आचार्य जयमंत मिश्र की शतवार्षिकी पर BRABU मैथिली विभाग में राष्ट्रीय सेमिनार का भव्य आगाज: संस्कृत और मैथिली जगत के दिग्गजों ने किया स्मरण
बिहार के शिक्षा और सांस्कृतिक केंद्र के रूप में अपनी खास पहचान रखने वाले बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय (BRABU) के मैथिली विभाग में एक अत्यंत गौरवशाली और ऐतिहासिक आयोजन की शुरुआत हुई है। महान संस्कृत और मैथिली के प्रख्यात विद्वान आचार्य जयमंत मिश्र की जन्मशती (शतवार्षिकी) के अवसर पर दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार (National Seminar) का भव्य शुभारंभ किया गया। इस उद्घाटन सत्र ने शैक्षणिक गलियारों में एक नई ऊर्जा का संचार किया है, जहां देश भर से आए विद्वानों ने आचार्य जयमंत मिश्र के जीवन, उनके बहुमूल्य कृतित्व और भारतीय विद्या (Indology) में उनके अद्वितीय योगदान पर विस्तार से चर्चा की।
उद्घाटन सत्र और गणमान्य अतिथियों की उपस्थिति
सेमिनार का उद्घाटन सत्र बीआरएबीयू के मैथिली विभाग के सभागार में अत्यंत गरिमामयी माहौल में संपन्न हुआ। इस राष्ट्रीय सेमिनार के उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता जाने-माने शिक्षाविद् और विद्वान प्रो. इन्दुधर झा ने की। उनके सानिध्य और मार्गदर्शन में सत्र की शुरुआत पारंपरिक दीप प्रज्वलन के साथ हुई।
इसके साथ ही, कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति एवं प्रसिद्ध शिक्षाविद् प्रो. वीणा ठाकुर ने विशेष रूप से शिरकत की। उद्घाटन सत्र के दौरान विभाग के शिक्षक, शोधार्थी, विभिन्न कॉलेजों के प्राध्यापक और बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे, जिन्होंने इस ऐतिहासिक बौद्धिक मंथन का हिस्सा बनकर गर्व महसूस किया।
आचार्य जयमंत मिश्र का संस्कृत और मैथिली विद्वान के रूप में योगदान
उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए मुख्य वक्ताओं ने आचार्य जयमंत मिश्र के व्यक्तित्व और कृतित्व के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला। विशिष्ट अतिथि प्रो. वीणा ठाकुर ने अपने संबोधन में आचार्य जयमंत मिश्र के एक महान संस्कृत विद्वान के रूप में उनके अतुलनीय योगदान को रेखांकित किया।
प्रो. ठाकुर ने बताया कि आचार्य जयमंत मिश्र केवल एक प्राध्यापक या लेखक नहीं थे, बल्कि वे भारतीय शास्त्रीय परंपरा, व्याकरण, दर्शन और साहित्य के एक जीवंत विश्वकोश थे। उन्होंने संस्कृत और मैथिली भाषा के संवर्द्धन के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। उनकी कृतियों और टीकाओं ने संस्कृत पाण्डुलिपियों और दर्शन को आम जनमानस और शोधार्थियों के लिए सुलभ बनाया। वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि आधुनिक पीढ़ी को आचार्य मिश्र के जीवन-दर्शन से प्रेरणा लेनी चाहिए, जिन्होंने अपनी विद्वत्ता से मिथिला और पूरे देश का मान बढ़ाया।
अध्यक्षता करते हुए प्रो. इन्दुधर झा के विचार
सत्र की अध्यक्षता कर रहे प्रो. इन्दुधर झा ने अपने अध्यक्षीय भाषण में आचार्य जयमंत मिश्र के साथ बिताए संस्मरणों और उनके अकादमिक सफर को साझा किया। उन्होंने कहा कि आचार्य जी का व्यक्तित्व अत्यंत सरल, किंतु उनका बौद्धिक धरातल बेहद उन्नत था। उन्होंने संस्कृत साहित्य के क्षेत्र में जो मौलिक अनुसंधान किए, वे आज भी शोधकर्ताओं के लिए मार्गदर्शक का काम करते हैं। प्रो. झा ने कहा कि शतवार्षिकी के इस राष्ट्रीय मंच के माध्यम से युवा पीढ़ी को यह समझने का अवसर मिला है कि हमारी प्राचीन सांस्कृतिक और भाषाई धरोहर कितनी समृद्ध है।
सेमिनार के मुख्य बिंदु और अकादमिक सत्र
दो दिनों तक चलने वाले इस राष्ट्रीय सेमिनार के विभिन्न सत्रों में देश के अलग-अलग विश्वविद्यालयों से आए शोधार्थियों और विषय विशेषज्ञों द्वारा कई शोध-पत्र (Research Papers) प्रस्तुत किए जा रहे हैं। इन सत्रों के प्रमुख आकर्षण निम्नलिखित रहे:
शास्त्रीय परंपरा और आधुनिक संदर्भ: आचार्य जयमंत मिश्र के साहित्य में प्राचीन शास्त्रीय मूल्यों और आधुनिकता के समन्वय पर विस्तृत चर्चा।
मिथिला की सांस्कृतिक धरोहर: मैथिली भाषा और साहित्य के विकास में उनके योगदान और उनकी पुस्तकों की प्रासंगिकता।
युवा शोधार्थियों के लिए प्रेरणा: छात्रों और शोधार्थियों को अकादमिक रिसर्च की बारीकियों और आचार्य जी की लेखन शैली से सीखने का अवसर।
बीआरएबीयू के मैथिली विभाग में आयोजित यह राष्ट्रीय सेमिनार न केवल आचार्य जयमंत मिश्र को एक सच्ची श्रद्धांजलि है, बल्कि यह मुजफ्फरपुर और बिहार के शैक्षणिक इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हो रहा है। ऐसे आयोजनों से विश्वविद्यालय परिसर में बौद्धिक और साहित्यिक माहौल को बल मिलता है। कार्यक्रम के अंत में धन्यवाद ज्ञापन के साथ पहले दिन के सत्रों का समापन हुआ, जिसमें सभी ने आचार्य जयमंत मिश्र के आदर्शों को अपने जीवन में उतारने और उनके साहित्यिक सफर को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया।