

भागलपुर, मुख्य संवाददाता: बिहार के भागलपुर नगर निगम परिसर में एक बार फिर जनप्रतिनिधि और प्रशासनिक महकमा आमने-सामने आ गए हैं। पार्षदों और नगर निगम के प्रशासनिक अधिकारियों के बीच सुलग रहा पुराना विवाद अब खुलकर सतह पर आ गया है, जिससे शहर की स्थानीय राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था में भारी उबाल देखने को मिल रहा है। पार्षदों ने नगर प्रशासन की तानाशाही कार्यशैली के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए आर-पार की लड़ाई का ऐलान कर दिया है। पार्षदों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि उनके खिलाफ दर्ज कराए गए मुकदमे को जल्द से जल्द वापस नहीं लिया गया, तो वे निगम कार्यालय में तालाबंदी करने के साथ-साथ सड़क से लेकर सदन तक उग्र आंदोलन करेंगे।

क्या है पूरा विवाद? बोर्ड की बैठकों से लेकर फाइलों तक खींचतान

भागलपुर नगर निगम में मेयर, डिप्टी मेयर, वार्ड पार्षदों और नगर आयुक्त (Municipal Commissioner) समेत अन्य प्रशासनिक अधिकारियों के बीच खींचतान का यह कोई नया मामला नहीं है। पिछले कुछ महीनों से विकास कार्यों के क्रियान्वयन, वार्डों में फंड के आवंटन, योजनाओं की प्रशासनिक स्वीकृति और टेंडर प्रक्रिया को लेकर पार्षदों और अधिकारियों के बीच लगातार शीत युद्ध चल रहा था।

पार्षदों का आरोप है कि जनता द्वारा चुनकर आए जनप्रतिनिधियों की आवाज को नगर निगम के अधिकारी दबाना चाहते हैं। जब भी पार्षद अपने-अपने वार्डों में जनहित के मुद्दों, साफ-सफाई, जलजमाव या स्ट्रीट लाइट की समस्याओं को उठाते हैं, तो अधिकारी मनमाने तरीके से फाइलों को लटका देते हैं। इसी खींचतान के बीच पूर्व में हुई तीखी नोकझोक और हंगामे के दौरान प्रशासनिक स्तर पर कुछ पार्षदों के खिलाफ थाने में मामले दर्ज करा दिए गए थे, जिससे पार्षदों में भारी आक्रोश व्याप्त है।

पार्षदों की दो टूक: "दमनकारी नीति के खिलाफ करेंगे जोरदार आंदोलन"

विवाद के तूल पकड़ने के बाद सभी असंतुष्ट पार्षदों ने एकजुट होकर एक आपात बैठक की, जिसमें सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया कि अधिकारियों की इस तानाशाही को अब और बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। पार्षदों का कहना है कि वे जनता के प्रतिनिधि हैं और जनता के हक की लड़ाई लड़ना उनका संवैधानिक कर्तव्य है, लेकिन प्रशासन उन्हें झूठे मुकदमों में फंसाकर उनकी आवाज को कुचलने का प्रयास कर रहा है।

पार्षदों ने अल्टीमेटम देते हुए कहा है कि:

मुकदमा वापसी की मांग: पार्षदों पर दर्ज किए गए सभी मामलों को तत्काल प्रभाव से वापस लिया जाए।

प्रशासनिक रवैये में सुधार: अधिकारियों का पार्षदों के प्रति सम्मानजनक रवैया हो और वार्डों के विकास कार्यों में अनावश्यक अड़ंगेबाजी बंद की जाए।

उग्र आंदोलन की चेतावनी: यदि प्रशासन अपनी जिद पर अड़ा रहा, तो नगर निगम के सभी कामकाज ठप कर दिए जाएंगे और शहर में जोरदार धरना-प्रदर्शन किया जाएगा, जिसकी पूरी जिम्मेदारी नगर प्रशासन की होगी।

विकास कार्यों पर पड़ रहा है सीधा असर

पार्षदों और अधिकारियों के बीच चल रहे इस अंतहीन विवाद का सबसे बड़ा खामियाजा भागलपुर की आम जनता को भुगतना पड़ रहा है। निगम बोर्ड की बैठकें या तो कोरम के अभाव में रद्द हो जाती हैं या फिर हंगामे की भेंट चढ़ जाती हैं। शहर की साफ-सफाई व्यवस्था, नाला निर्माण, पेयजल आपूर्ति और सड़क मरम्मत जैसी बुनियादी जरूरतें कागजी फाइलों में ही दम तोड़ रही हैं। एक तरफ जहां मानसून के दौरान शहर जलजमाव और गंदगी से जूझ रहा है, वहीं दूसरी तरफ अधिकारी और जनप्रतिनिधि कुर्सी की इस लड़ाई में उलझे हुए हैं।

प्रशासनिक खेमे में खलबली, मान-मनौव्वल के प्रयास तेज

पार्षदों द्वारा आंदोलन के ऐलान और उग्र तेवर को देखते हुए प्रशासनिक गलियारों में भी खलबली मच गई है। नगर निगम के उच्चाधिकारी इस गतिरोध को खत्म करने के लिए पर्दे के पीछे से समझौते और बातचीत के रास्ते तलाशने में जुट गए हैं। हालांकि, पार्षदों का कहना है कि इस बार केवल मौखिक आश्वासन से काम नहीं चलेगा, बल्कि लिखित और ठोस कार्रवाई होने तक उनका संघर्ष जारी रहेगा।

भागलपुर नगर निगम में पार्षदों और प्रशासन के बीच उपजा यह ताजा विवाद इस बात का प्रतीक है कि जब तक समन्वय और संवाद की कमी बनी रहेगी, तब तक शहर का विकास और जनता का कल्याण कागजों तक ही सीमित रहेगा। यदि समय रहते इस विवाद का कोई सौहार्दपूर्ण समाधान नहीं निकाला गया, तो आने वाले दिनों में भागलपुर की प्रशासनिक व्यवस्था पूरी तरह पटरी से उतर सकती है।