किशनपुर अमखोरिया में प्रशासन की बड़ी कार्रवाई; सीओ के नेतृत्व में हटाया गया अवैध अतिक्रमण,
भागलपुर (विशेष संवाददाता): बिहार के भागलपुर जिले के किशनपुर अमखोरिया इलाके में प्रशासनिक बुलडोजर और अंचल प्रशासन की कार्रवाई से उस वक्त अफरा-तफरी मच गई, जब स्थानीय अंचलाधिकारी (सीओ) के नेतृत्व में भारी पुलिस बल के साथ अतिक्रमण हटाओ अभियान चलाया गया। इस अभियान के दौरान सरकारी जमीन को कब्जा मुक्त कराने का दावा किया गया, लेकिन दूसरी ओर इस कार्रवाई ने एक स्थानीय परिवार के सामने गंभीर संकट खड़ा कर दिया है। कार्रवाई के दौरान घर का गेट टूटने और बच्चों के दहशत में आने का मामला सामने आने के बाद इलाके में तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं। इस पूरी घटना में पीड़िता सारिका सुमन ने प्रशासन पर मनमाने तरीके से कार्रवाई करने का आरोप लगाते हुए हर्जाने और मुआवजे की मांग की है।
क्या है पूरा मामला? किशनपुर अमखोरिया में अतिक्रमण हटाओ अभियान
प्राप्त जानकारी के अनुसार, किशनपुर अमखोरिया क्षेत्र में लंबे समय से सरकारी जमीन या रास्ते पर अवैध अतिक्रमण की शिकायतें मिल रही थीं। इन शिकायतों का संज्ञान लेते हुए स्थानीय प्रशासन और अंचल कार्यालय (CO Office) की टीम ने पुलिस बल के साथ मिलकर अतिक्रमण हटाने का यह अभियान चलाया:
दस्ताबेजों और बुलडोजर का एक्शन: प्रशासन की टीम जेसीबी और पोकलेन जैसे भारी वाहनों के साथ मौके पर पहुँची और चिह्नि त अतिक्रमण को हटाना शुरू किया। इस दौरान कई पक्के और कच्चे निर्माणों को ध्वस्त किया गया।
अचानक हुई कार्रवाई से मचा हड़कंप: प्रशासनिक अमले के अचानक पहुँचने से स्थानीय लोगों में भगदड़ मच गई। हालांकि अधिकांश लोगों ने प्रशासन के भय से अपने अवैध कब्जे खुद ही हटाने शुरू कर दिए थे, लेकिन कुछ स्थानों पर प्रशासन को कड़ा रुख अपनाना पड़ा।
पीड़िता सारिका सुमन का दर्द: "पति और मेरे बाहर रहने के दौरान बच्चों के सामने तोड़ा गया घर का गेट"
इस पूरी प्रशासनिक कार्रवाई के दौरान सबसे ज्यादा चर्चा पीड़ित महिला सारिका सुमन के मामले की हो रही है। मीडिया और स्थानीय लोगों के सामने अपना दर्द बया करते हुए सारिका सुमन ने प्रशासन की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाए हैं:
असुरक्षित माहौल में थे बच्चे: पीड़िता ने रोते हुए बताया कि जिस समय अंचल प्रशासन की टीम उनके घर पर कार्रवाई करने पहुँची, उस वक्त घर पर कोई भी वयस्क सदस्य मौजूद नहीं था। वे और उनके पति किसी आवश्यक कार्य से घर से बाहर गए हुए थे, और घर पर केवल उनके छोटे-छोटे बच्चे अकेले थे।
दरवाजा टूटने से सहम गए मासूम: सारिका सुमन का आरोप है कि उनकी अनुपस्थिति का लाभ उठाते हुए प्रशासनिक कर्मियों ने बिना किसी पूर्व चेतावनी या उचित समय दिए उनके घर के मुख्य गेट को तोड़ दिया। अचानक हुई इस तोड़फोड़ की आवाज से घर के अंदर मौजूद बच्चे बुरी तरह सहम गए और डर के मारे रोने लगे।
"क्या यही है प्रशासनिक न्याय?": पीड़िता का कहना है कि यदि उनका निर्माण अवैध था, तो प्रशासन को उन्हें विधिवत नोटिस देना चाहिए था या कम से कम परिवार के किसी जिम्मेदार सदस्य की मौजूदगी का इंतजार करना चाहिए था। बच्चों के सामने घर के दरवाजे को तोड़ना मानसिक प्रताड़ना के समान है।
मुआवजे की मांग और मानवाधिकारों का सवाल
घटना के बाद से ही पीड़िता सारिका सुमन और उनके समर्थक न्याय की गुहार लगा रहे हैं:
क्षतिपूर्ति की मांग: पीड़िता ने जिला प्रशासन और राज्य सरकार से मांग की है कि अतिक्रमण हटाने के नाम पर उनके घर के जिस गेट और अन्य हिस्सों को नुकसान पहुँचाया गया है, उसका पूरा मुआवजा दिया जाए।
दोषियों पर कार्रवाई की गुहार: उन्होंने जिला पदाधिकारी (DM) को ज्ञापन सौंपकर इस बात की उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की है कि आखिर बिना उचित प्रक्रिया के बच्चों की मौजूदगी में इतनी आक्रामक कार्रवाई क्यों की गई।
प्रशासनिक पक्ष और अधिकारियों का रुख
दूसरी ओर, अंचल प्रशासन (CO) का कहना है कि यह कार्रवाई पूरी तरह से नियमानुसार और उच्च न्यायालय या विभाग के निर्देशों के तहत सार्वजनिक भूमि को अतिक्रमण मुक्त कराने के लिए की गई है:
अधिकारियों का तर्क है कि संबंधित क्षेत्र में कई बार लोगों को मौखिक और लिखित रूप से अतिक्रमण हटाने की चेतावनी दी जा चुकी थी, लेकिन लोगों द्वारा कब्जा नहीं हटाया जा रहा था।
प्रशासनिक अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि कानून अपना काम कर रहा है, और यदि किसी को कोई विशेष शिकायत है, तो वे निर्धारित कानूनी मंच पर अपनी बात रख सकते हैं।
किशनपुर अमखोरिया में सीओ के नेतृत्व में चलाया गया यह अतिक्रमण हटाओ अभियान एक बार फिर प्रशासन और आम जनता के बीच समन्वय की कमी को उजागर करता है। जहां एक तरफ सरकारी जमीन को मुक्त कराना प्रशासनिक रूप से आवश्यक है, वहीं दूसरी ओर सारिका सुमन जैसी माताओं और उनके बच्चों पर बीती इस घटना ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि विकास और व्यवस्था की इस दौड़ में मानवीय संवेदनाओं का हनन नहीं होना चाहिए। अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन इस मामले में पीड़िता को मुआवजा देने या मामले की निष्पक्ष जांच करने को लेकर क्या कदम उठाता है।