जलालगढ़ प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल: महिला बंध्याकरण शिविर में उमड़ी भारी भीड़, घंटों जमीन और फर्श पर बैठकर इंतजार करने को विवश रहीं महिलाएं; स्वास्थ्य सुविधाओं पर उठे सवाल
बिहार के पूर्णिया जिले के जलालगढ़ प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (Primary Health Center - PHC) से स्वास्थ्य व्यवस्थाओं की एक बार फिर पोल खोलने वाली तस्वीर सामने आई है। स्वास्थ्य विभाग द्वारा परिवार नियोजन और महिला बंध्याकरण को बढ़ावा देने के लिए चलाए जा रहे अभियानों के दावों के बीच, धरातल की हकीकत बेहद दर्दनाक और चिंताजनक नजर आ रही है।
जलालगढ़ पीएचसी में आयोजित महिला बंध्याकरण ऑपरेशन शिविर के दौरान दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों से पहुँची दर्जनों महिलाओं को घंटों भारी परेशानियों का सामना करना पड़ा। अस्पताल परिसर में बैठने के लिए पर्याप्त व्यवस्था न होने के कारण महिलाओं और उनके परिजनों को फर्श या जमीन पर बैठकर अपनी बारी का इंतजार करना पड़ा। इस अमानवीय स्थिति ने एक बार फिर सरकारी अस्पतालों में मिलने वाली स्वास्थ्य सुविधाओं और व्यवस्थाओं पर गंभीर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं।
क्या है पूरा मामला? (जलालगढ़ पीएचसी में शिविर का हाल)
प्राप्त जानकारी के अनुसार, जलालगढ़ प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में परिवार नियोजन कार्यक्रम के तहत महिलाओं के बंध्याकरण ऑपरेशन के लिए एक विशेष शिविर का आयोजन किया गया था।
सुबह से ही उमड़ी महिलाओं की भीड़: शिविर की सूचना मिलने के बाद जलालगढ़ प्रखंड के विभिन्न गाँवों और पंचायतों से बड़ी संख्या में महिलाएं अपने परिजनों के साथ सुबह-सुबह ही पीएचसी पहुँच गईं।
प्रशासनिक और चिकित्सीय लेट-लतीफी: ऑपरेशन से पहले की चिकित्सीय जाँच (Medical Checkup) और अन्य औपचारिकताएं इतनी धीमी गति से हुईं कि महिलाओं को सुबह से लेकर दोपहर तक भूखे-प्यासे कतारों में खड़े रहना पड़ा।
बेड और बैठने की व्यवस्था का अभाव: अस्पताल भवन के भीतर और बाहर इतनी भीड़ थी कि अधिकांश महिलाओं को बैठने के लिए एक कुर्सी तक नसीब नहीं हुई। मजबूरन कई महिलाओं और उनके साथ आई बुजुर्ग महिलाओं को अस्पताल के फर्श, गलियारों या बाहर जमीन पर बैठकर अपनी बारी का इंतजार करना पड़ा।
मरीजों और परिजनों का दर्द: बुनियादी सुविधाओं का भारी अभाव
इस शिविर में शामिल होने आई ग्रामीण महिलाओं और उनके पतियों ने स्वास्थ्य विभाग और अस्पताल प्रबंधन की कार्यशैली पर जमकर रोष व्यक्त किया।
गर्मी और उमस में बदहाली: अगस्त के इस उमस भरे और गर्म मौसम में अस्पताल के भीतर पंखों की समुचित व्यवस्था न होने के कारण महिलाएं पसीने से तरबतर नजर आईं। कई महिलाओं की तबीयत तो डॉक्टर के पास पहुँचने से पहले ही कमजोरी और घबराहट के कारण बिगड़ने लगी थी।
पानी और शौचालय की समस्या: अस्पताल परिसर में पेयजल की व्यवस्था भी नाकाफी साबित हुई। दूर-दराज से भूखे-प्यासे पहुँचे मरीजों को पीने के पानी के लिए भी इधर-उधर भटकना पड़ा। इसके अलावा महिलाओं के लिए शौचालय की गंदगी और बदइंतजामी ने उनकी मुसीबत को और बढ़ा दिया।
कर्मचारियों का लचर रवैया: परिजनों का आरोप है कि अस्पताल में तैनात स्वास्थ्यकर्मी और डॉक्टर अपनी मनमानी पर उतारू रहते हैं। समय पर रजिस्ट्रेशन न होना और बार-बार काउंटर बदलने के लिए दौड़ाना आम बात बन चुकी है।
स्वास्थ्य विभाग के दावों और हकीकत में जमीन-आसमान का फर्क
सरकार द्वारा महिलाओं के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण को लेकर भले ही बड़े-बड़े दावे किए जाते हों, लेकिन ग्रामीण अंचलों के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की स्थिति आज भी दयनीय बनी हुई है।
लक्ष्य पूरा करने का दबाव: स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों का पूरा जोर केवल कागजों पर लक्ष्य (Target) पूरा करने पर होता है, लेकिन उस प्रक्रिया के दौरान मरीजों को किस प्रकार की अमानवीय परिस्थितियों से गुजरना पड़ता है, इसकी सुधि लेने वाला कोई नहीं होता।
सुरक्षित प्रसव और परिवार नियोजन पर सवाल: यदि बंध्याकरण जैसे छोटे और महत्वपूर्ण ऑपरेशन के लिए भी महिलाओं को इस तरह फर्श पर बैठकर घंटों इंतजार करना पड़े, तो इसे स्वास्थ्य सेवा की बदहाली ही कहा जाएगा।
स्थानीय प्रबुद्धजनों और बुद्धिजीवियों की प्रतिक्रिया
जलालगढ़ पीएचसी की इस तस्वीर के सामने आने के बाद स्थानीय बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कड़ी आपत्ति जताई है।
व्यवस्था सुधारने की मांग: लोगों ने सिविल सर्जन (Civil Surgeon) और जिला प्रशासन से मांग की है कि जलालगढ़ प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की व्यवस्थाओं की उच्चस्तरीय जाँच कराई जाए।
मरीजों के लिए सम्मानजनक माहौल: सामाजिक संगठनों का कहना है कि जब भी इस तरह के शिविर आयोजित किए जाएं, तो मरीजों के बैठने, ठहरने, पीने के पानी और भोजन की व्यवस्था सुदृढ़ होनी चाहिए, ताकि किसी भी महिला को अपमानजनक स्थिति का सामना न करना पड़े।
जलालगढ़ प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में महिला बंध्याकरण ऑपरेशन के दौरान महिलाओं द्वारा फर्श पर बैठकर इंतजार किए जाने की यह घटना प्रशासनिक लापरवाही और उदासीनता का एक जीवंत उदाहरण है। सरकार की योजनाओं का लाभ जनता तक तभी सही मायनों में पहुँच सकता है, जब जमीनी स्तर पर बुनियादी सुविधाओं में सुधार किया जाए। फिलहाल, इस घटना के बाद से स्वास्थ्य विभाग की कार्यशैली पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं, और यह देखना बाकी है कि जिम्मेदार अधिकारी इस दिशा में क्या सुधारात्मक कदम उठाते हैं।